सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१९
का अन्धकार दूर हो जाता है । करोड़ो ब्रह्माण्ड उन्हीं के गुणों के प्रकाश है ।
उनकी पूजा उन्हीं के अवतार भी करते हैं । उनका शरीर नील कमल जैसा सुन्दर
है तथा लक्ष्मी के आनन्द का मूल हैं ।
अथ दशावतार स्तुति मीनावतार
मीनोऽलीनो नदीनोदर उषित ऋषि व्रात गोत्रातरीस्थं
त्रातुं सत्यव्रतं वातरदिह सुमहाहार्य सन्दोह देहः ।
वेदोद्धाराय योद्धा व्यधित वधमदश्चौर वृत्रालिशत्रो-
स्त्राणं तापत्रयान्न स्त्रिपुर हर पुरस्कार पात्रं तनोतु । ३१ ।
मीन अवतार धारी भगवान तीन तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से हमारी
रक्षा करें । विशाल आकार के कारण वे मीन रूप में समुद्र में भी नहीं छिप
सके । उन्होंने नौका रूप पृथ्वी में स्थित ऋषियों तथा दुःखी सत्यव्रत के उद्धार
के लिये अवतार लिया था । उन्होंने वेदों के उद्धार के लिये शंखासुर का वध
किया जो वृत्रशत्रु इन्द्र का शत्रु और चोर था । उनकी त्रिपुरारि भी पूजा करते हैं ।
कूर्मावतार
कूर्म्मेऽशर्म्मोपनिर्मोचयतु रयभर भ्रान्त मन्थस्थिराष्टृ-
द् भूरिग्रावाग्र संघटन घटित महापृष्ठ कण्डूति सौख्यः
पच्छंकोचच्छलनो च्छलित चल हृदां मिलनं स्वाश्रितेभ्यो-
ऽनर्थभ्यः प्रोत्थितास्येन च पवन समुत्थान मर्थापयन्नः । ३२ ।
कूर्म रूपी श्री जगन्नाथ हमारा अमंगल दूर करें । समुद्र मन्थन के लिये उनकी
विशाल पीठ पर मन्दराचल पर्वत के तेज घूमने से उनकी पीठ की खुजली दूर
होने का सुख हुआ । पैर संकोच करने से जिस प्रकार मन्दराचल को आश्रय मिला
था (उनकी पीठ पर) उसी प्रकार भ्रमित बुद्धि वाले लोगों की बुद्धि भी स्थिर
होती है । मुहं खोलकर हवा निकालने से समुद्र मन्थन में देवो और असुरों को
शक्ति मिली, इसी प्रकार लोगों को उस रूप से काम करने की शक्ति मिले ।
वाराहावतार
कोलं-कोलं कुगोलं दधदधि जलधी वाध उद्धृत्यदन्त
प्रान्तेऽशान्ते दुरन्ते प्रथम दितिसुते वृद्धदुर्द्धर्ष युद्धैः ।
देयादाया सहीनोद्रुहिण हरिहया द्यादितेयार्हणीयः
श्रेयो दाम्नाय गेय क्रतुनिचयमया मेघकायः श्रियः नः । ३३ ।
वाराह ने प्रबल और दुर्भेद्य दिति के प्रथम पुत्र हिरण्याक्ष जैसे दुर्वृत्त को मार
कर बिना कंठिनाई के ही समुद्र में नाव के समान अपने दांतों पर पृथ्वी को नीचे
से उठा लिया था । उस समय ब्रह्मा इन्द्र आदि ने उनकी पूजा की थी । वेद
उनकी स्तुति करते हैं । वह यज्ञ मय और अनन्त हैं । वराह रूपी भगवान हमारा