सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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बातें पुनः कही जा रही हैं ।
प्रोक्तं प्रकाशे प्रथमे प्रमाणं त्रुट् यदि कालस्य लयान्तिमस्य
सिद्धान्त सल्लक्षण सृष्टि काल सहांग चक्राणि च सप्रशंसम् । ६७ ।
प्रथम प्रकाश में ये विषय है- त्रुटि आदि से आरम्भ कर प्रलय के अन्त तक
का काल मान, सिद्धान्त का लक्षण, सृष्टिकाल, वेद उसका अंग विभाग, उसकी
प्रशंसा ।
संख्या द्वितीये भगणोत्करस्य कल्पाब्दमास द्युमिति र्निरुक्ता
नभश्चराणां दिन भुक्ति लिप्तास्तत्साधनं पर्ययघस्रकृप्तिः । ६८ ।
द्वितीय प्रकाश में ये विषय हैं । ग्रह उच्च, और पात आदि की भगण संख्या,
कल्प में वर्ष, मास और दिन की संख्या, ग्रह उच्च और पात आदि की दैनिक
मध्यमगति कला और उसे निकालने की विधि, भगण का दिन परिमाण ।
उक्त स्तुतीये कुदिनौघ इष्टे दिनाब्द मासाधिप मध्य खेटा
जैवास्तथाब्दा द्विविधा ग्रहादि ध्रुवा द्युषत्पात मृदूच्चहाराः । ६९ ।
तृतीय प्रकाश के विषय हैं-इष्ट अहर्गण निकालने की विधि, दिन, मास,
वर्ष आदि के अधिपति निकालने की विधि, मध्यम ग्रह, बार्हस्पत्य वर्ष, ग्रह उच्च
और पात का ध्रुव तथा उच्च पात का हार ।
तुर्ये महीवेष्टन देश नाड़ी वार प्रवृत्तीष्ट धनर्ण लिप्ताः
भुजान्तराख्या वदयान्तरारूया श्ररोद् भवा सत्पदकं ध्रुवादौ । ७० ।
चतुर्थ प्रकाश में भू परिधि, देशान्तर दण्ड, वार प्रवृत्ति और योग वियोग
कला, भुजान्तर कला, उदयान्तर कला, चर कला और द्वापरान्त ध्रुवपदक हैं ।
इत्थं चतुर्भिर्गदित प्रकाशैर्मध्याधिकारः सुरवर्त्मगानाम्
अथ प्रकाश द्वितीयेन तेषा मुद्दिष्यते विस्फुटताधिकारः । ७१ ।
इस प्रकार प्रथम चार प्रकाशों में आकाश चारी ग्रहों का मध्यमाधिकार पूरा
हुआ । इसके बाद २ प्रकाशों में ग्रह स्फुट करने के बारे में जो कहा गया है
उसके बारे में संक्षेप में कहूँगा ।
पश्चात् पुरः खेट गतिः प्रमाणं तदुच्च पातोत्थ पृथग्गति त्वम्
ज्या पञ्चमे दोः फल भुक्ति खण्डाः परिध्युपात्तास्तिथि भादि सर्वः । ७२ ।
पंचम प्रकाश में ग्रहों की पूर्व और पश्चिम गति का मान, उच्च और पात के
कारण ग्रहों का गति भेद, क्रम और उत्क्रम ज्या साधन, भुजफल निकालने के
लिये गति खण्ड, परिधि और उसकी मन्द और शीघ्र परिधि, तिथि और नक्षत्र
आदि पंचांग कहा गया है ।