सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 514, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१७
नाम उमा है । मधु दैत्य के वध के लिए देवताओं ने उनकी वन्दना की थी
जिनकी शक्ति से वह मारा गया ।
वाग् देवी साम्यम्
श्रीमद् गौराम्बराडम्बर रुचिर पयोराशि शित्यंग लक्ष्मी
र्लक्ष्मी सेना दृतांग स्फुट तमगमनः संगति वाङितांघ्रिः ।
ब्रह्मानन्दैक भूमिर्भ्रमशमन पटुः साश्रिता नाम विद्यां
भिद्याद् स्थूल देहा हित सकल जगद्धीरमेय स्थितिनैः । २९ ।
कृष्ण पक्ष में अर्थ - श्रीकृष्ण हमारी दुर्गति दूर करें । उनके नील शरीर पर
पीताम्बर फब रहा है । उनको लक्ष्मी, शिव और सूर्य सम्मान करते हैं । उनके
पास देवता लोग जाते हैं । सरस्वती उनके चरणों की वन्दना करती है । वे भक्तों
का अज्ञान दूर करने में दक्ष तथा ब्रह्मानन्द देते हैं । वे सूक्ष्म रूप से पूरे समाज
में व्याप्त हैं । उनकी स्थिति पण्डित लोग ही समझ सकते हैं ।
सरस्वती पक्ष में अर्थ- सरस्वती हमारी माया दूर करें । उनके धवल शरीर
पर शुक्ल वस्त्र फब रहा है । विष्णु से वह आदृत हैं तथा उन्हीं के प्रिय फूल
सरस्वती पर अर्पित हैं । भक्त उनकी चरण वन्दना करते हैं । वह भक्तों का अज्ञान
दूर कर ब्रह्मानन्द देती हैं । सूक्ष्म देह से सारे संसार में व्याप्त हैं । पण्डित ही
उनकी स्थिति के बारे में जान सकते हैं ।
गणेश साम्य-
हस्त्योद्य पुष्कर श्री श्रुति शिखर धृतोन्मत्तचित्तालिलोखो
ऽलंकर्त्ताक्षाम मध्य स्त्रिपुर हर तनुदक्ष पक्षस्य रक्षात्
सद्योऽविद्यान्धकारात् परशुधर पुरस्कार्य दुर्वार्य वीर्यो
देवः श्री पार्वती वाग् विधिं विततयशाः स्वर्गवर्गाग्रपूज्यः । २७ ।
कृष्ण आदित्यों में प्रथम (उपेन्द्र या वामन) हैं, गणेश देवताओं में प्रथम पूज्य
हैं । कृष्ण ने दुर्द्धर्ष परशुराम को पुरस्कार दिया था । गणेश ने भी परशुराम को
बहुत कठिनाई से रोका था जब वे शिव से पुरस्कार लेने जा रहे थे । कृष्ण हरि
हर मिलन में शिव के दाहिने रहते हैं । गणेश भी शिव के दाहिने रहते हैं । दोनों
के हाथ में कमल का फूल सजा हुआ है । दोनों का यश लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती
और ब्रह्मा फैलाते हैं । दोनों हमारे अविद्या रूपी अन्धकार को नष्ट करे ।
सूर्य साम्यम्
छाया कान्तः कृतान्तार्द्धित चरण युगः पाणिराजत् सरोजः
स्वाग्रोद्यद् वैनेतेया रजनीचर सुखोच्छाया विच्छेददक्षः
स्वच्छानन्तोंक लीलः क्षयिततम तमाः सर्वतेजोऽभिभावी
कालिन्द्यानन्द कलः प्रमुदित कमलः पातु पकांधरिर्न । २८ ।