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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 609 में से

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पृष्ठ 518

पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४२१
रामावतार
रामः श्यामाब्जधामा शमयुत सममाशर्म घर्मांश वंशो
तंसः संसार हिंसा वह महिम महाम्भोधि रम्भोज नेत्रः
शोण्डश्रुण्डीश काण्डा सनवल दलने दण्डकारण्य चारी
हारी वारीश तारी सरपर विसर प्राणहारी बुधारी । ३७ ।
भगवान राम नील कमल के समान और सूर्य वंश के भूषण हैं । वह हमारा
अमंगल दूर करें । उनकी आंखें कमल के समान सुन्दर हैं । संसार के हिंसकों
के नाश के लिये (डुबाने के लिये) महासागर के समान हैं । उन्होंने शिव धनुष
को भी सहज में मोड़ कर तोड़ दिया था । दण्डकारण्य में विचरण करने वाले
हैं तथा महासागर को पाकर उन्होंने अजेय रावण का प्राण हर लिया था । वे
सदा बाणों के साथ रहते हैं ।
बलरामावतार
उर्जेन्दु ज्योतिरुर्जस्वल विमलहराहार्यरुग् जैत्र गात्रः
सद्यः प्रोद्यहिनेश भ्रमदमदभराघूर्णिना स्तीर्ण नेत्रः
प्रत्यग्राम्भोदवन्द प्रतिभट पटभृद् भूरि भास्वद् विभूषो
भूयाद् भूगोल भारो भव भयभिद् भानु भूमेदनो नः । ३८ ।
भगवान् बलराम हमारा संसार भय दूर करें । वह कार्तिक पूर्णिमा के चन्द्र
के समान प्रकाशमान है, अथवा रोहिणी (माता) के चन्द्र (पुत्र) रूप में विख्यात
हैं । उनके शरीर की धवल कान्ति कैलाश पर्वत से भी अधिक है । उनकी आंखें
मदमस्त तथा चञ्चल है, लाल और विशाल होने के कारण उदय कालीन सूर्य
के समान दीखती हैं । नीले मेघ समूह के समान नीले रंग का वस्त्र पहनते हैं
तथा बहुत से आभूषणों से सजित हैं । शेष के रूप में वह पूरे संसार का भार
बिना कष्ट के ही सहते हैं ।
बुद्धावतार
अध्यात्मध्यान बुद्धादर विधुत धृतिध्वस्त शुद्धाध्वराध्व
श्रद्धाः क्रोधादिरोधा विधि विहित वधा साधुता सिद्ध बोधः
दध्याद् बुद्धा भिधानो मगध धरणी हल्लब्ध जन्माभिदेवो
बाधाब्ध्योद्धार धूर्या धियमघन धनं धर्मधारां धरन्तः । ३९ ।
भगवान बुद्ध के रूप में हमारी बुद्धि को बढ़ायें । मगध देश के (लुम्बिनी
के राजवंश) में जन्म होने पर भी वे दरिद्रों के धन थे । विपद् समुद्र से उद्धार
के लिये उन्होंने उपयुक्त धर्म मार्ग बनाया । सदा आत्मा में लीन रहकर कभी धैर्य
नहीं छोड़ा । उन्होंने वैदिक यज्ञ कर्मों में पशुओं की हत्या की स्पष्ट रूप से निन्दा
की । यज्ञ में पशुओं की हत्या की तुलना में अपने ही भीतर काम क्रोध आदि