सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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भास्वत्सम्मुख भाग् दले द्युति भृतोऽन्यत्रात्मनश्छायया
व्याप्तस्येन्दव गोलकस्य सतत क्ष्मा सम्मुखै कार्द्धतः
सूर्या शांत्यजतोऽयतो धवलतां वृद्धिक्षया वीक्षते
लोकस्तत् पितरः क्व सम्मुख दले मासार्क पश्चाद् भ्रमम् । ७६ ।
चन्द्र का जो गोलार्द्ध सूर्य के समाने होता है वह सूर्य किरण से प्रकाशित
होता है तथा विपरीत दिशा का आधा भाग छाया में रहता है । छाया अर्द्ध के
सामने पृथ्वी के लोग देखते हैं, कि चन्द्र सूर्य से दूर जाते समय उसकी कला
बढ़ती जाती है । दूसरी दिशा में (चन्द्र सूर्य के निकट) आने पर चन्द्र की कला
घटती है । क्या चन्द्र मण्डल पर रहने वाले पितर भी रवि की एक मास तक
पश्चिम दिशा की गति देख पाते हैं ?
नव्याभ्र भ्रमर प्रभाकर सुता पाथः प्रफुल्लोत्पलः
प्रालेयांशुकलंक कजलमहानीलाश्म नीलोज्वलः
शम्पा चम्पक नीप कुंकुमतमी चामीकरा भाम्बरः
कृष्णः संसृति शर्करा ध्वजनितं मुष्णातु, तृष्णां मम । ७७ ।
नया काला मेष, भ्रमर, यमुना जल, प्रफुल्ल नील कमल, चन्द्र का काला
कंलक, कजल और नीलमणि के समान उज्ज्वल, बिजली, चम्पाफूल, कुकुम,
हल्दी और सोने के समान पीताम्बर धारण करने वाले कृष्ण जगन्नाथ संसार रूपी
लोभ द्वारा जन्मी मेरी तृष्णा को नष्ट करे ।
इत्युत्कलोज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
द्वाविंशकः प्रथित काल इतः प्रकाशः । ७८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्रीचन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालकों के ज्ञान के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
काल वर्णन सम्बन्धी २२ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।