सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१५
(शेष) को घर बनाये हैं । नाग का घर समुद्र है । दोनों अमृत के भण्डार हैं ।
भगवान ने मत्स्य कच्छप आदि प्रत्येक रूप धारण किया था, ये सबी रूप वाले
प्राणी समुद्र ने भी धारण किये हैं । इन्द्र वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (गोवर्द्धन)
का आश्रय कृष्ण ने लिया था-समुद्र ने भी वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (मैनाक)
को आश्रय दिया था । विष्णु से गंगा की उत्पत्ति (नख से हुयी), समुद्र में गंगा
मिलती है, अतः दोनों गंगा के स्वामी हैं । भगवान के हाथो में शंख, पद्म आदि
है जो समुद्र में भी है । सृष्टि के अन्त में वे दोनों भुवनों को जनप्लावित करते
हैं । वे सभी तीर्थों के राजा हैं । वे दोनों दुःख शान्ति के लिए सुख (जल) का
विवरण करें ।
यत्रास्ते सानुबिम्बादित सित किरण प्रोज्ज्वलं नेत्रयुग्मं
नासाबाहूदरांह्रिं स्फुरति च विविध द्वीप शोभानुकारि
वारीतं श्यामल श्रीमर्कर सुरुचिरे कुण्डले वाड़वाग्नि-
ज्वाले वाद्यत् किरीटं तरणिव दधरः सोऽस्तु शान्त्यै कृपाब्धिः । २२ ।
जिसके दोनों नेत्र उदय होते हुए सूर्य और चन्द्र बिम्बों के समान है । (कृष्ण
नेत्र गोल तेजस्वी हैं) । समुद्र में भी दोनों उदय होते सम उसके नेत्र समान दीखते
हैं । जिसके नाक, भुजा, पेट और पैर आदि प्रत्येक द्वीपों के समान है (कृष्ण के
भुजा, पैर आदि द्विप अर्थात् हाथी के समान विशाल हैं) समुद्र के द्वीप उसके
अंगों के समान बाहर निकले हैं । जिनकी श्यामल शोभा है (कृष्ण और समुद्र
दोनों नीले हैं) जो मकर कुण्डल धारण किये हैं (कृष्ण के कुण्डल का आकार
मकर जैसा है । समुद्र के भीतर मकरों का समूह है), जिसका किरीट् बड़वानल
के समान तेजस्वी है (कृष्ण की मणि किरीट का तेज अग्नि के समान है, समुद्र
का बड़वानल उसकी मणि के समान है), जिसका नौका के समान अधर है ।
कृष्ण के ओठ नौका के समान सामान्य वक्र हैं, समुद्र का प्रवेश द्वार नौका है-
मुख के प्रवेश की तरह)- वे दया सागर (कृष्ण और समुद्र) हमारी शान्ति के
लिये विराजमान रहें ।
ब्रह्माण्ड साम्यम्
विभ्रद् वस्त्र क्षपे शौ नयन युग मिषादगभ शोभामदभ्रां
शुभ्र श्री वक्त्र दम्भादधर पुर रुचि व्याजतः सान्ध्यवेलाम्
तिर्यग् विस्तीर्ण वृत्तातुल भुजबल यच्छद् मनश्चक्र वालं
शैलं मध्यच्छला काञ्छल मुपरि नुतात् विश्वभर्त्ता शुभंनः । २३ ।
ब्रह्माण्ड के सूर्य चन्द्र की तरह कृष्ण के दो नेत्र हैं । ब्रह्माण्ड के मेघ की
तरह कृष्ण भी श्यामल है । ब्रह्माण्ड (आकाश) के समान कृष्ण का स्वच्छ तेज
है । ब्रह्माण्ड की सन्ध्या के समान लाल रंग कृष्ण के अधरों का है । भगवान
की दोनों भुजायें ब्रह्माण्ड के दिगवलय की तरह तिर्यक् फैली हुयी, गोल और