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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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७८० सिद्धान्त दर्पण
साङ्गं येनेन्दु पद्मा द्यखिल मुपमिति द्रव्य मासीत् कृतार्थं

  • विद्बद् भिर्वर्णमानं यदनुमितिकृतः कृत्रिमं विश्वमाहुः
    शब्द ब्रह्म प्रमाणं यदवयव जने यौंऽसकृन्नारदाद्यैः
    साक्षाल्लक्षोऽपि साक्षी भवति नवनवः श्रीधवः सोऽ वतान्नः । १८ ।
    जिसके अंगों से उपमा के कारण चन्द्र और पद्म आदि धन्य हो गये हैं,
    जिसकी कल्पना करने से तार्किकों को यह सचरा चर विश्व ही कृत्रिम (ईश्वर
    की तुलना में) लगता है । जिसके अवयव रूप जगत् की उत्पत्ति में शब्द ब्रह्म
    (ॐ) ही प्रमाण है, जिसे नारद आदि महर्षि प्रत्यक्ष देख पाते थे और जो स्वयं
    सभी के द्रष्टा होकर स्थित है, वे लक्ष्मीपति भगवान नित्य नये रूपों में हमारी
    रक्षा करें ।
    द्रव्यैर्जातुपमानं न भवति कृतिनां प्राकृतैर्जात दोषं
    सर्वान्तर्यामि भवाद्युति मति कृतिभिः यस्य लोकोत्तरस्य
    व्यक्ताव्यक्तेषुसत्वे स्वपरिमित निज व्याप्ति मुद् व्यक्त कामः
    स्तस्मादो दिव्यसिंहोऽभवदिह च महादारु देहः सनो ऽ व्यात् । १९ ।
    भगवान् लोकोत्तर होने के कारण किसी भी प्राकृतिक वस्तु से तुलना (उपमा)
    कर उनका रूप, बुद्धि या प्रयत्न का वर्णन करने में कवियों का दोष होता है ।
    वह सभी के भीतर स्थित हैं । उन्होंने सभी व्यक्त तथा अव्यक्त द्रव्यों में अपने
    असंख्य रूपों को दिखाने के लिये दिव्य सिंह (नृसिंह) का रूप धारण किया
    था । वही दारुब्रह्म रूप में हमारी रक्षा करें ।
    पारावार प्रतीरप्रथित वर महापादपोः स्पर्शनाशा
    प्रोद्यत् प्रासाद पीठार्पित विपुल वपुः पाण्डु पद्मोपमाक्षः
    पूर्ण प्रेम प्रदान प्रवण उपनिषद् प्रार्थ्य मानानुगम्रः
    पापौघाम्नां पुनीयात्पतित पतिमयं पूतना प्राण पायी । २० ।
    समुद्र किनारे कल्पवृक्ष की दिशा में उसे स्पर्श करते हुए सुन्दर मन्दिर में
    पीठ (रत्न सिंहासन) पर विराजमान महाकाय जगन्नाथ की आंखें धवल कमल
    के समान हैं । उन्होंने पूतना राक्षसी के प्राण पी लिया था । उपनिषद् उनकी
    स्तुति करते हैं । वह भक्तों को सदा स्नेह देते हैं । अतः मेरे जैसे पापराशि का भी
    उद्धार करे ।
    अथ श्री जगन्नाथस्य द्वाभ्यां समुद्र साम्यम् -
    लक्ष्मीभृ नांगसद् मामृत खनिरशनि त्रासितक्ष्मा भृदीश-
    स्थानं स्वर्गापगायाः प्रभुरखिलनृणां पापसन्ताप हन्ता
    श्याम श्रीमान् कूर्माद्यमित तनुधरः शंखचक्राब्जवाहः
    कल्पान्त प्रस्त लोकः कलयतु कमलं तीर्थराट् क्रान्ति शन्त्यै । २१ ।
    जगन्नाथ लक्ष्मी पति हैं तथा समुद्र भी लक्ष्मी का पिता है । भगवान नाग