सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार वर्णन् ४३३
यद्राशि चार स्थिति (१५) दण्ड तोऽङ्गाद्
द्विरराम (३२) संख्यैः पलकै र्युतेभ्य
तन्मास्यभीष्ट दिन एक हीने
प्राग् वर्षजात् स्पष्ट इनः पुरेव । ३४ ।
किसी मास की संक्रान्ति पिछले वर्ष की संक्रान्ति से १५।३२ दण्ड के बाद
होगी । उस मास के अभीष्ट दिन में एक घटाकर पूर्व वर्ष के उसी समय के रवि
से पहले की तरह रवि को स्फुट किया जा सकता है ।
किन्तुत्रयाः प्रोज्झ्यतया निरुक्ता लिप्तादय
(१५।१८) स्ताः स्फुटसूर्यगत्याः
हताविभक्ताः खरसैः (६०) स्फुटाः स्युस्तदूनितः
सूक्ष्मइनोऽब्दतः स्यात् । ३५ ।
किन्तु यहां (१५।१८) कला घटाने को कहा गया है । उसको स्फुट सूर्य गति
से गुणा कर ६० से भाग देने पर स्फुट होगा । उसी स्फुट कला आदि को पूर्व
वर्ष के उसी दिन के सूर्य से घटाने पर इस वर्ष के इष्ट दिन का स्फुट सूर्य होगा ।
ग्राह्यादिरर्कोज्झित एष्यघस्र सूर्यः स्फुटा भुक्ति रतोऽवशेषः
अत्येति दर्शं रविसंक्रमश्चेत्त दाधिमासः सुविघावगम्यः । ३६ ।
अतः आगामी दिन के स्पष्ट सूर्य से ग्राह्य दिन का सूर्य घटाने पर शेष सूर्य
की स्फुट गति होगी । यदि रवि संक्रान्ति अमान्त के बाद हो वह मास अधिमास
होगा ।
भमुक्त नाड्योऽष्टशतो (८००) विनिघ्नाः साद्यन्त नक्षत्रघटी विभक्ताः
गतर्क्ष संख्याश्चततो गुणाढ्या भवन्ति विस्पष्ट सुधांशु लिप्ताः । ३७ ।
इष्ट नक्षत्र के गत दण्ड आदि को ८०० से गुणा कर उस नक्षत्र के भोग (आदि
से अन्त तक) दण्ड आदि से भाग देने पर उस नक्षत्र का भुक्त (बीता हुआ) कला
आदि होगा । ज्ञात नक्षत्र से पहले के नक्षत्र संख्या को ८०० से गुणा कर उससे
ज्ञात नक्षत्र के भुक्त अंशादि को मिलाने से चन्द्र का स्फुट कला आदि होगा ।
कला में ६० से भाग देने पर अंश और उसमें १२ से भाग देने पर राशि होगी ।
सहस्रनिघ्ना भगजाष्ट पक्षाः (२८,८०,०००) साद्यन्त नक्षत्र पलै र्विभक्तः
फलं विधोर्भुक्ति रनेक वर्ष यातैष्यतिथ्यादि वदन्ति विज्ञाः । ३८ ।
(२८,८०,०००) में नक्षत्र की आदि और अन्त लिप्ता (चन्द्र की ) से भाग देने
पर चन्द्र की स्फुट गति होगी । विज्ञ गणक इस प्रकार अनेक वर्ष की गति और
एष्य तिथि आदि जान सकते हैं ।
अथेन्दु सूर्य ग्रह सम्भवाया चन्द्रार्क मात्रावगतेर हानि
आनीय वारैः परिशोधितानि स्वाभीष्ट पर्वानुगतानि तेभ्यः । ३९ ।