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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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४१० · सिद्धान्त दर्पण
पुरुषोत्तम और नीलाद्रि
नानोद्यानोद्यतानो कह वहल दलच्छाय शान्तात पार्त्ति
र्नित्यप्रत्यग्र सौदावलिद लित कला नाथभृत् शैल कान्तिः
अश्रान्त भ्रान्त वात प्रमथित पथिक श्रान्ति रक्षैम शान्ति
कुर्यात् पर्यन्त गर्ज जलधि रधिरुचिः कम्बुभाः कापितुर्नः । ४ ।
जहां असंख्य उद्यानों और उनमें घने वृक्षों के पत्रों की छाया से सूर्य के ताप
का कष्ट नहीं होता । जहां के नये प्रासादों की शोभा कैलाश पर्वत से अधिक है,
जहां हमेशा बहता पवन पथिकों की थकावट दूर करता है ।
जिसके एक तरफ शब्द करता हुआ समुद्र है, तथा जो शंख के समान शोभित
पुरुषोत्तम क्षेत्र हैं वहां हम लोगों का निर्वाण और शान्ति हो ।
यत्रामर्त्याः परित्राकृत सुकत जनत्रासिनोऽ प्येत्यमर्त्यान्
वित्रस्ता वेत्रहस्ता ननुविवृति कृतः प्रेक्ष्य संरुयेच्छवःस्युः
देवा देवाधि देवानन नलिन दृशः सन्ति नानात्मभाजः
कुर्यात् पर्याप्त वीर्या समविषम सिता हास्य धुर्या पुरी नः । ५ ।
वहां पूर्व जन्म में अकर्म करने के भय से हाथ में बेत लेकर स्तुति करते हुये
मनुष्यों से देवता गण मित्रता चाहते हैं, जहां पर अनेक रूपों में स्थिति देवगण
कमलनयन प्रभु को देखते रहते हैं, उस पुरी में अत्यन्त बली और नीलगिरि का
भार उठाने में समर्थ प्रभु जगन्नाथ हमारा मंगल करें ।
अन्तर्वेदी त्रिवेदी निगदितमहिमाधित्यका नित्यकान्ता
स्तुङ्गाः शृंगाणि यस्यामर निकरगृहः पावनी यद् वनीश्रीः
प्राकारो यत्प्रपातः प्रमथ पतुनुतो पत्यका पूर्यदीया
स श्री शम्भोदमारी वितरतु जगतां मेचकं मेचकाद्रिः । ६ ।
जिस अन्तर्यामी की महिमा तीनों वेदों में उच्चप्रशंसित है, जिसकी उन्नत
अधित्यका (पर्वत की उच्च भूमि) सदा रमणीय है, जिसकी चोटियों पर देवतागण
रहते हैं, जिसकी भीड़ से लोग पवित्र हो जाते हैं, जिसकी प्राचीर पर्वत समान
ऊंची है, जिसकी तट भूमि की शिव सदा प्रशंसा करते हैं, तथा जिसकी पुरी
कृष्ण रूपी मेघ के भार से आक्रान्त है उसी नीलगिरि के नाथ हमारा मंगल करें ।
पताका
तुंग प्रासाद श्रृंग प्रतिलव पवनान्दोलिता वैजयन्ती
वांच्छाकल्पद्रुम तीर्थेश्वर शिरसि चरत् पल्लवं श्री जयन्ती
याम्य स्वाम्याति ताम्यञ्जन वृजिन चमूमूर्जितां तर्जयन्ती
पायान्माया भवाब्ध श्रममिव शमिनां विजनैमार्जयन्ती । ७ ।
श्री जगन्नाथ के ऊंचे मन्दिर की चोटी पर प्रतिक्षण वैजयन्ती पताका हवा
से फर-फर होती है । तीर्थेश्वर इच्छा कल्पवृक्ष के सिर पर हिलते हुए वट के