सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४११
पत्तों की शोभा को भी इस पताका की शोभा पराजित करती है । जो पापी लोगों
को अत्यन्त पीड़ित करने वाली यमराज की सेना को भय देते हैं वे संसार पथ
पर थके अपने भक्तों की थकावट दूर कर शान्ति प्रदान करें ।
पताका दण्ड
शौण्डानां दण्डपाणेरपि चरणयुषां दण्डदः केतुदण्डः
श्रुण्डाल स्योर्द्धर्व गत्या अपि किमु विदलन्न्रण्ड मार्तण्ड बिम्बः
चञ्चच्चञ्चत्पताकाश्रय विधुति मिषाद् बाहुराहूत्य लोकः
प्रासादस्यैव दूरादपनयतुभयं पंकतः किंकराणाम् । ८ ।
जो यम के पद सेवक यम दूतों को दण्ड देता है, पताका की ऊर्ध्व गति से
जो प्रखर सूर्य बिम्ब का उत्ताप कम करता है, जो अति स्मणीय भाव से हिलकर
मानों दूर के लोंगो को हाथ हिलाकर बुला रहा है, और मन्दिर की भुजा के समान
है, वह पताकादण्ड हम अकिञ्चन सेवकों के पाप के भय को दूर करे ।
चक्र
चक्रं तन्नक्र शक्र क्रकच कटुतनु क्रान्त्य विक्रान्ति दन्ती
क्रान्ति प्रान्ताति शान्ता जित महित महीः संहरेदं हसां नः
संघसंगात पाता दवितु मविकलं हन्त पातत्य भाजो
भ्राजन् प्रासाद राजोपरि पतितदृशः श्रीशतुर्यां शरूपम् । ९ ।
जिस चक्र ने गज को मुक्त करने के लिए ग्राह के शरीर में आरी तरह घुस
कर काट डाला तथा उसके बाद भी अविकृत शान्त और अपराजित रहा, जो
लक्ष्मीपति भगवान के चतुर्भुज रूप में विद्यमान है तथा मन्दिर के ऊपर चमक
रहा है वह अपने दर्शन करने वाले पापियों के प्रसार और संकट को पूरी तरह
नष्ट करे ।
कलश
पर्यन्तोत्कीर्णनानाभरण चणतनुश्चातनुंः शीतदायी
सोऽन्तः सन्ताप शान्त्यै विलसतु कलशः सत्सुधाधारधामा
यः पद्माकान्त सद्मा भवविवुध शिरोगर्भ काकार चक्रा
क्रान्तश्रूडेव निः श्रेयस पथ पथिकानर्थहद् हृद्र कुम्भः । १० ।
चक्र के नीचे स्थित स्वर्ण कुम्भ ही मन्दिर का कलश है, जो विशाल अमृत
से भरा हुआ है तथा उस पर अनेक प्रकार के चित्र बने हुए हैं, वह सुखदायी
तथा मोक्षमार्ग पर चले वालों का अनर्थ दूर करता है । जगन्नाथ मन्दिर के मस्तक
के केन्द्र में गोल ढक्कन के समान रहने के कारण वह मन्दिर की चूड़ी के समान
दीखता है । वह हमारे हृदय के दुख समूह का नाश करने के लिए सदा विराजमान
रहे ।