सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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कृष्ण पाप से हमारी रक्षा करें । सूर्य छाया देवी के स्वामी हैं । कृष्ण की
भी छाया के समान कान्ति है । कृष्ण का चरण यमुना धोती है । यम (सूर्य पुत्र)
सूर्य की पूजा करते हैं । कृष्ण के हाथ में कमल शोभित होता है । सूर्य किरणों
(पाणि) से कमल खिल जाते हैं । कृष्ण वैनतेय गरुड़ पर चलते हैं । सूर्य के
आगे भी वैनतेय (अरुण) सारथी उन्हें ले जाते हैं कृष्ण राक्षसों (रजनीचर) का
नाश करते हैं । सूर्य रजनी (अन्धकार) का नाश करते हैं । अनन्त (शेष नाग)
की गोद में कृष्ण विश्राम करते हैं । सूर्य अनन्त आकाश में विचरण करते हैं ।
दोनों में सभी प्रकार का तेज है । दोनों कालिन्दी को सुख देते हैं (कालिन्दी कृष्ण
की एक पत्नी, कालिन्दी यमुना सूर्य की पुत्री) । दोनों सदा पद्म को आनन्दित
करते हैं ।
नवग्रह साम्य
पद् मान दैक सद् मामृतनिधिर वनी नन्दनश्चन्द्र वंशो
तंसः स्वर्गेशवर्गोडित चरण युगः सत्कवित्वा श्रयश्च
पत्री भूतो रूपत्री जननयन चया गोचरो नीचकेतु
ज्योतिष्मान् च्युतोऽस्मानवतु द भवभया दाशु विश्वग्रहात्मा । २९ ।
कृष्ण और सूर्य दोनों पद्मानन्द देने वाले हैं (कृष्ण के आंख, हाथ पैर आदि
पद्म के समान आनन्द दायक, उनके हाथ में पद्म है, पद्मा सन में उनके ध्यान का
आनन्द होता है । सूर्य किरणों से पद्म खिलता है) । कृष्ण और चन्द्र दोनों अमृत
के भण्डार हैं । कृष्ण अवनी नन्दन (पृथ्वी को आनन्द देने वाले ) हैं, मंगल भी
अवनि (पृथ्वी) के पुत्र हैं । कृष्ण चन्द्र वंशी है, बुध, भी चन्द्र पुत्र हैं । कृष्ण-वाहन
गरुड़ तथा सूर्य सारथी अरुण दोनों वैनतेय हैं । कृष्ण देववर्ग द्वारा पूजित हैं,
वृहस्पति भी उनके गुरु में पूजित हैं । कृष्ण सृष्टि निर्माता (कवि) या कविता का
विषय है । शुक्र भी कवि (रचयिता) हैं । शनि भी गृद्ध वाहन हैं । कृष्ण का
नित्य रूप आंख से नहीं देखा जा सकता जिस प्रकार राहु को नहीं देखा जा
सकता । कृष्ण नीच (दीन) लोगों के बन्धु हैं केतु भी नीचों का अधिपति है ।
कृष्ण और सूर्य दोनों सभी ग्रहों की आत्मा और प्रकाश वाले हैं ।
गोविन्द वन्दना
वन्देबन्दारु वृन्दारक निकर शिखा रत्न नक्षत्र राजी-
रज्यात्यादा रविन्द स्फुट नखर विधु ध्वस्त चेत स्तमस्कम्
कोटि क्रीडाण्ड भाण्ड प्रकट गुण घटैः सेवितं स्वावतारै
श्रीमद् गोविन्द मिन्दिवर रुचिर तनु मिन्दिरानन्द कन्दम् । ३० ।
मैं श्रीगोविन्द को प्रणाम करता हूँ । देवताओं के सिर उनके चरणों पर प्रणाम
करने के लिये झुकते हैं, तो उनके मुकुट पर नक्षत्रों जैसे प्रकाश रत्नों से चरण
कमल प्रकाशित हो जाते हैं । उनके नखों की चन्द्र समान उज्ज्वलता से हृदय