सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशेषा शेषांग सद्य सुरा तरुतल भात्कल्पित प्रेमरूपः
श्रीकृष्णः प्रेम भक्तिं वितरतु हृदि नः सच्चिदानन्द रूपः । ५० ।
श्री कृष्ण ह्लादिनी शक्ति श्री राधिका के सुख की सीमा हैं । उनकी शोभा
लाखों कामदेवों के समान है । वह योग शक्ति युक्त और योगेश्वर है । वेदों के
प्रधान अंग उपनिषद् उनकी स्तुति करते हैं । उनका सत्य प्रभाव (वास्तविक वही
है, बाकी अस्थायी ) है । अनन्त का पूरा अंग उनका निवास है । वह कल्प वृक्ष
के नीचे विश्राम करते हैं तथा प्रेम मूर्ति है । वही श्री जगन्नाथ सच्चिदानन्द हमारे
हृदय में प्रेम और भक्ति का वितरण करें ।
राधा साधारण श्रीकमन सुमनसं केकिपिच्छावतंसं
चन्द्रावल्यादिरागाच्छिदूर सुरनदी संग्राहागाध सिन्धुम् ।
वंशी संशीलितारुण्यं मणिमया कल्पना कल्पयन्तं
विद्युद् विद्योत् वस्त्रं नव जलद रुचिं श्री जगन्नाथ मीडे । ५१ ।
श्री कृष्ण राधा को लक्ष्मी के समान देखते थे और उनके लिए कामदेव के
समान थे । मोर पंख उनका अलंकार है । चन्द्रावली आदि गोप कन्याओं के गंगा
के प्रवाह के समान सतत प्रेमधारा के लिये वे अथाह सागर थे । वह सदा
वंशीवादन में रत थे । सोने के समान पीताम्बर और रत्न धारण किये रहते थे ।
वर्षा वाले मेघ के समान उनके श्याम शरीर पर पीताम्बर की शोभा बिजली के
समान है । उसी कृष्ण रूप जगन्नाथ की मैं पूजा करता हूँ ।
यस्य श्री विग्रहोद्यद् द्युति रिति परम ब्रह्म वेदान्त वेद्य
कोटी ब्रह्माण्ड भारी परमशिव भवः श्रीमहाविष्णुरंशः
यस्य भ्रूक्षेप मात्रात्सृजति हरिहर ब्रह्मशक्रादिदेवान्
माया पायाद पायादय मुदित दयः पुण्डरीकेश्वरोऽस्मान् । ५२ ।
जिसके सुन्दर शरीर का प्रज्वलित तेज है, वेदान्त (उपनिषद) द्वारा जिसके
परम ब्रह्म होने का ज्ञान होता है, जो करोड़ो ब्रह्माण्डों का भार उठाते हैं, जिनसे
परमशिव (या मंगल) उत्पन्न होते हैं, जो स्वंय महाविष्णु हैं, जिनके भौंह हिलाने
से ही माया या प्रकृति हरि, हर, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं की रचना होती है,
वही दयालु हृदय कमल के ईश्वर मरण से हमारी रक्षा करें ।
कृष्ण कृष्णाम्बुधिष्ण्याम्बुज चरण रण क्षीण गीर्वाणशत्रो
कृष्णाकृष्णादि तृष्णा हरण रणरण श्री तिरस्कार कारिन्
उष्णानुष्णांशु विस्मापन नयन युगाकार तारुण्य भारि
नस्मान् भीष्मादि कोष्मापह विहित महापातकान् पाहिपातात् । ५३ ।
हे कृष्ण ! तुमने क्षीर सागर को अपना घर बनाया है । तुम्हारे दोनों पैर कमल
के समान हैं । तुमने युद्ध में देवताओं के शत्रुओं को नष्ट कर दिया है । द्रौपदी
तथा अर्जुन का कष्ट तुम्हीं ने दूर किया था । तुम कामदेव की शोभा को भी