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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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संवत्सरादि वर्णनम् ४०३
इस प्रकार के ३० सौर दिनों का एक सौर मास होता है । इस प्रकार १२ सौर
मासों का एक सौर वर्ष होता है ।
सौर मानेन गृह्यन्ते संक्रमत्वर्यनादयः
देवासुर द्युरजनी युगमन्वन्तरक्षयाः । ४२ ।
सौर मान से संक्रान्ति, अयन और ऋतु आदि का पालन होता है । देवता
और असुरों का दिन और रात, युग, मन्वन्तर आदि की समाप्ति भी इसी सौर मान
से होती है ।
विवाह व्रत चूड़ादि वेश्मारम्भादयः क्रिया
मासाब्द नियमाः पर्वाण्यपि देशविशेषतः । ४३ ।
विवाह, व्रत, चूड़ा कर्म, गृहारम्भ आदि काम, मास, वर्ष, व्रतादि का पालन,
पर्व आदि का पालन किसी किसी देश में सौर मान से भी होता है । (सामान्यतः
चान्द्र मान से होता है ऐसा लिखा गया है)
सौर-तुलादिषडशी (८६) त्यंशैः षडशीति मुखं दिनम्
तञ्चतुष्टय मेवस्यात् द्विस्व भावेषु राशिषु । इति । ४४ ।
सूर्य सिद्धान्त में-तुला आरम्भ से ८६ अंश तक सूर्य रहने पर (अर्थात् ८६
सौर दिनों तक) षडशीति मुख नामक मास होता है । यह वर्ष में ४ बार होता है
और रवि द्विस्वभाव (द्वात्मक राशि ३,६,९,१२) में रहने पर ही होता है । (उद्धरण
समाप्त होता है ) ।
धनुषः सप्त विंशोऽश स्त्रयो विंशोऽण्डजस्य च
द्वन्दू से कोन विंशश्च स्त्रियाः पञ्चदशः स्मृतः । ४५ ।
धनु राशि का २७ अंश, मीन का २३ अंश, मिथुन का १९ अंश तथा कन्या
का १५ अंश में
तत्तन्मासेषु सूर्यस्य षडशीति मुखान्वयात् ।
षडशीत्याख्यया प्रोक्ता द्वात्मक क्षेत्र संक्रमाः । ४६ ।
उन मासों का सूर्य जाने से और ये स्थान ८६-८६ अंशों के बाद पड़ने से
इन (संक्रान्तियों) को षडशीति मुख कहते हैं । ये सभी द्वात्मक राशियों में ही
होती हैं ।
ओज पादादि चरयोः संक्रमौ विषवाभिधौ
युग्मादि चरये याम्य सौम्या यन तयोदितौ । ४७ ।
विषम पद में स्थित दो चर राशियों (मेष और तुला) में रवि की संक्रान्ति
को विषुव संक्रान्ति कहते हैं । सम पद में स्थित दो चर राशियों (कर्क और मकर)
संक्रान्ति को क्रमशः दक्षिण और उत्तर अयन संक्रान्ति कहा जाता है ।