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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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४३० सिद्धान्त दर्पण
का चर कर्म कहा जा रहा है ।
सस्रोनिते ग्राह्य दिने दिनार्द्धं यत्स्या तदेवेष्ट दिनेऽब्दतः स्यात्
तदन्तरं यद्दिन सप्तकोत्थं तद् याम्य सौम्यायन योः क्रमेण । १८ ।
ग्राह्यदिन से ७ घटाने पर जो होगा उसी दिन का दिनार्द्ध इष्ट दिन के दिनार्ध
के बराबर होगा । अतः ७ दिन (३६५-३५८) सम्बन्धी दिनार्द्ध अन्तर को दक्षिण
उत्तरायण क्रम से तिथि, नक्षत्र और योग में जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
तिथ्यादिषु क्षेप्यमृणं विधेय मित्यं स्फुटं स्थूलमत प्रसिद्धम् ।
तिथ्यादिकं सूक्ष्ममितोऽपि कल्प्यं पूर्वोक्तरीत्यामृदुतुङ्ग बोधात् । १९ ।
इतना करने से प्राचीन सौर आदि मतों के अनुसार तिथि आदि स्फुट होगा ।
स्थूल मत से निकाले तिथि आदि से मन्दोच्च आदि के अनुसार पूर्वोक्त रीति से
सूक्ष्मतिति आदि की कल्पना करनी होगी ।
स्याद् ग्राह्य तिथ्यादि यदीह सूक्ष्मं स्थूली कृतिस्तस्य विधातु मिष्टा
व्यस्तेतु तुंगान्तर पाक्षिकाख्ये कार्ये, फले तत्र पुनः प्रयासात् । २० ।
यदि ग्राह्य तिथि आदि सूक्ष्म है तो इस विधि से उन्हें स्थूल करना चाहिये ।
तुंगान्तर और पाक्षिक फल निकाल कर विपरीत रीति से आदि में उसका संस्कार
करना होगा । यह कष्ट साध्य होने पर भी आवश्यक है ।
नागर्तवो (६८) नागदिवाकराश्च (१२५) गोर्थेन्दवः (१५९)
षट्कनृपाः (१६६) शरेन्द्रोः (१४५) भुजंगानन्दाश्च (९८)
कलम्बरामाः (३५) क्रमोत्क्रमादाद्य तिथैर्विनाड्यः । २१ ।
प्रतिपदा से सप्तमी की तिथियों में क्रमशः ६८, १२५, १५९, १६६, १४५, ९८
तथा ३५ कला (पल) जोड़ेगे तथा उल्टे क्रम से अष्टमी से चतुर्दशीतक की तिथियों
में घटायेंगे ।
कार्याधनर्णान्यथ बाहुलिप्ताः पूर्वोक्त तुंगान्तर केन्द्र जाताः
पक्षार्द्धजास्तत्त्वयमै (२२५) विभक्ता लब्धाः स्वखण्डास्तदनुक्रमोत्थाः । २२ ।
पक्षार्द्ध में पूर्वोक्त तुंगान्तर की भुजकला को २२५ से भाग देने पर फल तुंगान्तर
केन्द्र का भुज खण्ड होगा ।
वृहस्पते र्मन्दफलस्य लिप्ता यास्ताः शरघ्नात् विहताविनाड्यः
ज्ञेयाः पराः पक्षदले पुनस्ता हताः क्रमादादि तिथे स्त्र चन्द्रैः । २३ ।
इन खण्डों के अनुसार वृहस्पति का जितना मन्दफल कला होगी उसको ५
से गुणा कर २ से भाग देने पर पक्षार्द्ध की परा आदि होगी । इस परा आदि को
प्रतिपदा से सप्तमी तक क्रमशः १३,