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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 523

४२६ सिद्धान्त दर्पण
लज्जितु करते हो । तुम्हारी दो आंखें सूर्य और चन्द्र के समान चमकती हैं । तुम
सदा युवक रूप में हो । तुमने भीष्म और द्रोण आदि का गर्व (उष्मा) तोड़ा था ।
हम पापियों की पतन से रक्षा करो ।
श्री राधाकान्त कान्तानन नलिन हरे रामकृष्णावतारिन्
गोविन्दानन्द कन्दाद् भुत गुण वितते श्रीपते नीप मालिन्
कंसारेऽसार संसार सार हर हरनुता पारकारुण्य सिद्धो
दुःखान्धोरुद्धतिं मे तनु दनुज रिपोऽनुग्रहप्रग्रहेण । ५४ ।
हे राधाकान्त, तुम्हारा मुख कमल के समान सुन्दर है । हे हरि, हे गोविन्द,
तुमने राम और कृष्ण अवतार ग्रहण किया था । तुम आनन्द के आश्रय हो । तुममें
अद् भुत गुण हैं । तुम लक्ष्मी के स्वामी हो । तुम्हारे वक्षस्थल पर कदम्ब फूलों
की माला शोभित है । तुम कंस के शत्रु हो । इस असार संसार को ध्वंस करो ।
तुम असीम दया के सागर हो । तुम को शिव भी पूजते हैं । तुमने ही दैत्यों का
नाश किया था । तुम अपनी कृपा रूपी रस्सी से मुझे दुःख रूपी कुँएं से निकालो ।
पार्थानर्थ प्रमाथ प्रथित पृथुयशो मन्मथ प्रार्थ्यकान्ते
श्रीमन्नित्य स्थल स्थागम पथ पथिक प्रार्थतार्थामरेन्द्रो
शक्र प्रत्यर्थिपाथः पति मथन महामन्थ पृथ्वीधरान्तः
स्थानं नाथामि तीर्थाधिपतट वटयोः श्रीजगन्नाथ दुःस्थः । ५५ ।
हे जगन्नाथ, तुमने पाण्डवों का सभी कष्ट दूर किया । कामदेव रूप के लिए
तुम्हारी प्रार्थना करता है । सदा लक्ष्मी के साथ अपने नित्य स्थल पर विराजमान
हो । धर्म मार्ग में स्थित लोगों की कामना सूर्य करने के लिए तुम कल्पवृक्ष के
समान हो । देव और असुरों द्वारा समुद्र मन्थन करने के समय आपने मथानी को
कूर्म रूप से स्थिर किया था । मुझ दरिद्र को पुरी के कल्पवट की छाया में और
समुद्र तीर पर स्थान दो ।
दासी पाद रजां सिनिर्जर शिरोधार्याणि सूर्यात्मक
स्फूर्जदूर्ज सुदूत दर्पदमनी यत्रस्थितिः पापिनाम्
तत्रस्ता दसमोध्ूर्व वैभववति क्षेत्रोत्तमे जातुमे
नैव श्रीपुरुषोत्तमे शिवतमे स्थातुं विरोगादयः । ५६ ।
जिस श्रीक्षेत्र के सेव कीं चरणधूलि को देव अपने सिर से लगाते हैं, जहां
रहने से पापी भी यमदूतों के गर्व को खण्डित करते हैं उसी मंगलमय वैभवशाली
पुरुषोत्तम क्षेत्र में रहने पर मेरा मन सदा प्रसन्न रहे ।
इत्युत्कलोज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूतः श्रीचन्द्रशेखर कृतौ गणिते ऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्तदर्पण उपाहित बाल बोधे कृष्णस्तुतिस्त्रधिक विंशितः प्रकाशः
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा छात्रों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
कृष्ण स्तुति सम्बन्धी २३ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।