सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 517, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० सिद्धान्त दर्पण
मंगल करे ।
नृसिंहावतार
अघं संघं नृसिंहो भवतु भवहरोऽह्यसंहर्तु महें
गर्हन्निर्हादवृन्दैः प्रलय जलधर ध्यान धारा समृद्धिम्
अक्षान्त स्वीय भक्ताक्षति रमरपराध्यक्ष वक्षः क पाट
क्षोप प्रक्ष्य॑माणक्षतय भृतनखो लक्ष्यलक्ष्मीकवक्षाः । ३४ ।
संसार के (जन्म मृत्यु के) नाशक नृसिंह भगवान शीघ्र पाप समूहों का नाश
करें । उनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी है । अपने भक्तों की क्षति या कष्ट वे नहीं सह
पाते हैं । दैत्यराज हिरण्यकशिपु के कपाट रूपी वक्ष को चीरने से निकलाहुआ
रक्त उनके नखों में लग गया था । उस समय उनकी घोर गर्जना प्रलय कालीन
मेघ से भी अधिक भयंकर थी ।
वामनावतार
खर्विकुर्वित दविं कर भुवनक गीर्वाणवर्गालियार्वी
गर्वानिर्वाक् सुपर्वार्य वनिधवमहा सम्पदं लुम्पमानः
व्यापद् व्यापञ्जयं पत्रितय रयभरा दर्धना व्याजखर्वः
सर्वं शंकादि सेव्यः स्रवद मर धुनी नीर पन्नीरजोयः । ३५ ।
वामन् भगवान हमारे विपद समूह को नष्ट करें । उनकी शिव आदि देवता
सेवा करते हैं । उनके चरण कमलों में गंगा निकली है । मांग कर छल करने के
लिए उन्होंने वामन रूप लिया था । दैत्यराज (बलि) की सम्पूर्ण सम्पत्ति (दान
में) लेकर उन्होंने अपने तीन पगों से पाताल, देवालय (स्वर्ग) और पृथ्वी-सबका
गर्व चूर्ण कर दिया था ।
परशुरामावतार
षष्ठः क्ष्माप्रेष्ठ गोष्ठी कुठ गण लुठना कुण्ठतेजः कुठारः
श्रीवैकुण्ठावतारः कठिन रणधुरादृष्ट षष्ठीश पृष्टः
तिष्ठन् कण्ठिर वाभीऽर्जुन सुभटघटा घोर मातंग यूथे
श्रेष्ठः कष्टानि निष्ठे वयतु भृगु धुवां नील कण्ठांघ्रि निष्ठः । ३६ ।
भृगुवंश के श्रेष्ठ, भगवान के षष्ठ अवतार और विष्णु के अंशरूप परशुराम
स्वयं वैकुण्ठावतार के रूप में हमारा कष्ट दूर करें । वह नील कण्ठ महादेव के
भक्त और कार्त वीर्य अर्जुन के योद्धा रूपी हाथियों के लिये सिंह के समान
पराक्रमी थे । उन्होंने निष्ठुरता से कार्तवीर्य अर्जुन को मार डाला तथा पृथ्वी के
राजाओं को वृक्षों की तरह काट गिराने में कुठार कुण्ठित नहीं हुआ ।