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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 528

उपसंहार वर्णन ४३१
तत्त्वै (२-२५) कलम्बाग्निभि (३-३५) रथवेदै (४-४५)
द्व्यर्थै (५-५२) र्नगार्थै (६-५७) खरसै (७-६६०) र्विलोमम्
तथाष्टमीतः (६०।५७।५२।४५।३५।२५।१३)
खरसै (६०) र्विभक्ता वामं खतुंगान्तर वद् युतोनाः । २४ ।
२५,३५,४५,५७,६० से गुणा करेंगे । अष्टमी से चतुर्दशी तक क्रमशः
६०,५७,५२,४५,३५,२५,१३ से गुणा करेंगे । सभी फलों में ६० से भाग देने पर जो
फल होगा उसे तुंगान्तर फल के समान विपरीत रीति से सूक्ष्म फल में संस्कार
करने से स्थूल तिथि हो जायेगी ।
ग्राह्य इतिस्युस्तिथयो भमेवं तिथ्यन्त पूर्ण तदृणस्वनाड्यः
विश्वां (१३) शहीनास्तिथि भान्तयोर्यत् कालान्तरं
यात मनागतं स्यात् । २५ ।
ठीक उसी प्रकार तिथि अन्त में जो नक्षत्र पूर्ण होगा उसी तिथि में जो घटाने
या जोड़ने वाला दण्ड आदि होगा उसका १/१३ भाग कम कर व्यवहार करेंगे ।
तिथि अन्त में नक्षत्र पूर्ण नहीं होने पर तिथि और नक्षत्र के बीच के समय को
तद् घ्नं तिथि द्वन्द्व धनर्ण कालान्तरेण षष्ठ्याप्त मितैष्य दृष्ट्या
न्यूनाधिकं कार्यमथर्क्षकेषु ग्राह्येषु शोध्यः क्रमतो विनाड्यः । २६ ।
नक्षत्र से संबन्धित दोनों तिथियों के धन या ऋण कालान्तर से गुणा कर ६०
से भाग देने पर गत नक्षत्र में योग या बाकी (गम्य) में घटायेंगे । ग्राह्य स्थूल
नक्षत्र होगा ।
षड् बाहवः (२६) षण् निगमा (४६) स्त्रिबाणा (५३)
रसाब्धयो (४६) ऽङ्गाक्षि (२६) मितामृगादेः
मासेषुकर्कादिषु योजनीया
यथास्थिताः कार्मुक युग्मयोस्तु । २७ ।
ग्राह्य नक्षत्र में मकर से आरम्भ कर ५ मासों में क्रमशः २६, ४६, ५३, ४६,
२६ पल (लिप्ता) घटाना पड़ेगा । कर्क आदि ५ मासों में इन्हें क्रमशः जोड़ना
पड़ेगा । धनु और मिथुन मास में योग या घटाव नहीं होता है ।
योगेऽत्र तिथ्युक्त फलान्य गांश (७)
हीनानि कुर्याद भ इवा नुपातम्
ग्राह्येभ्य इष्टानि पुरोक्त वत् स्युः
स्थूलानि सूक्ष्मी करणन्तु तेषाम् । २८ ।
विष्कुम्भ आदि योग निकालने के समय तिथि के लिये लिखे गये धन या
ऋण फल से उसका १/७ भाग कर व्यवहार करेंगे । नक्षत्र के गत या गम्य भाग
के समान गत या गम्य कालान्तर में अनुपात किया जायेगा । इस प्रकार ग्राह्यतिथि