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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

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४१२ सिद्धान्त दर्पण
आवला बेड़ा
सद वण्टा कर्परात्या मलकत तरति द्योतिता द्योतयन्ती
प्रासादस्थूल मूर्त्तेर्भवतु भगवतः सर्वतोवक्त्र भावम्
याष्टाशोत्यंग जुष्टाष्ट परिगुण चतुः षष्टिमुष्ट्यन्त निष्ठैः
दृष्ट्या भ्रष्टं शिरो वेष्टनमपि तनुते सोम मानिष्ट नष्ट्यै । ११ ।
मन्दिर कलश के नीचे आँवला बेड़ा बड़े घण्टे के खोल के समान तथा
मन्दिर रूपी शरीर का कपाल है । इसके ८८ अंग (आंवला) हैं तथा ६४x८ =
५१२ मुट्ठी दूर से देखने वाले लोगों के सिर से पगड़ी गिर जाती है । यह हमारा
अनिष्ट दूर करे ।
देउल कण्ठ
स्पष्टा स्पष्टा सुकाष्ठा स्वनुघटित पतच्छ्रेष्ठ कण्ठीरवेन्द्रैः
पश्याद्दिश्या घनागप्रभव परिवभोल्लुण्ठना कुण्ठवीर्यैः
दृष्टि प्रेष्ठकृष्ट प्रतिकृति खलुः सुष्ठु नोऽ धिष्ठिताङ्गि
वैकुण्ठागार कण्ठो विघट यतु हठात् कष्टदादृष्ट सृष्टिम् । १२ ।
जगन्नाथ मन्दिर का कण्ठ शीघ्र हमारे कष्टप्रद प्रारब्ध कर्म को अच्छी प्रकार
नष्ट कर दे । इस कण्ठ के आठ दिशाओं में पाप रूपी दिग्गजों को नष्ट करने के
लिए श्रेष्ठ सिंह इनके ऊपर अंकित दीखते हैं । मन्दिर से ये गज और सिंह लगे
रहने से इनका आकार अत्यन्त सुन्दर अतुलनीय दीखता है ।
मन्दिर
जम्बूद्वीपा स्वभूपाखिल भुवन जयस्तम्भ सम्भार भारी
गर्भस्थानन्त विश्वम्भर शरणतया वाञ्चयातीत मानः ।
सांगो पांगोऽति तुंगोऽनुगुणपृथुलतः प्रेक्षकानन्दकन्दः
प्रासादेशोऽनिशं नःस्पृशतु विश दृशः स्वाशयं श्रीश मूर्तिः । १३ ।
समस्त जम्बूद्वीप के सभी राजाओं पर जीत के स्तम्भ के रूप में उनके भार
से आक्रान्त होकर यह प्रासाद अपने गर्भ में जगन्नाथ कोरख उनकी शरण पाने
से अत्यन्त सम्मानित हुआ है । यह प्रासाद अत्यन्त ऊंचा है तथा इसका कोई भी
अंग पतला या शक्ति हीन नहीं है । यह जगन्नाथ की मूर्ति के समान अतुलनीय
और दर्शकों को आनन्द देने वाला है ।
प्राकार द्वन्द्वमध्य प्रतत समदृशत् कुट्टि माट्टापकृष्ट
प्रासाद वेष्टिनोऽधस्तृत मसृणलसन्नुद्गत् पाषाण पट्टः
नाना कारावतारैः हरिण नरवरैः कुञ्जरै रञ्जितोऽङ्गः
पुञ्जं कुञ्जाधिराजालय उपचयिनं व्यञ्जयेच्छर्मणा नः । १४ ।