सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
संवत्सरादि वर्णनम् ४०३
इस प्रकार के ३० सौर दिनों का एक सौर मास होता है । इस प्रकार १२ सौर
मासों का एक सौर वर्ष होता है ।
सौर मानेन गृह्यन्ते संक्रमत्वर्यनादयः
देवासुर द्युरजनी युगमन्वन्तरक्षयाः । ४२ ।
सौर मान से संक्रान्ति, अयन और ऋतु आदि का पालन होता है । देवता
और असुरों का दिन और रात, युग, मन्वन्तर आदि की समाप्ति भी इसी सौर मान
से होती है ।
विवाह व्रत चूड़ादि वेश्मारम्भादयः क्रिया
मासाब्द नियमाः पर्वाण्यपि देशविशेषतः । ४३ ।
विवाह, व्रत, चूड़ा कर्म, गृहारम्भ आदि काम, मास, वर्ष, व्रतादि का पालन,
पर्व आदि का पालन किसी किसी देश में सौर मान से भी होता है । (सामान्यतः
चान्द्र मान से होता है ऐसा लिखा गया है)
सौर-तुलादिषडशी (८६) त्यंशैः षडशीति मुखं दिनम्
तञ्चतुष्टय मेवस्यात् द्विस्व भावेषु राशिषु । इति । ४४ ।
सूर्य सिद्धान्त में-तुला आरम्भ से ८६ अंश तक सूर्य रहने पर (अर्थात् ८६
सौर दिनों तक) षडशीति मुख नामक मास होता है । यह वर्ष में ४ बार होता है
और रवि द्विस्वभाव (द्वात्मक राशि ३,६,९,१२) में रहने पर ही होता है । (उद्धरण
समाप्त होता है ) ।
धनुषः सप्त विंशोऽश स्त्रयो विंशोऽण्डजस्य च
द्वन्दू से कोन विंशश्च स्त्रियाः पञ्चदशः स्मृतः । ४५ ।
धनु राशि का २७ अंश, मीन का २३ अंश, मिथुन का १९ अंश तथा कन्या
का १५ अंश में
तत्तन्मासेषु सूर्यस्य षडशीति मुखान्वयात् ।
षडशीत्याख्यया प्रोक्ता द्वात्मक क्षेत्र संक्रमाः । ४६ ।
उन मासों का सूर्य जाने से और ये स्थान ८६-८६ अंशों के बाद पड़ने से
इन (संक्रान्तियों) को षडशीति मुख कहते हैं । ये सभी द्वात्मक राशियों में ही
होती हैं ।
ओज पादादि चरयोः संक्रमौ विषवाभिधौ
युग्मादि चरये याम्य सौम्या यन तयोदितौ । ४७ ।
विषम पद में स्थित दो चर राशियों (मेष और तुला) में रवि की संक्रान्ति
को विषुव संक्रान्ति कहते हैं । सम पद में स्थित दो चर राशियों (कर्क और मकर)
संक्रान्ति को क्रमशः दक्षिण और उत्तर अयन संक्रान्ति कहा जाता है ।
४०४ सिद्धान्त दर्पण
चर द्वात्मकयो र्मध्ये स्थिर राशि चतुष्टयम् ।
भानो र्विष्णुपदी संज्ञा स्तद् प्रवेशाः प्रकीर्त्तिताः । ४८ ।
चर और द्वात्मक राशियों के बीच में जो चार राशियां (वृश्चिक, कुम्भ, वृष
और सिंह) हैं उनमें रवि के प्रवेश से विष्णुपदी संक्रान्ति होती है ।
पूर्वोक्त क्रम संसिद्धा रवि संक्रान्ति सम्भवः
पुण्य नाड्यस्त्रय स्त्रिंशत् स्वमध्य स्थार्क संक्रमः । ४९ ।
एक राशि का अन्तिम बिन्दु ही दूसरी राशि का आदि बिन्दु है । उस बिन्दु
को रवि बिम्ब की परिधि स्पर्श करने से संक्रमण या संक्रान्ति का आरम्भ होता
है । रवि बिम्ब का दूसरी तरफ का अन्तिम बिन्दु उस बिन्दु से लगने पर पूरा
रवि संक्रमण बिन्दु पार कर जाता है । इसमें ३३ दण्ड (रवि बिम्ब व्यास ३३
कला पार करने का समय) लगता है । अतः यह ३३ दण्ड ही संक्रान्ति का पुण्य
काल है ।
ग्राह्या दशसु संक्रान्तिष्वयने दक्षिणेतु ताः
अन्तःस्थ संक्रमाः सौम्यायनेत्वादिस्य संक्रमाः । ५० ।
दस संक्रान्ति में संक्रान्ति के आरम्भ से ३३ दण्ड ही पुण्य काल हैं । दक्षिणायन
संक्रमण में अन्तिम १६/३० दण्ड तथा उत्तरायण संक्रमण में प्रथम आधा (१६/३०)
अति पुण्यतमाः प्रोक्ताः संक्रमासन्न नाड़िकाः
चलना सन्नता यत्र दिवास्नानादिकं तदा । ५१ ।
अत्यन्त पुण्य काल होता है । यह एक राशि से दूसरी राशि में संचार का
समय है । संक्रान्ति समय दिन में पड़ने से स्नान दान आदि किया जाता है ।
तन्निशार्धादधश्चोर्द्धं सञ्चारे प्राक् परं ततः
आसन्न द्यु दलं पुण्यं निशीथे चेत्तदा तिथैः । ५२ ।
रात्रि के पूर्वार्द्ध में संक्रान्ति होने से उसके पूर्व दिन के दूसरे अर्द्ध तथा रात्रि
के दूसरे अर्ध में संक्रान्ति होने पर अगले दिन के प्रथम अर्द्ध में पुण्यकाल होता
है ।
संक्रान्ति काल निष्ठाया यदिने महती स्थितिः
तत्र कार्याः क्रियाएष विचारोह्या यनादृते । ५३ ।
ठीक आधी रात को संक्रान्ति पड़ने से इसका अधिक भाग जिस दिन होता
है उसी दिन उतने समय पुण्य काल होता है । अतः उसी समय पुण्य क्रिया
करनी चाहिये । अयन संक्रान्ति में इस प्रकार का विचार नहीं होता है ।
नक्रौ याम्यायने पूर्वदिनस्यान्त्य दलं मतम् ।
सौम्या यने 'पर दिन स्यादिमं पुण्यदं दलम् । ५४ ।
संवत्सरादि वर्णनम् ४०५
याम्य अयन या कर्क संक्रान्ति रात में होने से पूर्व दिन का द्वितीयार्द्ध तथा
उत्तरायण (मकर) संक्रान्ति रात में होने से अगले दिन का पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता
है।
अहः संक्रमणे पुण्य महः कृत् संप्रकीर्तितम्
स्मार्त्तं स्तथापि संक्रान्ते रासत्ति र्बहुमन्यते । ५५ ।
दिन में संक्रान्ति होने से सारा दिन दिन पुण्य काल होता है । यह स्मार्त्त
मत होने पर भी संक्रमण का निकट वर्ती समय निश्चय बहुत फल दायक है ।
उक्तो विधेरयं कालो निषेधे त्वामिषादिनः
पूर्वास्त्रिंशत्परास्त्रिंशद् ग्राह्याः पर्वाक्ष नाड़िकाः । ५६ ।
संक्रान्ति पर्व दिन होने के कारण पूर्वोक्त स्नान, दान, आदि के अतिरिक्त
इसमें आमिष भोजन करना मना है । आमिष भोजन का निषेध संक्रान्ति से ३०
दण्ड पहले और उसके ३० दण्ड बाद तक, इस प्रकार कुल ६० दण्ड तक है ।
मासान्तरूय निरंशा रूयौ मासस्यान्त्यादिमौलवौ
यात्रोद् वाहादि कार्येषु त्याज्या कल्याण मिच्छभिः । ५७ ।
किसी राशि का.अन्तिम (३० वां) अंश मासान्त तथा प्रथम अंश निरंश कहा
जाता है । इन दो अंशों में रवि रहने से मासान्त तथा निरंश काल होता है ।
कल्याण चाहने वाले इन दो दिनों में यात्रा विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करते
हैं।
बिम्बान्तर्वर्त्तिनः पुंसः संक्रान्ति समयोनृभिः
त्रुटेः सहस्र भागत्वादवगन्तुं न शक्यते । ५८ ।
सूर्य बिम्ब के केन्द्र बिन्दु (पुरुष) का संक्रमण काल एक त्रुटि का हजारवां
भाग होता है । इसको जानना मनुष्य के लिये सम्भव नहीं है ।
सौरे-भचक्र नाभौ विषुव द्वितयं समसूत्रगम्
आयन द्वितयं तैव गतस्र परमास्तताः । इति । ५९ ।
भचक्र की नाभि या केन्द्र स्थल में होने के कारण दो विषुव संक्रान्ति तथा
दो अयन संक्रानति ये चार अति श्रेष्ठ हैं । सायन मेषादि तथा तुलादि जिस प्रकार
मेरु से बराबर दूरी (९०° अंश) पर है उसी प्रकार सायन कर्क तथा मकर आदि
भी ध्रुव से बराबर दूरी पर हैं। अतः इनका माहात्म्य भी समान है । (सूर्य सिद्धान्त
के अनुसार)
सौम्यायनान्मास युगैः शिशिरादि ऋतवस्त्रयः
तथैव याम्यायनतः प्रावृडाद्यास्त्रयोमताः । ६० ।
उत्तर अयन से दो दो मास अर्थात् मकर संक्रान्ति (सायन) से दो-दो सौर
मास तक शीत आदि तीन ऋतुएं होंगी (६ मास तक) इसी प्रकार सायन कर्क
| ४०६ | सिद्धान्त दर्पण |
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*आरम्भ में २-२ मास की वर्षा आदि ३ ऋतुएं होगी ।
अथ पञ्चविधाब्दानां रवि मध्यम सावनैः
दिनैर्मानानि कथ्यन्ते मध्य भुक्त्यनुसारतः । ६१ ।
रवि की मध्यम गति के अनुसार पांच प्रकार के वर्ष में मध्यम सावन दिनों
की संख्या कही जा रही है ।
द्व्यक्षिनाड् यधिकाब्ध्यर्थ रामा (३५४।२२) श्चान्द्राब्द वासराः
सैकनाड्यंक बाणाग्नि संख्या (३५९।१) नक्षत्र वर्ष जाः । ६२ ।
चान्द्र वर्ष में (३५४।२२) तथा नाक्षत्र वर्ष में (३५९।१) सावन दिन होते हैं ।
सावनाब्दस्य ते षष्ठि समन्वित शतत्रयम् । (३६०)
स पञ्च दण्ड रूपाङ्गवह्वयो (३६१।५) जैववर्ष जाः । ६३ ।
सावन वर्ष में (३६०।०) तथा बार्हस्पत्य वर्ष में (३६१।५) सावन दिन होते
हैं ।
सौराब्द वासराः पञ्चषष्ट्युत्तर शत त्रयम् । (३६५)
तिथिभिः (१५) क्ष्माग्निभि (३१) श्वैतैः (३१)
सिद्धै (२४) दण्डादिभिर्यतम् । ६४ ।
सौर वर्ष में ३६५।१५।३१।३१।२४ सावन दिन होते हैं ।
ऋक्षेण भगणं केचिदार्द्धं मासं प्रचक्षते ।
अष्ट दण्डोन नागाक्षि गुणासद् वर्ष वासराः । (३२७।५२) । ६५ ।
कुछ लोग चन्द्र भगण काल को नाक्षत्र मास कहते हैं । इस मत से नाक्षत्र
वर्ष (१२ नक्षत्र मासों में ) सावन दिन संख्या ३२७।५२ है ।
मनूनां राज्य कालोऽत्र मानवं मान मुच्यते ।
न पृथग् दिन मासादि नियमस्तत्र सम्मतः । ६६ ।
स्वायम्भुव आदि मनु प्रत्येक जितने दिन राज्य करते हैं, उस काल को मनु
कहा जाता है । इसमें अलग दिन, मास आदि की गणना नहीं है ।
चान्द्रो मासः पितृदिनं यतैः खांगगुणैः (३६०) समा
सावनैस्तद् प्रमाणं तद्द्वा पाग्नि रस दिग् दिनैः (१०,६३१) । ६७ ।
एक चान्द्र मास को ही पितरों का अहोरात्र कहा जाता है। इस प्रकार के ३६०
दिनों का पितृवर्ष होता है । एक पितृवर्ष में (१०,६३१) सावन दिन होते हैं ।
देवमानं यदेवैतदासुरं परिकीर्तितम्
सौराब्दस्तदहोरात्रो दिनरात्रिविपर्ययात् । ६८ ।
देवताओं और असुरों का मान बराबर है, पर उनका दिन और रात विपरीत
संवत्सरादि वर्णनम् ४०७
क्रम से होते हैं, जिस समय एक का दिन (६ सौर मास का ) उस समय दूसरे
की रात्रि होती है ।
स षष्ठि त्रिशताहोभि (३६०) स्तदब्दः सतु सावनैः
सम्मितः साङ्कदण्डाग्नि गोशक्राग्नि कुभि (१३१४९३१९) दिनैः । ६९ ।
इस प्रकार के ३६० दैव (या आसुर) दिनों का दिव्य वर्ष होता है। जिसमें
(१,३१,४९३१९) सावन दिन होते हैं ।
सौराब्दे रर्बुद गुणैः कृतदिक् चन्द्र वह्निभिः (३११०४०,००,००,००,०००)
सम्मितं ब्रह्मणो वर्षं पुरोक्तास्त दिनादयः । ७० ।
ब्रह्मा का वर्ष (३१,१०,४०,००,००,००,०००) सौर वर्ष होते हैं । ब्रह्मा के दिन
के बारे में कहा जा चुका है ।
मनूनां यत् पृथङ्मानं हरिवंशेऽस्तितद्रवेः ।
गत्याप्यशक्यमाने तुं लिखाभ्यार्षोक्ति गौरवात् । ७१ ।
हरिवंश में मनु का जो अलग मान दिया गया है वह सूर्य की गति से नहीं
निकाला जा सकता है । ऋषि वचन के प्रति सम्मान के कारण में उसे यहां लिख
रहा हूँ ।
यथा हरिवंशे-दिव्यमब्दं दश गुणमहोरात्रं मनोः स्मृतम्
अहोरात्रं दश गुणं मानवः पक्ष उच्यते । ७२ ।
हरिवंश पुराण के अनुसार -१० दिव्य वर्षों का मनु का एक अहोरात्र होता
है । १० मनु अहोरात्र का मनु का १ पक्ष होता है ।
पक्षो दस गुणो मासो मासै द्वादशभिर्गुणैः
ऋतुर्मनूनां संप्रोक्तः प्राज्ञैस्तत्वार्थ दर्शिभिः । ७३ ।
मनु के १० पक्षों का मनु मास, १२ मनु मास का मनु की एक ऋतु होती
है-ऐसा तत्त्व दर्शी ज्ञानियों ने कहा है ।
कालव्याप्ति र्बहुविधा श्रौत स्मार्त्तेषु कर्मसु
तत् शुद्धिश्च विवाहादौ . न्युक्ता स्मृत्युक्ति भावतः । ७४ ।
वैदिक और स्मार्त्त कर्मों में अनेक प्रकार का काल विभाग हैं । स्मृति में इस
प्रकार की काल व्यवस्था का वर्णन होने के कारण विवाह आदि में काल शुद्धि
की व्यवस्था यहां नहीं कही जा रही है ।
चन्द्रगत्यनुसारेण जलोल्लासान्महाम्बुधेः
गंगाद्यवृद्धि नियमः क्वाचित्कत्वादलेखिना । ७५ ।
चन्द्र गति के अनुसार महासागर का पानी ऊपर उठता है । अतः गंगा आदि
नदियों का पानी भी बढ़ता होगा । परन्तु यह विचार ठीक नहीं होने के कारण
४०८ सिद्धांत दर्पण
इस विषय में नहीं लिखा जा रहा है ।
भास्वत्सम्मुख भाग् दले द्युति भृतोऽन्यत्रात्मनश्छायया
व्याप्तस्येन्दव गोलकस्य सतत क्ष्मा सम्मुखै कार्द्धतः
सूर्या शांत्यजतोऽयतो धवलतां वृद्धिक्षया वीक्षते
लोकस्तत् पितरः क्व सम्मुख दले मासार्क पश्चाद् भ्रमम् । ७६ ।
चन्द्र का जो गोलार्द्ध सूर्य के समाने होता है वह सूर्य किरण से प्रकाशित
होता है तथा विपरीत दिशा का आधा भाग छाया में रहता है । छाया अर्द्ध के
सामने पृथ्वी के लोग देखते हैं, कि चन्द्र सूर्य से दूर जाते समय उसकी कला
बढ़ती जाती है । दूसरी दिशा में (चन्द्र सूर्य के निकट) आने पर चन्द्र की कला
घटती है । क्या चन्द्र मण्डल पर रहने वाले पितर भी रवि की एक मास तक
पश्चिम दिशा की गति देख पाते हैं ?
नव्याभ्र भ्रमर प्रभाकर सुता पाथः प्रफुल्लोत्पलः
प्रालेयांशुकलंक कजलमहानीलाश्म नीलोज्वलः
शम्पा चम्पक नीप कुंकुमतमी चामीकरा भाम्बरः
कृष्णः संसृति शर्करा ध्वजनितं मुष्णातु, तृष्णां मम । ७७ ।
नया काला मेष, भ्रमर, यमुना जल, प्रफुल्ल नील कमल, चन्द्र का काला
कंलक, कजल और नीलमणि के समान उज्ज्वल, बिजली, चम्पाफूल, कुकुम,
हल्दी और सोने के समान पीताम्बर धारण करने वाले कृष्ण जगन्नाथ संसार रूपी
लोभ द्वारा जन्मी मेरी तृष्णा को नष्ट करे ।
इत्युत्कलोज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
द्वाविंशकः प्रथित काल इतः प्रकाशः । ७८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्रीचन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालकों के ज्ञान के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
काल वर्णन सम्बन्धी २२ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
त्रयोविंश प्रकाश
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन
या वाग् वाग् ब्रह्म शर्वेडित गुणविततेः श्रीपते वर्णनाढ्या
सास्याद् विश्वाशुभघ्नी सततमपियुता यद्यवद् गव्यपद्यैः
या तद्रक्ता सुपृक्ता पि च सुभग पदै स्त्यज्यते सद्भिरेशा
तस्मात् कृष्णा चले शामल गुण जलधो वर्णनीयोऽत्रविन्दुः । १ ।
सरस्वती, ब्रह्मा और शिव द्वारा पूजित गुणों के समुद्र लक्ष्मीपति की गद्य पद्य
पूर्ण वाक्यों में विस्तृत वर्णन है । वह सारे संसार का क्लेश दूर कर सकते हैं,
इसमें सन्देह नहीं है ।
दूसरे अर्थ से जो वाक्य अत्यन्त सुन्दर पद विन्यास और लय से युक्त हैं ।
पर उसमें भगवान् का गुण कीर्तन नहीं है उसको सज्जन ग्रहण नहीं करते हैं ।
अतः विशुद्ध गुण के सागर नीलाचल नाथ श्री जगन्नाथ का बहुत थोड़ा
वर्णन यहां किया गया है । गुण के सागर होने के कारण सभी गुणों का वर्णन
नहीं हो सकता ।
उत्कल
यत्रक्षेत्रं पवित्रं विलसत सितरुङ् मित्रनेत्रस्य गात्रं
गोत्रा यत्रातिमात्रा स्तदवयव सृती दीपवत्यो विचित्राः
स्वस्थानस्थाः पदस्थापित निजजनता देवताः सन्ति नित्याः
मर्त्याःस्मार्ताः स्मरार्ता हरिचरण रता श्रोत्कलः स्तात्कलिघ्नः । २ ।
जिस देश में कमल नेत्र श्रीकृष्ण का शरीर तथा पवित्र क्षेत्र है, जिसके
अंशरूप में अनेक पर्वत हैं जहां देवताओं के मन्दिरों में सदा दीपक जलते हैं,
जहां देवी देवता अपने अपने मन्दिरों में स्थित होकर भी भक्तों को उच्च पद पर
स्थापित करते हैं, जहां के लोग स्मार्त काम कर नाम स्मरण और प्रभु चरण सेवा
में तत्पर हैं । वह उत्कल देश कलि के दोषों का नाश करे ।
स्तव्याभव्या अभव्या अपि वचन चयैर्नव्य नवैश्च दिव्यै
र्वास्तव्ययत् पृथिव्या मवनत वदनै व्योम्नि निर्वर्ण्यमाना
बाहू व्यूहाग्र विभ्राजित वन जगदा कम्बुचक्रा इवेङ्गे
रौडूः प्रौढः प्रभावो जयति परिवढः सर्वदेशस्य सोऽयम् । २ ।
जहां के निवासी अयोग्य होने पर भी हाथों में चक्र गदा और पद्म धारण
करने वाले विष्णु की तरह दीखते हैं । देवगण आकाश में झुक कर उनकी विचित्र
और बड़े शब्दों में प्रशंसा करते उनको योग्य कहते हैं, वह औड्र देश बहुत प्राचीन
काल से विख्यात है और अन्य देशों से उच्च स्थान पर है ।
४१० · सिद्धान्त दर्पण
पुरुषोत्तम और नीलाद्रि
नानोद्यानोद्यतानो कह वहल दलच्छाय शान्तात पार्त्ति
र्नित्यप्रत्यग्र सौदावलिद लित कला नाथभृत् शैल कान्तिः
अश्रान्त भ्रान्त वात प्रमथित पथिक श्रान्ति रक्षैम शान्ति
कुर्यात् पर्यन्त गर्ज जलधि रधिरुचिः कम्बुभाः कापितुर्नः । ४ ।
जहां असंख्य उद्यानों और उनमें घने वृक्षों के पत्रों की छाया से सूर्य के ताप
का कष्ट नहीं होता । जहां के नये प्रासादों की शोभा कैलाश पर्वत से अधिक है,
जहां हमेशा बहता पवन पथिकों की थकावट दूर करता है ।
जिसके एक तरफ शब्द करता हुआ समुद्र है, तथा जो शंख के समान शोभित
पुरुषोत्तम क्षेत्र हैं वहां हम लोगों का निर्वाण और शान्ति हो ।
यत्रामर्त्याः परित्राकृत सुकत जनत्रासिनोऽ प्येत्यमर्त्यान्
वित्रस्ता वेत्रहस्ता ननुविवृति कृतः प्रेक्ष्य संरुयेच्छवःस्युः
देवा देवाधि देवानन नलिन दृशः सन्ति नानात्मभाजः
कुर्यात् पर्याप्त वीर्या समविषम सिता हास्य धुर्या पुरी नः । ५ ।
वहां पूर्व जन्म में अकर्म करने के भय से हाथ में बेत लेकर स्तुति करते हुये
मनुष्यों से देवता गण मित्रता चाहते हैं, जहां पर अनेक रूपों में स्थिति देवगण
कमलनयन प्रभु को देखते रहते हैं, उस पुरी में अत्यन्त बली और नीलगिरि का
भार उठाने में समर्थ प्रभु जगन्नाथ हमारा मंगल करें ।
अन्तर्वेदी त्रिवेदी निगदितमहिमाधित्यका नित्यकान्ता
स्तुङ्गाः शृंगाणि यस्यामर निकरगृहः पावनी यद् वनीश्रीः
प्राकारो यत्प्रपातः प्रमथ पतुनुतो पत्यका पूर्यदीया
स श्री शम्भोदमारी वितरतु जगतां मेचकं मेचकाद्रिः । ६ ।
जिस अन्तर्यामी की महिमा तीनों वेदों में उच्चप्रशंसित है, जिसकी उन्नत
अधित्यका (पर्वत की उच्च भूमि) सदा रमणीय है, जिसकी चोटियों पर देवतागण
रहते हैं, जिसकी भीड़ से लोग पवित्र हो जाते हैं, जिसकी प्राचीर पर्वत समान
ऊंची है, जिसकी तट भूमि की शिव सदा प्रशंसा करते हैं, तथा जिसकी पुरी
कृष्ण रूपी मेघ के भार से आक्रान्त है उसी नीलगिरि के नाथ हमारा मंगल करें ।
पताका
तुंग प्रासाद श्रृंग प्रतिलव पवनान्दोलिता वैजयन्ती
वांच्छाकल्पद्रुम तीर्थेश्वर शिरसि चरत् पल्लवं श्री जयन्ती
याम्य स्वाम्याति ताम्यञ्जन वृजिन चमूमूर्जितां तर्जयन्ती
पायान्माया भवाब्ध श्रममिव शमिनां विजनैमार्जयन्ती । ७ ।
श्री जगन्नाथ के ऊंचे मन्दिर की चोटी पर प्रतिक्षण वैजयन्ती पताका हवा
से फर-फर होती है । तीर्थेश्वर इच्छा कल्पवृक्ष के सिर पर हिलते हुए वट के
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४११
पत्तों की शोभा को भी इस पताका की शोभा पराजित करती है । जो पापी लोगों
को अत्यन्त पीड़ित करने वाली यमराज की सेना को भय देते हैं वे संसार पथ
पर थके अपने भक्तों की थकावट दूर कर शान्ति प्रदान करें ।
पताका दण्ड
शौण्डानां दण्डपाणेरपि चरणयुषां दण्डदः केतुदण्डः
श्रुण्डाल स्योर्द्धर्व गत्या अपि किमु विदलन्न्रण्ड मार्तण्ड बिम्बः
चञ्चच्चञ्चत्पताकाश्रय विधुति मिषाद् बाहुराहूत्य लोकः
प्रासादस्यैव दूरादपनयतुभयं पंकतः किंकराणाम् । ८ ।
जो यम के पद सेवक यम दूतों को दण्ड देता है, पताका की ऊर्ध्व गति से
जो प्रखर सूर्य बिम्ब का उत्ताप कम करता है, जो अति स्मणीय भाव से हिलकर
मानों दूर के लोंगो को हाथ हिलाकर बुला रहा है, और मन्दिर की भुजा के समान
है, वह पताकादण्ड हम अकिञ्चन सेवकों के पाप के भय को दूर करे ।
चक्र
चक्रं तन्नक्र शक्र क्रकच कटुतनु क्रान्त्य विक्रान्ति दन्ती
क्रान्ति प्रान्ताति शान्ता जित महित महीः संहरेदं हसां नः
संघसंगात पाता दवितु मविकलं हन्त पातत्य भाजो
भ्राजन् प्रासाद राजोपरि पतितदृशः श्रीशतुर्यां शरूपम् । ९ ।
जिस चक्र ने गज को मुक्त करने के लिए ग्राह के शरीर में आरी तरह घुस
कर काट डाला तथा उसके बाद भी अविकृत शान्त और अपराजित रहा, जो
लक्ष्मीपति भगवान के चतुर्भुज रूप में विद्यमान है तथा मन्दिर के ऊपर चमक
रहा है वह अपने दर्शन करने वाले पापियों के प्रसार और संकट को पूरी तरह
नष्ट करे ।
कलश
पर्यन्तोत्कीर्णनानाभरण चणतनुश्चातनुंः शीतदायी
सोऽन्तः सन्ताप शान्त्यै विलसतु कलशः सत्सुधाधारधामा
यः पद्माकान्त सद्मा भवविवुध शिरोगर्भ काकार चक्रा
क्रान्तश्रूडेव निः श्रेयस पथ पथिकानर्थहद् हृद्र कुम्भः । १० ।
चक्र के नीचे स्थित स्वर्ण कुम्भ ही मन्दिर का कलश है, जो विशाल अमृत
से भरा हुआ है तथा उस पर अनेक प्रकार के चित्र बने हुए हैं, वह सुखदायी
तथा मोक्षमार्ग पर चले वालों का अनर्थ दूर करता है । जगन्नाथ मन्दिर के मस्तक
के केन्द्र में गोल ढक्कन के समान रहने के कारण वह मन्दिर की चूड़ी के समान
दीखता है । वह हमारे हृदय के दुख समूह का नाश करने के लिए सदा विराजमान
रहे ।
४१२ सिद्धान्त दर्पण
आवला बेड़ा
सद वण्टा कर्परात्या मलकत तरति द्योतिता द्योतयन्ती
प्रासादस्थूल मूर्त्तेर्भवतु भगवतः सर्वतोवक्त्र भावम्
याष्टाशोत्यंग जुष्टाष्ट परिगुण चतुः षष्टिमुष्ट्यन्त निष्ठैः
दृष्ट्या भ्रष्टं शिरो वेष्टनमपि तनुते सोम मानिष्ट नष्ट्यै । ११ ।
मन्दिर कलश के नीचे आँवला बेड़ा बड़े घण्टे के खोल के समान तथा
मन्दिर रूपी शरीर का कपाल है । इसके ८८ अंग (आंवला) हैं तथा ६४x८ =
५१२ मुट्ठी दूर से देखने वाले लोगों के सिर से पगड़ी गिर जाती है । यह हमारा
अनिष्ट दूर करे ।
देउल कण्ठ
स्पष्टा स्पष्टा सुकाष्ठा स्वनुघटित पतच्छ्रेष्ठ कण्ठीरवेन्द्रैः
पश्याद्दिश्या घनागप्रभव परिवभोल्लुण्ठना कुण्ठवीर्यैः
दृष्टि प्रेष्ठकृष्ट प्रतिकृति खलुः सुष्ठु नोऽ धिष्ठिताङ्गि
वैकुण्ठागार कण्ठो विघट यतु हठात् कष्टदादृष्ट सृष्टिम् । १२ ।
जगन्नाथ मन्दिर का कण्ठ शीघ्र हमारे कष्टप्रद प्रारब्ध कर्म को अच्छी प्रकार
नष्ट कर दे । इस कण्ठ के आठ दिशाओं में पाप रूपी दिग्गजों को नष्ट करने के
लिए श्रेष्ठ सिंह इनके ऊपर अंकित दीखते हैं । मन्दिर से ये गज और सिंह लगे
रहने से इनका आकार अत्यन्त सुन्दर अतुलनीय दीखता है ।
मन्दिर
जम्बूद्वीपा स्वभूपाखिल भुवन जयस्तम्भ सम्भार भारी
गर्भस्थानन्त विश्वम्भर शरणतया वाञ्चयातीत मानः ।
सांगो पांगोऽति तुंगोऽनुगुणपृथुलतः प्रेक्षकानन्दकन्दः
प्रासादेशोऽनिशं नःस्पृशतु विश दृशः स्वाशयं श्रीश मूर्तिः । १३ ।
समस्त जम्बूद्वीप के सभी राजाओं पर जीत के स्तम्भ के रूप में उनके भार
से आक्रान्त होकर यह प्रासाद अपने गर्भ में जगन्नाथ कोरख उनकी शरण पाने
से अत्यन्त सम्मानित हुआ है । यह प्रासाद अत्यन्त ऊंचा है तथा इसका कोई भी
अंग पतला या शक्ति हीन नहीं है । यह जगन्नाथ की मूर्ति के समान अतुलनीय
और दर्शकों को आनन्द देने वाला है ।
प्राकार द्वन्द्वमध्य प्रतत समदृशत् कुट्टि माट्टापकृष्ट
प्रासाद वेष्टिनोऽधस्तृत मसृणलसन्नुद्गत् पाषाण पट्टः
नाना कारावतारैः हरिण नरवरैः कुञ्जरै रञ्जितोऽङ्गः
पुञ्जं कुञ्जाधिराजालय उपचयिनं व्यञ्जयेच्छर्मणा नः । १४ ।
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१३
इसके दो प्राचीरों के बीच की भूमि समान कटे पत्थरों से ढंकी है । उसके
ऊपर छोटे-छोटे देव प्रसाद हैं । ठीक नीचे चिकना संगमर्मर पत्थर है । मन्दिर
की दीवारों पर मत्स्य, कच्छप आदि अनेक अवतार, सिंह और हाथी मूर्त्ति रखी
हुई है । नगेन्द्र श्रीकृष्ण के घर इस मन्दिर से हम लोगों का सुख बढ़ता रहे ।
प्रग्रीवं सोर्ध्व भागं शिखर मृजुतरं मञ्जरी मञ्जुलाभां
भित्ति ध्वस्ताघभीतिं त्रितनुतनुगृहान् वक्त्रशालां विशालाम्
पीठं शिष्टाभिजुष्टं गृहमति विततं श्री जगन्मोहनारूयं
भोगार्थं मण्डपञ्चाद् भूत मवनी धवस्याश्रये प्रश्रयेण । १५ ।
पृथ्वी पति जगन्नाथ की सभी चीजों का मैं भक्ति और उत्कण्ठा के साथ
आश्रय लेता हूँ । मन्दिर के कण्ठ के नीचे (छाती के ऊपरी भाग-प्रग्रीव) लगे
हुए सीधे शिखरों के समूह अत्यन्त सुन्दर दीखते हैं । मन्दिर के गोलाकार दीवाल
को देख कर सभी पाप नष्ट होते हैं । पाताल में स्थित तीन छोटे घर (मन्दिर के
पास जिसमें गणेश, वामन और वाराह हैं) उसके बाद विशाल मुख शाला ।
इसके बाद जगन्मोहन पीठ है जहां के विशाल घर में शिष्ट लोग बैठते हैं । अन्त
में भोग मण्डप है ।
प्रेक्षन शंखस्य नाभौ सतत गति वशाद् बाहु दण्डैः प्रचण्डैः
शाखाभिश्चण्डरोति स्तनुजनिज जनान् वासयन् किं विदूरात्
कल्पान्तेऽप्यन्तहीनः सकल कलुषहत् सिन्धु राजोऽधिराधो
न्यग्रोधः क्रोध कामाद्यरी परिभव कृद् भूत वर्गस्य भूयात् । १६ ।
मन्दिर का कल्पवट प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होता है और सभी प्रकार के
पापों का नाश करता है । यह महासागर के तीर पर अवस्थित है । यह प्राणियों
के शत्रु काम, क्रोध आदि को परास्त करे । शंख क्षेत्र की नाभि में रह कर यह
कल्प वृक्ष पवन से अपनी भुज दण्ड रूपी शाखाओं से सूर्यपुत्र यम के दूतों को
दूर से ही भगा देता है ।
भद्राभूमाधव श्रीमुषल भृदरिभिः शोभितः श्रीवपुष्मा
नष्मानुष्णां शुजोषाम गम शमनघनः पातु देवाधिदेवः
जन्तुर्मन्तुनिहन्तुं प्रभवति शतशोऽह्नाय यन्नाम गृहन्
पश्यन् श्रश्यत्य वश्यं विषयजल निधौ नेवयं दैव भृत्यः । १७ ।
दैव के अधीन प्राणी भी जिस जगन्नाथ का नाम सौ बार लेने से उसी समय
पाप से मुक्त हो जाता है, जिसे देखने से संसार (विषय) समुद्र में प्राणी नहीं
पड़ता है, जो देवताओं के प्रभु और ताप शान्त करने के लिये वर्षा वाले मेघ हैं
तथा जो सुभद्रा, भूदेवी, माधव, बलभद्र और सुभद्रा के साथ शोभा पाते हैं वे
हमारी रक्षा करे ।
७८० सिद्धान्त दर्पण
साङ्गं येनेन्दु पद्मा द्यखिल मुपमिति द्रव्य मासीत् कृतार्थं
- विद्बद् भिर्वर्णमानं यदनुमितिकृतः कृत्रिमं विश्वमाहुः
शब्द ब्रह्म प्रमाणं यदवयव जने यौंऽसकृन्नारदाद्यैः
साक्षाल्लक्षोऽपि साक्षी भवति नवनवः श्रीधवः सोऽ वतान्नः । १८ ।
जिसके अंगों से उपमा के कारण चन्द्र और पद्म आदि धन्य हो गये हैं,
जिसकी कल्पना करने से तार्किकों को यह सचरा चर विश्व ही कृत्रिम (ईश्वर
की तुलना में) लगता है । जिसके अवयव रूप जगत् की उत्पत्ति में शब्द ब्रह्म
(ॐ) ही प्रमाण है, जिसे नारद आदि महर्षि प्रत्यक्ष देख पाते थे और जो स्वयं
सभी के द्रष्टा होकर स्थित है, वे लक्ष्मीपति भगवान नित्य नये रूपों में हमारी
रक्षा करें ।
द्रव्यैर्जातुपमानं न भवति कृतिनां प्राकृतैर्जात दोषं
सर्वान्तर्यामि भवाद्युति मति कृतिभिः यस्य लोकोत्तरस्य
व्यक्ताव्यक्तेषुसत्वे स्वपरिमित निज व्याप्ति मुद् व्यक्त कामः
स्तस्मादो दिव्यसिंहोऽभवदिह च महादारु देहः सनो ऽ व्यात् । १९ ।
भगवान् लोकोत्तर होने के कारण किसी भी प्राकृतिक वस्तु से तुलना (उपमा)
कर उनका रूप, बुद्धि या प्रयत्न का वर्णन करने में कवियों का दोष होता है ।
वह सभी के भीतर स्थित हैं । उन्होंने सभी व्यक्त तथा अव्यक्त द्रव्यों में अपने
असंख्य रूपों को दिखाने के लिये दिव्य सिंह (नृसिंह) का रूप धारण किया
था । वही दारुब्रह्म रूप में हमारी रक्षा करें ।
पारावार प्रतीरप्रथित वर महापादपोः स्पर्शनाशा
प्रोद्यत् प्रासाद पीठार्पित विपुल वपुः पाण्डु पद्मोपमाक्षः
पूर्ण प्रेम प्रदान प्रवण उपनिषद् प्रार्थ्य मानानुगम्रः
पापौघाम्नां पुनीयात्पतित पतिमयं पूतना प्राण पायी । २० ।
समुद्र किनारे कल्पवृक्ष की दिशा में उसे स्पर्श करते हुए सुन्दर मन्दिर में
पीठ (रत्न सिंहासन) पर विराजमान महाकाय जगन्नाथ की आंखें धवल कमल
के समान हैं । उन्होंने पूतना राक्षसी के प्राण पी लिया था । उपनिषद् उनकी
स्तुति करते हैं । वह भक्तों को सदा स्नेह देते हैं । अतः मेरे जैसे पापराशि का भी
उद्धार करे ।
अथ श्री जगन्नाथस्य द्वाभ्यां समुद्र साम्यम् -
लक्ष्मीभृ नांगसद् मामृत खनिरशनि त्रासितक्ष्मा भृदीश-
स्थानं स्वर्गापगायाः प्रभुरखिलनृणां पापसन्ताप हन्ता
श्याम श्रीमान् कूर्माद्यमित तनुधरः शंखचक्राब्जवाहः
कल्पान्त प्रस्त लोकः कलयतु कमलं तीर्थराट् क्रान्ति शन्त्यै । २१ ।
जगन्नाथ लक्ष्मी पति हैं तथा समुद्र भी लक्ष्मी का पिता है । भगवान नाग
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१५
(शेष) को घर बनाये हैं । नाग का घर समुद्र है । दोनों अमृत के भण्डार हैं ।
भगवान ने मत्स्य कच्छप आदि प्रत्येक रूप धारण किया था, ये सबी रूप वाले
प्राणी समुद्र ने भी धारण किये हैं । इन्द्र वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (गोवर्द्धन)
का आश्रय कृष्ण ने लिया था-समुद्र ने भी वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (मैनाक)
को आश्रय दिया था । विष्णु से गंगा की उत्पत्ति (नख से हुयी), समुद्र में गंगा
मिलती है, अतः दोनों गंगा के स्वामी हैं । भगवान के हाथो में शंख, पद्म आदि
है जो समुद्र में भी है । सृष्टि के अन्त में वे दोनों भुवनों को जनप्लावित करते
हैं । वे सभी तीर्थों के राजा हैं । वे दोनों दुःख शान्ति के लिए सुख (जल) का
विवरण करें ।
यत्रास्ते सानुबिम्बादित सित किरण प्रोज्ज्वलं नेत्रयुग्मं
नासाबाहूदरांह्रिं स्फुरति च विविध द्वीप शोभानुकारि
वारीतं श्यामल श्रीमर्कर सुरुचिरे कुण्डले वाड़वाग्नि-
ज्वाले वाद्यत् किरीटं तरणिव दधरः सोऽस्तु शान्त्यै कृपाब्धिः । २२ ।
जिसके दोनों नेत्र उदय होते हुए सूर्य और चन्द्र बिम्बों के समान है । (कृष्ण
नेत्र गोल तेजस्वी हैं) । समुद्र में भी दोनों उदय होते सम उसके नेत्र समान दीखते
हैं । जिसके नाक, भुजा, पेट और पैर आदि प्रत्येक द्वीपों के समान है (कृष्ण के
भुजा, पैर आदि द्विप अर्थात् हाथी के समान विशाल हैं) समुद्र के द्वीप उसके
अंगों के समान बाहर निकले हैं । जिनकी श्यामल शोभा है (कृष्ण और समुद्र
दोनों नीले हैं) जो मकर कुण्डल धारण किये हैं (कृष्ण के कुण्डल का आकार
मकर जैसा है । समुद्र के भीतर मकरों का समूह है), जिसका किरीट् बड़वानल
के समान तेजस्वी है (कृष्ण की मणि किरीट का तेज अग्नि के समान है, समुद्र
का बड़वानल उसकी मणि के समान है), जिसका नौका के समान अधर है ।
कृष्ण के ओठ नौका के समान सामान्य वक्र हैं, समुद्र का प्रवेश द्वार नौका है-
मुख के प्रवेश की तरह)- वे दया सागर (कृष्ण और समुद्र) हमारी शान्ति के
लिये विराजमान रहें ।
ब्रह्माण्ड साम्यम्
विभ्रद् वस्त्र क्षपे शौ नयन युग मिषादगभ शोभामदभ्रां
शुभ्र श्री वक्त्र दम्भादधर पुर रुचि व्याजतः सान्ध्यवेलाम्
तिर्यग् विस्तीर्ण वृत्तातुल भुजबल यच्छद् मनश्चक्र वालं
शैलं मध्यच्छला काञ्छल मुपरि नुतात् विश्वभर्त्ता शुभंनः । २३ ।
ब्रह्माण्ड के सूर्य चन्द्र की तरह कृष्ण के दो नेत्र हैं । ब्रह्माण्ड के मेघ की
तरह कृष्ण भी श्यामल है । ब्रह्माण्ड (आकाश) के समान कृष्ण का स्वच्छ तेज
है । ब्रह्माण्ड की सन्ध्या के समान लाल रंग कृष्ण के अधरों का है । भगवान
की दोनों भुजायें ब्रह्माण्ड के दिगवलय की तरह तिर्यक् फैली हुयी, गोल और
४१६ सिद्धान्त दर्पण
अनुपम है । ब्रह्माण्ड का मेरु सुवर्णमय है, कृष्ण भी शरीर में सुवर्ण समान
पीताम्बर पहने है । इस प्रकार ब्रह्माण्ड समान ही उसके स्वामी हमारा शुभ करें ।
श्री जगन्नाथ स्य शिव साम्यम् -
भूते शो भूति भूमिर्भवज भय भरोद् भेद भेदिप्रभावो
भुवीन्द्र भोगाभरण पुर भी भावदो भूत भूतेः
भू भृद् भूमीन्द्र मौलि र्भूत वरकमलो गौर भाषेशभंग-
प्रभ्राजद् भाल भत्तिर्वृषभरणचणः सत्यदभ्राभिसन्धिः । २४ ।
कृष्ण भूत (प्राणियों) के प्रभु हैं । शिव भूत पिशाचों के । कृष्ण अणिमा आदि
विभूतियों के स्थान है, शिव भूति (भस्म या सम्पत्ति) के आश्रय स्थल । कृष्ण
संसार के कारण हुए भय (भवभीति) का नाश करने में प्रभाव शाली हैं । शिव
भूमि से निकले भयानक सर्पों को अपने शरीर से लिपटाये हैं । कृष्ण पर्वतराज
(नीलाचल) पर नील कमल के समान मुकुट रूप में विराजमान हैं । शिव पर्वत
राज (कैलाश) पर अपने मुकुट पर गंगा जल धारण किये हैं । कृष्ण का ललाट
खण्ड चन्द्र के समान उन्नत है, शिव ललाट पर खण्ड चन्द्र है । कृष्ण धर्म रूपी
वृषभ के रक्षक है अथवा वृषासुर के नाश कर्ता है । शिव वृषभ पर आरूढ़ हैं ।
कृष्ण का हृदय साधुओं के लिए अति खुला है । शिव का हृदय भाव दक्ष कन्या
सती के पास पूर्ण हुआ । कृष्ण कान्ति गौर वर्ण को नष्ट करती है अर्थात् काला
है, शिव गौर हैं । वे दोनों प्राणियों की उन्नति करें ।
श्री गौरी साम्यम्
सर्वराध्या सितक्ष्माधर परम यशोभूति विख्यात हेतू-
माता लोकस्य दृप्यन्मधुवध मुदिता दित्यगीत प्रशस्ति
पाता इण्डादि दैत्या भिभवन खर रुक् चन्द्रकान्तोत्तमांग
श्री रस्मान् सर्वदो मेश्वर उदित रतिः केलिकान्ताङ्गसंभृत् । २५ ।
लक्ष्मी पति विष्णु के लिये-सभी वस्तु देने वाले लक्ष्मीपति जगन्नाथ हमारी
रक्षा करें । वह लक्ष्मी को क्रीड़ा के लिए अपने शरीर पर धारण करते हैं । कृष्ण
से सदा अनुराग (सुगन्ध) निकलता है । वे मस्तक पर मोर पंख लगाते हैं । अति
उग्र प्रथम दैत्य हिरण्यकशिपु को मारने के लिये उन्होंने नखों आदि की शक्ति
दिखायी थी । मधु दैत्य को मारने पर देवताओं ने उनकी प्रशंसा की थी । वे १४
ब्रह्माण्ड बनाने वाले तथा सभी के पूज्य हैं । उनके कारण नीलाचल के यश
(सम्पत्ति) में वृद्धि हुयी है ।
गौरी के लिये -गौरी सभी की आराध्या, कैलाश की सभी यश सम्पत्ति का
कारण तथा लोकों की माता है । चण्ड आदि दैत्यों के को हराने के समय उनका
अत्यन्त तेज था । ईश्वर प्रति अति अनुराग के कारण उनके वाम अंग में स्थित
हुयी है । खण्डित चन्द्र से उनका (शिव का) मस्तक शोभा पाता है । उनका
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१७
नाम उमा है । मधु दैत्य के वध के लिए देवताओं ने उनकी वन्दना की थी
जिनकी शक्ति से वह मारा गया ।
वाग् देवी साम्यम्
श्रीमद् गौराम्बराडम्बर रुचिर पयोराशि शित्यंग लक्ष्मी
र्लक्ष्मी सेना दृतांग स्फुट तमगमनः संगति वाङितांघ्रिः ।
ब्रह्मानन्दैक भूमिर्भ्रमशमन पटुः साश्रिता नाम विद्यां
भिद्याद् स्थूल देहा हित सकल जगद्धीरमेय स्थितिनैः । २९ ।
कृष्ण पक्ष में अर्थ - श्रीकृष्ण हमारी दुर्गति दूर करें । उनके नील शरीर पर
पीताम्बर फब रहा है । उनको लक्ष्मी, शिव और सूर्य सम्मान करते हैं । उनके
पास देवता लोग जाते हैं । सरस्वती उनके चरणों की वन्दना करती है । वे भक्तों
का अज्ञान दूर करने में दक्ष तथा ब्रह्मानन्द देते हैं । वे सूक्ष्म रूप से पूरे समाज
में व्याप्त हैं । उनकी स्थिति पण्डित लोग ही समझ सकते हैं ।
सरस्वती पक्ष में अर्थ- सरस्वती हमारी माया दूर करें । उनके धवल शरीर
पर शुक्ल वस्त्र फब रहा है । विष्णु से वह आदृत हैं तथा उन्हीं के प्रिय फूल
सरस्वती पर अर्पित हैं । भक्त उनकी चरण वन्दना करते हैं । वह भक्तों का अज्ञान
दूर कर ब्रह्मानन्द देती हैं । सूक्ष्म देह से सारे संसार में व्याप्त हैं । पण्डित ही
उनकी स्थिति के बारे में जान सकते हैं ।
गणेश साम्य-
हस्त्योद्य पुष्कर श्री श्रुति शिखर धृतोन्मत्तचित्तालिलोखो
ऽलंकर्त्ताक्षाम मध्य स्त्रिपुर हर तनुदक्ष पक्षस्य रक्षात्
सद्योऽविद्यान्धकारात् परशुधर पुरस्कार्य दुर्वार्य वीर्यो
देवः श्री पार्वती वाग् विधिं विततयशाः स्वर्गवर्गाग्रपूज्यः । २७ ।
कृष्ण आदित्यों में प्रथम (उपेन्द्र या वामन) हैं, गणेश देवताओं में प्रथम पूज्य
हैं । कृष्ण ने दुर्द्धर्ष परशुराम को पुरस्कार दिया था । गणेश ने भी परशुराम को
बहुत कठिनाई से रोका था जब वे शिव से पुरस्कार लेने जा रहे थे । कृष्ण हरि
हर मिलन में शिव के दाहिने रहते हैं । गणेश भी शिव के दाहिने रहते हैं । दोनों
के हाथ में कमल का फूल सजा हुआ है । दोनों का यश लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती
और ब्रह्मा फैलाते हैं । दोनों हमारे अविद्या रूपी अन्धकार को नष्ट करे ।
सूर्य साम्यम्
छाया कान्तः कृतान्तार्द्धित चरण युगः पाणिराजत् सरोजः
स्वाग्रोद्यद् वैनेतेया रजनीचर सुखोच्छाया विच्छेददक्षः
स्वच्छानन्तोंक लीलः क्षयिततम तमाः सर्वतेजोऽभिभावी
कालिन्द्यानन्द कलः प्रमुदित कमलः पातु पकांधरिर्न । २८ ।
४१८ सिद्धान्त दर्पण
कृष्ण पाप से हमारी रक्षा करें । सूर्य छाया देवी के स्वामी हैं । कृष्ण की
भी छाया के समान कान्ति है । कृष्ण का चरण यमुना धोती है । यम (सूर्य पुत्र)
सूर्य की पूजा करते हैं । कृष्ण के हाथ में कमल शोभित होता है । सूर्य किरणों
(पाणि) से कमल खिल जाते हैं । कृष्ण वैनतेय गरुड़ पर चलते हैं । सूर्य के
आगे भी वैनतेय (अरुण) सारथी उन्हें ले जाते हैं कृष्ण राक्षसों (रजनीचर) का
नाश करते हैं । सूर्य रजनी (अन्धकार) का नाश करते हैं । अनन्त (शेष नाग)
की गोद में कृष्ण विश्राम करते हैं । सूर्य अनन्त आकाश में विचरण करते हैं ।
दोनों में सभी प्रकार का तेज है । दोनों कालिन्दी को सुख देते हैं (कालिन्दी कृष्ण
की एक पत्नी, कालिन्दी यमुना सूर्य की पुत्री) । दोनों सदा पद्म को आनन्दित
करते हैं ।
नवग्रह साम्य
पद् मान दैक सद् मामृतनिधिर वनी नन्दनश्चन्द्र वंशो
तंसः स्वर्गेशवर्गोडित चरण युगः सत्कवित्वा श्रयश्च
पत्री भूतो रूपत्री जननयन चया गोचरो नीचकेतु
ज्योतिष्मान् च्युतोऽस्मानवतु द भवभया दाशु विश्वग्रहात्मा । २९ ।
कृष्ण और सूर्य दोनों पद्मानन्द देने वाले हैं (कृष्ण के आंख, हाथ पैर आदि
पद्म के समान आनन्द दायक, उनके हाथ में पद्म है, पद्मा सन में उनके ध्यान का
आनन्द होता है । सूर्य किरणों से पद्म खिलता है) । कृष्ण और चन्द्र दोनों अमृत
के भण्डार हैं । कृष्ण अवनी नन्दन (पृथ्वी को आनन्द देने वाले ) हैं, मंगल भी
अवनि (पृथ्वी) के पुत्र हैं । कृष्ण चन्द्र वंशी है, बुध, भी चन्द्र पुत्र हैं । कृष्ण-वाहन
गरुड़ तथा सूर्य सारथी अरुण दोनों वैनतेय हैं । कृष्ण देववर्ग द्वारा पूजित हैं,
वृहस्पति भी उनके गुरु में पूजित हैं । कृष्ण सृष्टि निर्माता (कवि) या कविता का
विषय है । शुक्र भी कवि (रचयिता) हैं । शनि भी गृद्ध वाहन हैं । कृष्ण का
नित्य रूप आंख से नहीं देखा जा सकता जिस प्रकार राहु को नहीं देखा जा
सकता । कृष्ण नीच (दीन) लोगों के बन्धु हैं केतु भी नीचों का अधिपति है ।
कृष्ण और सूर्य दोनों सभी ग्रहों की आत्मा और प्रकाश वाले हैं ।
गोविन्द वन्दना
वन्देबन्दारु वृन्दारक निकर शिखा रत्न नक्षत्र राजी-
रज्यात्यादा रविन्द स्फुट नखर विधु ध्वस्त चेत स्तमस्कम्
कोटि क्रीडाण्ड भाण्ड प्रकट गुण घटैः सेवितं स्वावतारै
श्रीमद् गोविन्द मिन्दिवर रुचिर तनु मिन्दिरानन्द कन्दम् । ३० ।
मैं श्रीगोविन्द को प्रणाम करता हूँ । देवताओं के सिर उनके चरणों पर प्रणाम
करने के लिये झुकते हैं, तो उनके मुकुट पर नक्षत्रों जैसे प्रकाश रत्नों से चरण
कमल प्रकाशित हो जाते हैं । उनके नखों की चन्द्र समान उज्ज्वलता से हृदय
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१९
का अन्धकार दूर हो जाता है । करोड़ो ब्रह्माण्ड उन्हीं के गुणों के प्रकाश है ।
उनकी पूजा उन्हीं के अवतार भी करते हैं । उनका शरीर नील कमल जैसा सुन्दर
है तथा लक्ष्मी के आनन्द का मूल हैं ।
अथ दशावतार स्तुति मीनावतार
मीनोऽलीनो नदीनोदर उषित ऋषि व्रात गोत्रातरीस्थं
त्रातुं सत्यव्रतं वातरदिह सुमहाहार्य सन्दोह देहः ।
वेदोद्धाराय योद्धा व्यधित वधमदश्चौर वृत्रालिशत्रो-
स्त्राणं तापत्रयान्न स्त्रिपुर हर पुरस्कार पात्रं तनोतु । ३१ ।
मीन अवतार धारी भगवान तीन तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से हमारी
रक्षा करें । विशाल आकार के कारण वे मीन रूप में समुद्र में भी नहीं छिप
सके । उन्होंने नौका रूप पृथ्वी में स्थित ऋषियों तथा दुःखी सत्यव्रत के उद्धार
के लिये अवतार लिया था । उन्होंने वेदों के उद्धार के लिये शंखासुर का वध
किया जो वृत्रशत्रु इन्द्र का शत्रु और चोर था । उनकी त्रिपुरारि भी पूजा करते हैं ।
कूर्मावतार
कूर्म्मेऽशर्म्मोपनिर्मोचयतु रयभर भ्रान्त मन्थस्थिराष्टृ-
द् भूरिग्रावाग्र संघटन घटित महापृष्ठ कण्डूति सौख्यः
पच्छंकोचच्छलनो च्छलित चल हृदां मिलनं स्वाश्रितेभ्यो-
ऽनर्थभ्यः प्रोत्थितास्येन च पवन समुत्थान मर्थापयन्नः । ३२ ।
कूर्म रूपी श्री जगन्नाथ हमारा अमंगल दूर करें । समुद्र मन्थन के लिये उनकी
विशाल पीठ पर मन्दराचल पर्वत के तेज घूमने से उनकी पीठ की खुजली दूर
होने का सुख हुआ । पैर संकोच करने से जिस प्रकार मन्दराचल को आश्रय मिला
था (उनकी पीठ पर) उसी प्रकार भ्रमित बुद्धि वाले लोगों की बुद्धि भी स्थिर
होती है । मुहं खोलकर हवा निकालने से समुद्र मन्थन में देवो और असुरों को
शक्ति मिली, इसी प्रकार लोगों को उस रूप से काम करने की शक्ति मिले ।
वाराहावतार
कोलं-कोलं कुगोलं दधदधि जलधी वाध उद्धृत्यदन्त
प्रान्तेऽशान्ते दुरन्ते प्रथम दितिसुते वृद्धदुर्द्धर्ष युद्धैः ।
देयादाया सहीनोद्रुहिण हरिहया द्यादितेयार्हणीयः
श्रेयो दाम्नाय गेय क्रतुनिचयमया मेघकायः श्रियः नः । ३३ ।
वाराह ने प्रबल और दुर्भेद्य दिति के प्रथम पुत्र हिरण्याक्ष जैसे दुर्वृत्त को मार
कर बिना कंठिनाई के ही समुद्र में नाव के समान अपने दांतों पर पृथ्वी को नीचे
से उठा लिया था । उस समय ब्रह्मा इन्द्र आदि ने उनकी पूजा की थी । वेद
उनकी स्तुति करते हैं । वह यज्ञ मय और अनन्त हैं । वराह रूपी भगवान हमारा
४२० सिद्धान्त दर्पण
मंगल करे ।
नृसिंहावतार
अघं संघं नृसिंहो भवतु भवहरोऽह्यसंहर्तु महें
गर्हन्निर्हादवृन्दैः प्रलय जलधर ध्यान धारा समृद्धिम्
अक्षान्त स्वीय भक्ताक्षति रमरपराध्यक्ष वक्षः क पाट
क्षोप प्रक्ष्य॑माणक्षतय भृतनखो लक्ष्यलक्ष्मीकवक्षाः । ३४ ।
संसार के (जन्म मृत्यु के) नाशक नृसिंह भगवान शीघ्र पाप समूहों का नाश
करें । उनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी है । अपने भक्तों की क्षति या कष्ट वे नहीं सह
पाते हैं । दैत्यराज हिरण्यकशिपु के कपाट रूपी वक्ष को चीरने से निकलाहुआ
रक्त उनके नखों में लग गया था । उस समय उनकी घोर गर्जना प्रलय कालीन
मेघ से भी अधिक भयंकर थी ।
वामनावतार
खर्विकुर्वित दविं कर भुवनक गीर्वाणवर्गालियार्वी
गर्वानिर्वाक् सुपर्वार्य वनिधवमहा सम्पदं लुम्पमानः
व्यापद् व्यापञ्जयं पत्रितय रयभरा दर्धना व्याजखर्वः
सर्वं शंकादि सेव्यः स्रवद मर धुनी नीर पन्नीरजोयः । ३५ ।
वामन् भगवान हमारे विपद समूह को नष्ट करें । उनकी शिव आदि देवता
सेवा करते हैं । उनके चरण कमलों में गंगा निकली है । मांग कर छल करने के
लिए उन्होंने वामन रूप लिया था । दैत्यराज (बलि) की सम्पूर्ण सम्पत्ति (दान
में) लेकर उन्होंने अपने तीन पगों से पाताल, देवालय (स्वर्ग) और पृथ्वी-सबका
गर्व चूर्ण कर दिया था ।
परशुरामावतार
षष्ठः क्ष्माप्रेष्ठ गोष्ठी कुठ गण लुठना कुण्ठतेजः कुठारः
श्रीवैकुण्ठावतारः कठिन रणधुरादृष्ट षष्ठीश पृष्टः
तिष्ठन् कण्ठिर वाभीऽर्जुन सुभटघटा घोर मातंग यूथे
श्रेष्ठः कष्टानि निष्ठे वयतु भृगु धुवां नील कण्ठांघ्रि निष्ठः । ३६ ।
भृगुवंश के श्रेष्ठ, भगवान के षष्ठ अवतार और विष्णु के अंशरूप परशुराम
स्वयं वैकुण्ठावतार के रूप में हमारा कष्ट दूर करें । वह नील कण्ठ महादेव के
भक्त और कार्त वीर्य अर्जुन के योद्धा रूपी हाथियों के लिये सिंह के समान
पराक्रमी थे । उन्होंने निष्ठुरता से कार्तवीर्य अर्जुन को मार डाला तथा पृथ्वी के
राजाओं को वृक्षों की तरह काट गिराने में कुठार कुण्ठित नहीं हुआ ।
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४२१
रामावतार
रामः श्यामाब्जधामा शमयुत सममाशर्म घर्मांश वंशो
तंसः संसार हिंसा वह महिम महाम्भोधि रम्भोज नेत्रः
शोण्डश्रुण्डीश काण्डा सनवल दलने दण्डकारण्य चारी
हारी वारीश तारी सरपर विसर प्राणहारी बुधारी । ३७ ।
भगवान राम नील कमल के समान और सूर्य वंश के भूषण हैं । वह हमारा
अमंगल दूर करें । उनकी आंखें कमल के समान सुन्दर हैं । संसार के हिंसकों
के नाश के लिये (डुबाने के लिये) महासागर के समान हैं । उन्होंने शिव धनुष
को भी सहज में मोड़ कर तोड़ दिया था । दण्डकारण्य में विचरण करने वाले
हैं तथा महासागर को पाकर उन्होंने अजेय रावण का प्राण हर लिया था । वे
सदा बाणों के साथ रहते हैं ।
बलरामावतार
उर्जेन्दु ज्योतिरुर्जस्वल विमलहराहार्यरुग् जैत्र गात्रः
सद्यः प्रोद्यहिनेश भ्रमदमदभराघूर्णिना स्तीर्ण नेत्रः
प्रत्यग्राम्भोदवन्द प्रतिभट पटभृद् भूरि भास्वद् विभूषो
भूयाद् भूगोल भारो भव भयभिद् भानु भूमेदनो नः । ३८ ।
भगवान् बलराम हमारा संसार भय दूर करें । वह कार्तिक पूर्णिमा के चन्द्र
के समान प्रकाशमान है, अथवा रोहिणी (माता) के चन्द्र (पुत्र) रूप में विख्यात
हैं । उनके शरीर की धवल कान्ति कैलाश पर्वत से भी अधिक है । उनकी आंखें
मदमस्त तथा चञ्चल है, लाल और विशाल होने के कारण उदय कालीन सूर्य
के समान दीखती हैं । नीले मेघ समूह के समान नीले रंग का वस्त्र पहनते हैं
तथा बहुत से आभूषणों से सजित हैं । शेष के रूप में वह पूरे संसार का भार
बिना कष्ट के ही सहते हैं ।
बुद्धावतार
अध्यात्मध्यान बुद्धादर विधुत धृतिध्वस्त शुद्धाध्वराध्व
श्रद्धाः क्रोधादिरोधा विधि विहित वधा साधुता सिद्ध बोधः
दध्याद् बुद्धा भिधानो मगध धरणी हल्लब्ध जन्माभिदेवो
बाधाब्ध्योद्धार धूर्या धियमघन धनं धर्मधारां धरन्तः । ३९ ।
भगवान बुद्ध के रूप में हमारी बुद्धि को बढ़ायें । मगध देश के (लुम्बिनी
के राजवंश) में जन्म होने पर भी वे दरिद्रों के धन थे । विपद् समुद्र से उद्धार
के लिये उन्होंने उपयुक्त धर्म मार्ग बनाया । सदा आत्मा में लीन रहकर कभी धैर्य
नहीं छोड़ा । उन्होंने वैदिक यज्ञ कर्मों में पशुओं की हत्या की स्पष्ट रूप से निन्दा
की । यज्ञ में पशुओं की हत्या की तुलना में अपने ही भीतर काम क्रोध आदि
४२२ सिद्धान्त दर्पण
शत्रुओं का दमन श्रेष्ठ है यह प्रतिपादित किया ।
कल्कि अवतार
निर्धूली धूमाधारा धरनि कर नभो मध्य विद्योतमानं
द्योत् प्राग् भार भास्वद् भ्रमकर कर युङ् मण्डलाग्रं प्रचण्डः
स्वाधाराधीर घोरोद्धर तुरंग सुरक्षोदित क्षोणिरेणु
च्छन्नच्छायेन ईशोदिशतु दशको म्लेच्छविच्छेदकृच्छम् । ४० ।
भगवान् अपने कल्कि अवतार द्वारा हमारा मंगल करें । धूलि, धूम और मेघ
से शून्य स्वच्छ आकाश में दशम अवतार कल्कि का प्रकाश होगा । उनके शरीर
के ऊपरी भाग से तेज निकलेगा (मुख और आंखो से अग्नि) । तथा हाथों में
तीक्ष्ण खड्ग (करवाल) सूर्य की भ्रांति भ्रमण करेगा । उनके भंयकर रूप तथा
भयानक अश्व की गति से पृथ्व खाली हो जायेगी और म्लेच्छों का संहार होगा ।
उससे उत्पन्न धूलि से स्वयं सूर्य ढंक जायेगा ।
जगन्नाथ स्तुति
मत्स्याद्या कल्कि रूपं दशविधतनू भाक् सिद्ध (२४) संख्यात्ममूर्तिद्