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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 609 में से

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पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१३
इसके दो प्राचीरों के बीच की भूमि समान कटे पत्थरों से ढंकी है । उसके
ऊपर छोटे-छोटे देव प्रसाद हैं । ठीक नीचे चिकना संगमर्मर पत्थर है । मन्दिर
की दीवारों पर मत्स्य, कच्छप आदि अनेक अवतार, सिंह और हाथी मूर्त्ति रखी
हुई है । नगेन्द्र श्रीकृष्ण के घर इस मन्दिर से हम लोगों का सुख बढ़ता रहे ।
प्रग्रीवं सोर्ध्व भागं शिखर मृजुतरं मञ्जरी मञ्जुलाभां
भित्ति ध्वस्ताघभीतिं त्रितनुतनुगृहान् वक्त्रशालां विशालाम्
पीठं शिष्टाभिजुष्टं गृहमति विततं श्री जगन्मोहनारूयं
भोगार्थं मण्डपञ्चाद् भूत मवनी धवस्याश्रये प्रश्रयेण । १५ ।
पृथ्वी पति जगन्नाथ की सभी चीजों का मैं भक्ति और उत्कण्ठा के साथ
आश्रय लेता हूँ । मन्दिर के कण्ठ के नीचे (छाती के ऊपरी भाग-प्रग्रीव) लगे
हुए सीधे शिखरों के समूह अत्यन्त सुन्दर दीखते हैं । मन्दिर के गोलाकार दीवाल
को देख कर सभी पाप नष्ट होते हैं । पाताल में स्थित तीन छोटे घर (मन्दिर के
पास जिसमें गणेश, वामन और वाराह हैं) उसके बाद विशाल मुख शाला ।
इसके बाद जगन्मोहन पीठ है जहां के विशाल घर में शिष्ट लोग बैठते हैं । अन्त
में भोग मण्डप है ।
प्रेक्षन शंखस्य नाभौ सतत गति वशाद् बाहु दण्डैः प्रचण्डैः
शाखाभिश्चण्डरोति स्तनुजनिज जनान् वासयन् किं विदूरात्
कल्पान्तेऽप्यन्तहीनः सकल कलुषहत् सिन्धु राजोऽधिराधो
न्यग्रोधः क्रोध कामाद्यरी परिभव कृद् भूत वर्गस्य भूयात् । १६ ।
मन्दिर का कल्पवट प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होता है और सभी प्रकार के
पापों का नाश करता है । यह महासागर के तीर पर अवस्थित है । यह प्राणियों
के शत्रु काम, क्रोध आदि को परास्त करे । शंख क्षेत्र की नाभि में रह कर यह
कल्प वृक्ष पवन से अपनी भुज दण्ड रूपी शाखाओं से सूर्यपुत्र यम के दूतों को
दूर से ही भगा देता है ।
भद्राभूमाधव श्रीमुषल भृदरिभिः शोभितः श्रीवपुष्मा
नष्मानुष्णां शुजोषाम गम शमनघनः पातु देवाधिदेवः
जन्तुर्मन्तुनिहन्तुं प्रभवति शतशोऽह्नाय यन्नाम गृहन्
पश्यन् श्रश्यत्य वश्यं विषयजल निधौ नेवयं दैव भृत्यः । १७ ।
दैव के अधीन प्राणी भी जिस जगन्नाथ का नाम सौ बार लेने से उसी समय
पाप से मुक्त हो जाता है, जिसे देखने से संसार (विषय) समुद्र में प्राणी नहीं
पड़ता है, जो देवताओं के प्रभु और ताप शान्त करने के लिये वर्षा वाले मेघ हैं
तथा जो सुभद्रा, भूदेवी, माधव, बलभद्र और सुभद्रा के साथ शोभा पाते हैं वे
हमारी रक्षा करे ।