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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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संवत्सरादि वर्णनम् ४०५
याम्य अयन या कर्क संक्रान्ति रात में होने से पूर्व दिन का द्वितीयार्द्ध तथा
उत्तरायण (मकर) संक्रान्ति रात में होने से अगले दिन का पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता
है।
अहः संक्रमणे पुण्य महः कृत् संप्रकीर्तितम्
स्मार्त्तं स्तथापि संक्रान्ते रासत्ति र्बहुमन्यते । ५५ ।
दिन में संक्रान्ति होने से सारा दिन दिन पुण्य काल होता है । यह स्मार्त्त
मत होने पर भी संक्रमण का निकट वर्ती समय निश्चय बहुत फल दायक है ।
उक्तो विधेरयं कालो निषेधे त्वामिषादिनः
पूर्वास्त्रिंशत्परास्त्रिंशद् ग्राह्याः पर्वाक्ष नाड़िकाः । ५६ ।
संक्रान्ति पर्व दिन होने के कारण पूर्वोक्त स्नान, दान, आदि के अतिरिक्त
इसमें आमिष भोजन करना मना है । आमिष भोजन का निषेध संक्रान्ति से ३०
दण्ड पहले और उसके ३० दण्ड बाद तक, इस प्रकार कुल ६० दण्ड तक है ।
मासान्तरूय निरंशा रूयौ मासस्यान्त्यादिमौलवौ
यात्रोद् वाहादि कार्येषु त्याज्या कल्याण मिच्छभिः । ५७ ।
किसी राशि का.अन्तिम (३० वां) अंश मासान्त तथा प्रथम अंश निरंश कहा
जाता है । इन दो अंशों में रवि रहने से मासान्त तथा निरंश काल होता है ।
कल्याण चाहने वाले इन दो दिनों में यात्रा विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करते
हैं।
बिम्बान्तर्वर्त्तिनः पुंसः संक्रान्ति समयोनृभिः
त्रुटेः सहस्र भागत्वादवगन्तुं न शक्यते । ५८ ।
सूर्य बिम्ब के केन्द्र बिन्दु (पुरुष) का संक्रमण काल एक त्रुटि का हजारवां
भाग होता है । इसको जानना मनुष्य के लिये सम्भव नहीं है ।
सौरे-भचक्र नाभौ विषुव द्वितयं समसूत्रगम्
आयन द्वितयं तैव गतस्र परमास्तताः । इति । ५९ ।
भचक्र की नाभि या केन्द्र स्थल में होने के कारण दो विषुव संक्रान्ति तथा
दो अयन संक्रानति ये चार अति श्रेष्ठ हैं । सायन मेषादि तथा तुलादि जिस प्रकार
मेरु से बराबर दूरी (९०° अंश) पर है उसी प्रकार सायन कर्क तथा मकर आदि
भी ध्रुव से बराबर दूरी पर हैं। अतः इनका माहात्म्य भी समान है । (सूर्य सिद्धान्त
के अनुसार)
सौम्यायनान्मास युगैः शिशिरादि ऋतवस्त्रयः
तथैव याम्यायनतः प्रावृडाद्यास्त्रयोमताः । ६० ।
उत्तर अयन से दो दो मास अर्थात् मकर संक्रान्ति (सायन) से दो-दो सौर
मास तक शीत आदि तीन ऋतुएं होंगी (६ मास तक) इसी प्रकार सायन कर्क