सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
वासना शेष रहस्य वर्णन ३७७
प्राग् भागे निजकक्षायां न्यसेद् बिम्बं महीभुवः
सूर्य भूमंगलस्यूत सूत्राग्रे बहु दूरतः । १२३ ।
इस कक्षा की पूर्व दिशा में मंगल को रखेंगे । पृथ्वी, रवि और मंगल के
केन्द्र से एक रेखा खींचकर बहुत दूर में
प्रकल्पां तारकां काञ्चित् प्राच्यं कौतत्समं कुजम्
दृष्ट्वा चक्राङ्कगं याम्य भाग मूर्ध्वं विचार्य च । १२४ ।
पूर्व दिशा में एक तारा की कल्पना कर उसे रखेंगे । पृथ्वी के अति निकट
में मंगल रखकर उसे उसी तारा की दिशा में रखेंगे । यह कक्षा के दक्षिण भाग
में होगा और इस भाग को ऊर्ध्व मानकर
मध्यार्कं दक्षिणं नीत्वा हर्गंत्यां गुल मानया
तथा भौमं सकक्षञ्च सार्धा (५) शोनांगुलात्मना (४८) । १२५ ।
दैनिक एक अंगुल गति से मध्यम रवि को दक्षिण भाग की तरफ चलायेंगे ।
कक्षा सहित मंगल को ४८ अंगुल गति से
स्वगत्यो तरणं कुर्यात्तारा सूत्रात् सयाम्यगः ।
षष्ठ्यंशकै र्द्वादशभ (१२) दृश्यतेऽन्तरितः स्फुटः । १२६ ।
उत्तर दिशा में चलायेंगे । ऐसा करने से स्फुट मंगल तारा सूत्र से १२ षष्ठ
यंश कला दक्षिण दिशा में खिसकेगा ।
भूमि सूर्यान्तराद्धं यद् भूमि भौमान्तर श्रवः
ततः सिद्ध कला दृश्या साक्षाद् वक्रा गति र्भुवि । १२७ ।
पृथ्वी से मंगल कर्ण (दूरी) सूर्य कर्ण दूरी या अन्तर का आधा होगा और
पृथ्वी से मंगल की वक्र गति २४ कला (१२ कला की दूनी) दीखेगी ।
चक्रे कुजार्कयोरेक दिङ् गतिर्नग दिक् (१०७) कला
भौमयाम्य गतिः सूर्य कर्ण (५८) घ्नी निजकर्म (१४५) हृत् । १२८ ।
उद्य स्थान से रवि और मंगल की एक दिशा में स्थिति के कारण १०७ कला
मंगल दक्षिण गति को सूर्य कर्ण (५८) से गुणा कर अपने कर्ण १४५ (सूर्य कक्षा
व्यासार्द्ध ५८ मंगल कक्षा व्यासार्द्ध ८७) से भाग देने पर (१०७ x ५८)/१४५ =
४३)।
रामाब्धि (४३) कलिका साक्षाद् ऋज्यो भवति तद् गतिः
इत्थमन्य ग्रहाणाञ्च द्रष्टव्या विविधा बुधैः । १२९ ।
४३ कला मंगल की मार्गी गति होगी । यह उक्त चित्र में स्पष्ट प्राप्त होता है।
इसी प्रकार उदाहरणों से अन्य ग्रहों की भी मार्गी और वक्री गति प्रत्यक्ष देखी जा
सकती है ।
३७८ सिद्धान्त दर्पण
- प्राक् सिद्धान्त मते सैव इति कक्षा कुजस्य तु
नवाशा (१०९) ङ्गुल सूत्रोत्थ कार्याभूवेष्टन क्रमात् । १३० ।
पूर्व सिद्धान्त के अनुसार पहले कहे गये रवि कक्षा को ही रवि कक्षा मानें ।
पृथ्वी केन्द्र की मंगल कक्षा का केन्द्र माने । पृथ्वी के चारों तरफ भू केन्द्र से १०९
अंगुल व्यासार्द्ध से मंगल कक्षा बनाये ।
एक सूत्रेऽर्क भू भौमाः स्थाप्या भञ्चपुनः पुनः
स्वशीघ्र तपनाकृष्टः पश्चाद् व्यद्रा (७२) ङ्गुलान्तरे । १३१ ।
एक सूत्र में सूर्य, पृथ्वी और मंगल बिम्ब को रखकर भकक्षा के के एक नक्षत्र
को भी प्रायः उसी सूत्र में रखेंगे । मध्यम सूर्य मंगल के शीघ्रोच्च है । उससे आकृष्ट
होकर मंगल पश्चिम दिशा में ७२ अंगुल दूरी पर
स्थितश्चक्रार्द्धगो दृश्यस्ततो दिन गतिः समा
याम्ये सौम्येऽर्क कुजयोर्दत्वा प्राग् वत् स्वकक्षयोः । १३२ ।
अपने नीच स्थान (चक्रार्द्ध) में दीखेगा । इसके बाद रवि और मंगल की
दैनिक गति क्रमशः दक्षिण और उत्तर की तरफ अपनी अपनी कक्षा में पहले के
समान दिखायेंगे ।
ततस्तावदिनाकृष्टे रङ्गुलं गां (७) शउत्तरे
सूत्राद् गंतस्य दृश्यस्य प्राग् गति विश्व (१३) लिप्ति का । १३३ ।
वहां से सूर्य आकर्षण के १/७ भाग (७ २/७) उत्तर को मंगल की १३ कला
पूर्व गति दीखेगी ।
भूमध्यार्क समे सूत्रे भकक्षायां यदीष्यते
शीघ्रोच्च तद् गति द्वैधा चक्र चक्रार्द्धयो भवेत् । १३४ ।
परन्तु नीच स्थित मंगल की वक्र पश्चिम गति भी दीख सकती है । पृथ्वी
केन्द्र और सूर्य केन्द्र से जाते हुए सूत्र (रेखा) भकक्षा को जिस स्थान पर काटेगा
वहां शीघ्रोच्च पर उच्च और नीच स्थान में दो प्रकार की गति होगी - एक पूर्व और
दूसरी पश्चिम ।
तदाकर्षात् कुजादीनां यद्यत् स्यात् प्रतिमण्डलम्
तत्रन्मध्येऽर्क मध्यस्य स्थितेः सिद्धयति तद् भ्रमः । १३५ ।
शीघ्रोच्च आकर्षण के कारण मंगल आदि ग्रहों का जो शीघ्र प्रतिवृत्त होता है
उन्हीं के केन्द्र में रवि का केन्द्र होने से मध्यम रवि की मध्यम गति भी सिद्ध
होती है ।
यदि भूमध्यका कक्षा मन्यते तन्मृदून्नयात्
आकर्षणान्न भिद्येत शरस्तेषां विधोरिवः । १३६ ।
वासना शेष रहस्य वर्णन ३७९
मंगल आदि की कक्षा का केन्द्र यदि पृथ्वी केन्द्र होता है, तो मन्दोच्च आकर्षण
से ही इसका भी शर होता है, जैसे चन्द्रमा का होता है। (चन्द्र शर के लिए एक
ही अनुपात होता है। उसी प्रकार इनका भी होता दो अनुपातों की आवश्यकता
नहीं होती) ।
केवलं शीघ्रजाकर्षा भेदोयः प्रतिपद्यते
सत्रिज्याघ्नन्त्य कर्णाप्त मध्येष्पोरेव सिद्धयते । १३७ ।
यह नहीं होने से अर्थात् शीघ्रोच्च आकर्षण के कारण उनका प्रभेद उत्पन्न
होने के कारण उस शर को त्रिज्या से गुणा कर ४ र्थ कर्ण से भाग देने पर ही
भगोलीय शर प्राप्त होता है ।
तत्रांर्कोत्थ गुणद्वन्द्वे शरान्तौ लगतौ यतः
मन्दाकृष्टस्य नीचोच्च गतावपि नभः सदः । १३८ ।
रवि केन्द्रित ग्रह कक्षा में मन्दोच्च से आकृष्ट ग्रह नीच उच्च की तरफ गति
करते समय रवि से ग्रह गोलीय विमण्डल तथा प्रतिमण्डल के दो सूत्रों से दो
शरान्त लगता है ।
मदुक्तयोशर श्रुत्या संस्कृतेषोः स्फुटत्वतः
मध्यार्काभिभ्रमः सिद्धः शुक्रेज्यार्कि बुधाः सृजाम् । १३९ ।
अतः मैने पहले जैसा कहा है कि उसके अनुसार शर साधन योग्य कर्ण द्वारा
स्फुट शर होने के कारण शुक्र, गुरु, शनि बुध और मंगल का मध्यम सूर्य के
चारों तरफ भ्रमण करना सिद्ध होता है ।
मध्यार्क केन्द्र का कक्षा यत्ताराक्ष नभः सदाम्
तन्मन्दा कृष्टि रे वैषां भूमौ भनैक्ष्यतेऽर्कतः । १४० ।
मंगल आदि पांच तारा ग्रहों की कक्षा रवि केन्द्रित तथा इनकी मन्दा कर्षण
रेखा पृथ्वी से सदा अलग दीखती है ।
ततोमन्द स्फुटं खेटं ज्ञातुं कर्मद्वयं कृतम्
शैघ्र मान्धार्द्ध नामादौ इतः स्पष्टां मृदुक्रियाम् । १४१ ।
मंगल आदि तारा ग्रह सूर्य केन्द्रित अपनी अपनी कक्षा में घूमने के कारण
मन्द स्फुट ग्रह जानने के लिये पहले मध्यम ग्रह का शीघ्र फलार्द्ध तथा उसके
बाद मन्द फलार्द्ध संस्कार किया जाता है ।
मन्दस्पृष्टस्य भूगोल दूरता दूरता वशात्
भचक्रावस्थितीक्षायै तुर्यं द्राक् कर्म निर्मतम् । १४२ ।
उसके बाद स्फुट मन्दफल संस्कार किया जाता है। तब भूगोल से अति दूर
होने के कारण और मन्द स्पष्ट ग्रह का भचक्र में स्थिति देखने के लिये ४र्थ शीघ्र
फल का संस्कार किया जाता है ।
३८० सिद्धान्त दर्पण
इत्थं शैघ्यार्द्ध मान्द्यार्द्ध मान्द्य शैघ्यः फलैरपि
ज्ञारार्किणां कियद् भेद लाभात्तत् शुद्धयेमया । १४३ ।
इसी प्रकार शीघ्र फलार्द्ध, मन्दफलार्द्ध मन्दफल, शीघ्रफल- इन चार फलों
के संस्कार से मंगल बुध, और शनि की स्पष्टता की जाती है । तब भी इसमें कुछ
त्रुटि दीखने के कारण और शुद्धि के लिये -
परोच्च संस्कृति प्रोक्ता विधोस्तुं गान्तरादियत्
तत्तफलं मुनि प्रोक्त बीजमित्य विधार्यताम् । १४४ ।
मैने इन सभी में परोच्च संस्कार भी किया है । चन्द्र का तुंगान्तर आदि जितने
फलों का संस्कार कहा गया है उन सबों को आर्ष वचन का बीज (संशोधन)
मानना चाहिये ।
आर्ष सिद्धान्ततो ये ये विशेषा दृष्टि सिद्धये
स्फुटीकृतौ प्रकल्प्यन्ते ते बीजत्वेन सम्मता । १४५ ।
ग्रह को दृक् सिद्ध करने के लिए आर्षसिद्धान्त से जितने विशेष संस्कारों की
कल्पना की गयी है, उन सभी को बीज संस्कार माना जाता है ।
तथाहिवार्तिके ज्ञात ग्रहों पदेशाद् बीजं ज्ञात्वा सुदैवज्ञैः
सत्संस्कृत ग्रहेभ्यः कर्तव्यौ निर्णयादेशौ । इति । १४६ ।
उत्तम ज्योतिषियों ने प्रसिद्ध ज्योतिष शास्त्रों का बीज संस्कार देखकर उनसे
स्फुट ग्रह साधन किया तथा इसी बीज संस्कार से स्पष्ट ग्रहके अनुसार तिथि,
ग्रहण आदि का निर्माण और शुभ अशुभ फल कहा जाता है । (वार्त्तिक में)
सिद्धान्त शिरोमणौ मध्येहि मन्दप्रतिमण्डले स्वे मन्द स्फुटो द्राक् प्रतिमण्डले च
भ्रमत्यतश्चञ्चल कर्मणोह मन्दस्फुटो मध्य खगः प्रकल्प्यः । १४७ ।
मन्द प्रति वृत्त में मध्य ग्रह और शीघ्र प्रतिवृत्त में मन्द स्फुट ग्रह घूमते हैं ।
अतः शीघ्र फल संस्कार करने के समय मन्द स्फुट ग्रह को मध्यम ग्रह मानना
चाहिये । (सिद्धान्त शिरोमणि से)
भ्रमन् ग्रहः स्वे प्रतिमण्डल नृभिः सयत्र कक्षा वलये विलोक्यते
स्फुटो हि तत्रस्य फलोपपत्तये प्रकल्पितं तुंग मिहाद्य सूरिभिः । १४८ ।
अपने प्रतिवृत्त में ग्रह घूमने के समय उनको मनुष्य कक्षावृत्त (भकक्षा) में
जिस स्थान पर देखते हैं, वही वास्तविक स्फुट ग्रह है । वही स्थान (या दिशा)
उस समय का स्फुट ग्रह है । इस स्फुट ग्रह की राशि आदि जानने के लिए
प्राचीन आचार्यों ने उच्च (मन्दोच्च तथा शीघ्रोच्च) की कल्पना की है ।
यःस्यात् प्रदेशः प्रतिमण्डलस्य दूरे भुवस्तस्यकृतोच्च संज्ञा ।
सोऽपि प्रदेशश्चलतीति तस्मात् अकल्पिता तुंग गति र्गतिज्ञैः । १४९ ।
वासना शेष रहस्य वर्णन ३८१
प्रतिवृत्त जिस स्थान पर पृथ्वि से सबसे दूर हो उस स्थान को ही उच्च नाम
दिया गया है। यह स्थान भी गति शील होने के कारण विज्ञानियों ने उच्च गति
की कल्पना की है।
उच्चात् भषट् कान्तर तच्च नीचं मध्यः स्वनीचोच्च समोयदा स्यात्
कक्षास्थ मध्योपर कर्ण सूत्र पातात् स्फुटो मध्य समस्तदानीम् । १५० ।
उच्च से ६ राशि दूरी पर (प्रति वृत्त का जो स्थान पृथ्वी के सबसे निकट हो)
उसे नीच स्थान कहा गया है। मध्य ग्रह उच्च सहित या नीच सहित समान होते
पर कर्ण सूत्र (भूकेन्द्र से स्पष्ट ग्रह की रेखा) कक्षा वृत्त में मध्य ग्रह के स्थान से
होकर जाता है। अतः भुजफल का अभाव होता है, और मध्यग्रह तथा स्पष्ट ग्रह
समान होता है।
उच्चस्थितो व्योम चरः सुदूरे नी चस्थितः स्यान्निकटेधरिञ्य
अतोऽणुबिम्बः पृथुलश्च भाति भानोस्तथासन्नसुदूरवर्ती । इति । १५१ ।
ग्रह उच्च स्थान में पृथ्वि से सबसे दूर नीच स्थान पर सबसे निकट होता
है। अतः उच्च और नीच का ग्रह क्रमशः बड़ा और छोटा दीखता है। (उद्धरण
समाप्त) ।
छाया लोकाद् यन्त्र वेधो दयनात्तद्वयं रवेः
सप्ताब्धयं (४७) शान्तरं दृष्टं तत्सिद्धां (२४) शाल्यकोपमः । १५२ ।
शंकु और उसकी छाया, यन्त्रवेध तथा आयन आदि विचार द्वारा मैंने देखा
है कि सूर्य की दोनों क्रान्ति (उत्तर तथा दक्षिण) ४७° अंश के भीतर ही है। अतः
मैंने प्राचीन शास्त्र मत के प्रति क्रान्ति के २४° से कम २३° ३०' (दोनों क्रान्ति
४७°) माना है।
चन्द्र ग्रहस्य गणितं सवासन मुदाहृतम्
लम्बनस्योपपत्तिश्च तस्याल्प बहुतोच्यते । १५३ ।
चन्द्र ग्रहण का गणित सभी युक्ति के साथ कहा गया है। इस समय लम्बन
की उपपत्ति उसके कम और अधिक होने के विषय में कहता हूँ।
चक्रार्द्धान्तरितौ तुल्य भागलिप्ताविलिप्तकौ
स्यातां यदर्क शशिनौ शराल्पत्वे यदा विधौ । १५४ ।
जिस समय रवि और चन्द्र दोनों ६ राशि की दूरी पर रहते हैं, तथा उनका
अंश कला और विकला समान होते हैं, उस समय मानैक्यार्द्ध (बिम्ब व्यासों के
योग का आधा) से चन्द्र का शर कम होने से -
भूछाया लगतीत्यत्र समकक्ष स्थिते स्तयो
लम्बना वनती न स्तो रजनीरमण ग्रहे । १५५ ।
३८२ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र बिम्ब में भूछाया लग जाती है । इससे ज्ञात हुआ कि चंद्र और भू छाया
एक ही कक्षा (चन्द्र कक्षा) में हैं । अतः इसमें नत और लम्बन नहीं होता ।
सूर्य ग्रहे तु सूर्येन्दो र्भिन्न कक्षा निवासतः
देश भेदात् ग्रास भेदो लम्बनावनती तथा । १५६ ।
सूर्य ग्रहण में सूर्य छाया तथा चन्द्र छादक-दोनों किसी एक कक्षा (रवि चन्द्र
कक्षा) में नहीं रहने के कारण-अर्थात् अलग अलग कक्षाओं में रहने से पृथ्वी
पर स्थान भेद से ग्रास भी कम या अधिक होता है । इस एक ही कारण से लम्बन
और नति भी होता है ।
दृङ्मण्डल फल दृश्यं क्वाद्धोनं गोलपृष्ट गैः
ग्रहस्या यततो दृष्टि मण्डले सम्भवेन्नतिः । १५७ ।
पृथ्वी के गोलाकार सतह पर लोग किसी ग्रह को दृङ्मण्डल के आधे से
भूव्यासार्द्ध के बराबर कम क्षेत्र में देखते हैं । अतः दृङ्मण्डल में ग्रह का लम्बन
होता है ।
क्षिति जो पगते सूर्य दर्शान्ते भूमि गर्भतः
रवि बिम्बार्द्धगे सूत्रे बिम्ब मध्यं लगेद् विधोः । १५८ ।
अमान्त समय में सूर्य पृष्ठ क्षितिज पर आने से पृथ्वी के केन्द्र से सूर्य केन्द्र
तक की रेखा में चन्द्र भी रहता है । (सूर्य ग्रहण के समय) किन्तु
भू पृष्ठाद भानु बिम्बार्द्ध चुम्बि सूत्राद् विधुर्यतः
अधो विलम्बते तस्मात् क्षितिजेऽस्मिन् धरा नतिः । १५९ ।
किन्तु भूमि पृष्ठ से रवि बिम्ब केन्द्र तक की रेखा से चन्द्र लम्ब दिशा में रहने
के कारण और यह सबसे अधिक होने के कारण इसका परमनति या परम लम्बन
कहा जाता है ।
गर्भदृक् सूत्रयो रैक्यात् खमध्येन भवेदसौ
खस्वस्तिक क्षितिजोर्मध्ये सूत्रभेदान्नतिर्भवेत् । १६० ।
आकाश के मध्यस्थल अर्थात् खस्वस्तिक में ग्रह बिम्ब रहने पर पृथ्वी के
पृष्ठ से तथा केन्द्र से एक ही दृक् सूत्र होता है । उनमें अन्तर नहीं होने के कारण
नति नहीं होती है । ख स्वास्तिक तथा क्षितिज के बीच में किसी स्थान में पृष्ठ
से ग्रह की दिशा तथा केन्द्र से दिशा के बीच के अन्तर को नति या लम्बन कहते
हैं ।
खार्द्धे यदापवृत्तं स्यात्तदा तद् दृष्टि बिम्बयो
ऐक्यान्नावनतिः किन्तु लम्बनं परमं कुजे । १६१ ।
ख स्वस्तिक में रवि रहने से क्रान्ति वृत्त ही दृङ् मण्डल होगा अतः नति
नहीं होगी । केवल क्षितिज में परम लम्बन होगा ।
वासना शेष रहस्य वर्णन ३८३
यदादृक् क्षेप वृत्तस्यः खेचरोऽवनति स्तदा
परमाल्म्बनाभावस्ततो दृक् क्रान्तिवृत्तयोः । १६२ ।
ग्रह दृक् क्षेप वृत्त में रहने से नति होती है । किन्तु परम लम्बन नहीं होता
(अधिकतम मान से कुछ कम होता है) अतः दृङ् मण्डल और क्रान्तिवृत्त में
नत्यन्तजान्तर कलाधिक्या लम्बन संक्षयः
क्रान्तिदृग् वृत्त संयोगात् सार्द्धगस्य न तद् युगम् । १६३ ।
अन्तर के कारण या रवि चन्द्र इन दोनों की उत्तर और दक्षिण क्रान्ति में अन्तर
के कारण दोनों की पूर्व पश्चिम अन्तर कला भी बढ़ जाती है ।
खमध्य में दोनों (क्रान्ति वृत्त और दृङ्मण्डल) एक होने के कारण नत या
लम्बन नहीं होता ।
त्रिभोन लग्न जा द्यस्मात् क्रान्ति वृत्ताद् गतः शरः
प्राप्नोति नभसि मध्यं मध्याह्ने, तु शराग्रतः । १६४ ।
त्रिभोन लग्न का शर क्रान्ति वृत्त से खस्वस्तिक तक जाता है । मध्याह्न में
पुनः शराग्र पर-
याम्योदिग् लम्बित श्चन्द्रो दर्शान्तेऽर्क समो न यत्
लम्बनेऽवनतौ तस्मात् ग्राह्यो लग्नस्त्रि भोनितः । १६५ ।
लम्बित चन्द्र अमान्त में रवि के समान दृक् सूत्र में नहीं रह पाता है । अतः
लम्बन नति साधन करते समय वित्रिभ लग्न की कल्पना की जाती है ।
त स खार्द्धे नतज्या या सा प्राक् पश्चिम संस्थितेः
वक्रत्वात् सम्भवेद् बहो तत् सिद्धा वुदयज्यका । १६६ ।
वित्रिभ की याम्योत्तर वृत्त में जो नतज्या (दृग्ज्या) होती है, वह वित्रिभ के
पूर्व पश्चिम अन्तर में वक्र होने के कारण अधिक होती है । विभिन्न लग्न का नतांश
उक्ता यद् वित्रिभ तनु क्रान्ति वृत्तं यथा यथा
वक्रं तथा तथा लग्न क्रान्तिज्या महती भवेत् । १६७ ।
वित्रिभ दृङ्मण्डल में अर्थात् दृक् क्षेप वृत्त में ही होता है । यह दृक् क्षेपवृत्त
कदम्ब प्रोत वृत्त होने के कारण क्रान्ति वृत्त पर सदा लम्ब होता है । उसकी क्रान्ति
ज्या के अनुपात में ही विभिन्न लग्न की नतज्या भी बढ़ जाती है ।
यदा वित्रिभ लग्नस्य क्रान्तिः सौभ्याक्ष तुल्यताम्
प्रयाति विषु व क्रान्ति रुदेति च यदा तदा । १६८ ।
विभिन्न लग्न की उत्तर क्रान्ति जिस देश के अक्षांश के समान होती है, उस
देश में सायन मेषादि जिस समय उदय होता है, उस समय
गोलाध्याय, यन्त्राध्याय (मानयन्त्र निर्माण) एवं सिद्धान्तदर्पण उपसंहार
३८४ सिद्धान्त दर्पण
समता सम्भवेन्मध्य लग्न वित्रिभ लग्नयोः
नान्यदा तत्तयोः स्यातां येनत ज्ये तदन्तरा । १६९ ।
मध्य लग्न तथा वित्रिभ लग्न समान होता है । अन्य स्थानों पर ऐसा नहीं
होता । वहां पर मध्य लग्न और वित्रिभ लग्न के अन्तर की नतज्या-
शरवद् भाति दृक् क्षेपो दृग् ज्या सा वित्रिभांगजा
विक्षेपाग्र स्थित स्येन्दो भवेद वनतिः स्फुटा । १७० ।
उन दोनों के नीच वित्रिभज्या के शर के समान मानी जाती है । शर के अग्र
में स्थित चन्द्र की इस स्थिति में स्फुट अवनति होती है ।
तत् शरेणाक्ष संस्कारे कृते तस्मात् शराक्षतः
क्रान्ति संस्कार संसिद्धोदृक् क्षेपः स्यात् परिस्फुटः । १७१ ।
अतः शर में अक्ष संस्कार करने के बाद उसको पुनः वित्रिभ क्रान्ति द्वारा
संस्कृत करने से दृक् क्षेप परिस्फुट होता है ।
पर्वान्तो यः समदितः स्फुटां लम्बन संस्कृतः
अर्केन्द्वोः क्रान्ति वृत्तोदक् याम्य स्थितैस केवलम् । १७२ ।
लम्बन संस्कृत जो स्फुट पर्वान्त कहा गया, वह पृथ्वी की सतह से रवि और
चन्द्र एक कदम्ब प्रोत वृत्त में उत्तर दक्षिण स्थित रहने पर ही होता है ।
त्रिभोन लग्नज क्रान्ति गति र्बंहो यथा यथा
शरानुसारतो ग्रास काल भेदस्तथा तथा । १७३ ।
त्रिभोन लग्न की क्रान्ति गति जैसे जैसे बढ़ेगी शर गति के कारण ग्रास और
स्पर्श आदि काल का अन्तर भी उसी प्रकार बढेगा ।
उक्ता ग्राहक मार्गस्य छेद के या दृशो स्थितिः
तत्क्रमाञ्चालिते तस्मिन् ग्रासकाले भवेत्स्फुटः । १७४ ।
ग्रहण परिलेख में ग्राहक मार्ग से छेदक की जिस प्रकार स्थिति बतायी जाती
है, उसी क्रम से ग्राहक मार्ग से चलाने से ग्रहण समय स्पष्ट हो जायेगा ।
विषुवोदय काले चेत् पर्वलम्बन संस्कृतम्
तदा मध्य ग्रहस्तुल्योऽन्यथान्यूनोऽधिको भवेत् । १७५ ।
सायन मेषादि के उदय समय में यदि स्फुट अमान्त पड़े तब पहले निकाला
गया मध्य ग्रहण काल ही समान होगा अर्थात् उसमें कुछ जोड़ने या घटाने की
आवश्यकता नहीं होगी ।
एवं तदुदये स्पर्श मोक्ष कालस्य तुल्यता
उदय ज्योद् भवः काल भेदः स्यादिक् शर क्रमात् । १७६ ।
इसका कारण उस समय लग्न क्रान्ति का अभाव है । अन्य समय में अमान्त
वासना शेष रहस्य वर्णन ३८५
काल होने पर उसमें अर्थात् मध्य और स्फुट अमान्त में अनेक भेद होगा। विषुवोदय
में स्पर्श और मोक्ष काल से भी तुल्यता होगी। शर की दिशा के कारण लग्न
क्रान्ति ज्या के अनुसार समय का भी अन्तर होगा।
गर्भात् पृष्ठाद् भुवः सूत्रे क्षितिजस्थं विधुं प्रति
प्रसारिते समे स्यातां ततश्चन्द्रे समुद् गते। १७७।
भूगर्भ और भू पृष्ठ से क्षितिज पर स्थित चन्द्र तक के दोनों सूत्रों की लम्बाई
समान होती है।
क्रमात् पृष्ठाद् गतं सूत्रम् अल्पस्याद् गर्भसूत्रतः
सन्निकर्षाद् विधोः तस्मात् मानाधिक्यं नरोद् भवम्। १७८।
चन्द्र क्षितिज से ऊपर उठ जाने पर चन्द्र पर इन दो रेखाओं में पृष्ठ से जाता
हुआ सूत्र गर्भ के सूत्र से छोटा होता है। अतः वहां चन्द्र शंकु भी अधिक हो
जायेगा। (शंकु की चौड़ाई अधिक होगी)
भिन्न कक्षा स्थिति वशाद् रवीन्दोः शंकु संम्भवा
तमसोऽधिकता ग्रासकालयोर्वृद्धि दा भवेत्। १७९।
रवि और चन्द्र भिन्न कक्षा में स्थित होने के कारण शंकु द्वारा उत्पन्न अन्धकार
(छाया) बड़ी होगी तथा ग्रास और ग्रहण काल में भी वृद्धि होगी (सतह पर)।
ग्राह्य ग्राहकयोरेक कक्षावासाद् विधुग्रहे।
न काल ग्रास भेद, स्यात् मानाधिक्येऽपिशंकुजे। १८०।
चन्द्र ग्रहण में ग्राह्य और ग्राहक एक ही कक्षा में होने के कारण शंक का
मान अधिक होने पर भी ग्रहण समय और ग्रास का अन्तर नहीं होगा।
विमण्डल गतिर्वक्रा पूर्णामान्तेऽप मण्डलात्
यावत् स्यात्त न्मिति श्चन्द्र गत्यर्काश मितायतः। १८१।
पूर्णान्त में विमण्डल क्रान्तिवृत्त के ऊपर लम्ब होने के कारण शरगति भी
वक्र होती है। शर गति का मान पृथ्वी पर चन्द्र गति के १/१२ भाग के बराबर
है।
स्पर्शाद्याः शशिनस्तस्मात् शराकां शोत्थ कालतः
प्राक् पश्चात् भावमायान्ति मध्य ग्रास श्च भूरिताम्। १८२।
अतः चन्द्र का स्पर्श आदि के समय से वास्तविक समय शर के १/ १२ अंश
से उत्पन्न समय पहले पीछे होगा। मध्य ग्रास का समय भी इसी के अनुसार
बढ़ जायेगा।
ग्राहकान्य दिशि स्पष्टो ग्राह्यस्यैव यतः शरः
ततश्चन्द्र ग्रहे ग्रास बाणयो र्दिग् भिदा मता। १८३।
३८६ सिद्धान्त दर्पण
ग्राहक के विपरीत दिशा में ग्राह्य शर होने के कारण ग्रास और शर की दिशा
अलग होती है । (चन्द्र ग्रहण में)
ग्राहकस्यैव चन्द्रस्य स्फुटेष्युर्यत् स्वदिग् गतः
तद् ग्रास बाणयोः सिद्धं दिक् साम्यं सूर्य पर्वणि । १८४ ।
सूर्य ग्रहण में ग्राहक चन्द्र का शर ग्राहक दिशा में रहता है । अतः ग्रास
और शर एक ही राशि में होते हैं ।
चन्द्रस्यैव यतः सिद्धं वलनं ग्रहण द्वये
तस्माद्ग्राह्यस्य चन्द्रस्य स्पर्शे तत् स्यात् स्वदिग् गतम् । १८५ ।
दोनों ग्रहणों में चन्द्र का ही वलन होता है । अतः चन्द्र ग्रहण में चन्द्र के
स्पर्श के समय स्पष्ट वलन को पूर्व दिशा के चिह्न से अपनी दिशा में
व्यस्त दिङ् मोक्ष काले स्याद् ग्राहकस्य रवि ग्रहे
मोक्ष कालं निजाशास्थं स्पर्शे तद् विपरीत गम् । १८६ ।
तथा मोक्ष काल में पश्चिम चिह्न से विपरीत दिशा में देंगे । सूर्य ग्रहण में
पूर्व दिशा में मोक्ष होने के कारण मोक्ष समय में पूर्व चिह्न से अपनी दिशा में
स्पष्ट वलन दिया जायेगा । तथा स्पर्श समय में पश्चिम चिह्न से उल्टी दिशा में
दिया जायेगा ।
उदयेऽस्तमये देशेऽव्यक्षे प्रायिक दिङ्मुखम्
बिम्बं स्यादन्यदेशेऽस्मा दक्षजं वलनं भवेत् । १८७ ।
निरक्ष प्रदेश (विषुववृत्त स्थान) में उदय, अस्त और मध्याह्न समय में ग्रह
बिम्ब अपने वास्तविक दिशा में ही होता है । अन्य स्थानों में अक्ष वलन होता
है ।
ध्रुवा भिमुख विश्रान्ते स्तदुन्नत्यनुसारतः
प्राक् चिह्नं बिम्बगं खार्द्धे यत्तत् पूर्व कपाल के । १८८ ।
ग्रह बिम्ब ध्रुव की दिशा में भ्रमण करने के कारण ध्रुव की उन्नति (अर्थात्
अक्षांश) के अनुसार आकाश के मध्य स्थल में बिम्ब का पूर्व चिह्न पूर्व कपाल
में रहता है ।
भवेदुदन्मुखं प्रत्यक् कपाले दक्षिणामुखम्
तद् भेदादायनं दृश्यं वलनञ्च पृथग् विधम् । १८९ ।
और उत्तर की तरफ झुकता है । पश्चिम कपाल में यह दक्षिण की तरफ झुकता
है । आक्ष वलन के कारण बिम्ब की दिशा में अन्तर दीखने के कारण दृक् सिद्ध
आयन वलन भिन्न प्रकार का होता है ।
वासना शेष रहस्य वर्णन ३८७
सिद्धान्त शिरोमणौ-त्रिज्या वर्गादयन वलनज्या कृतिं प्रोज्झ्यमूलं
यष्टियष्ट्याद्युचर विशिखस्ताड़िता स्त्रिज्ययाभः
यद्वा राशित्रय युत खगद्युज्यकाघ्नस्त्रिमौर्व्या
भक्तस्पष्टो भवति नियतं क्रान्ति संस्कार योग्यः । इति । १९० ।
त्रिज्यावर्ग से अयन वलन ज्या का वर्ग घटाकर उसका वर्गमूल निकाले ।
इसको यष्टि कहा जाता है । ग्रह (चन्द्र) के शर को इस यष्टि से गुणा कर त्रिज्या
(३४३८) से भाग देने पर क्रान्ति संस्कार के लिये उपयोगी शर आता है । अथवा
ग्रह में ३ राशि (९०°) जोड़कर उसकी भुज ज्या निकालें । उसको पुनः शर से
गुणा कर त्रिज्या से भाग देने से भी क्रान्ति उपयोगी शर आता है ।
इतियद् भास्कर प्राहः सूक्ष्म बाणस्य तानवम्
युक्ति युक्तं न तद् तस्मात् विहितायन दृश् क्रियः । १९१ ।
इस श्लोक में भास्कराचार्य ने सूक्ष्म शर (स्फुट ध्रुव प्रोतवृत्तोय) का कम मान
३८८ सिद्धान्त दर्पण
कालांशा ये निगदिता ग्रहाणा मुदयास्तजाः
तत्संग गृह्यतामत्र सौम्य क्रान्त्यन्तरं रवेः । १९६ ।
ग्रहों का जो उदय और अस्त कालांश कहा गया है, ग्रह और रवि का उत्तर
क्रान्ति का अन्तर उतना अंश रहने पर उनका उदय अस्त आरम्भ होगा ।
उदग् देशान्तरद्धिंः स्याद यथा व्यक्षात्तथापम
याम्येनातः प्रायशोऽस्मात् सौम्य शृंगोन्नतिर्विधो । १९७ ।
निरक्ष देश से उत्तर अक्षांश जैसे जैसे बढ़ेगा, क्रान्ति वृत्त दक्षिण में चन्द्र
दृङ् मण्डल से उतना ही नत रहेगा । इस कारण से चन्द्र की उत्तर शृंगोन्नति होती
है ।
रवीन्दु मार्गयोर्भूरिविप्रकर्षेऽपि तद् दृशोः ।
संगतः स्यान्महापाते क्रान्ति साम्यात् पुरोदितात् । १९८ ।
वैधृति और व्यतीपात को महापात कहा जाता है। सूर्य और चन्द्र की कक्षा
में बहुत अन्तर होने पर भी दोनों की क्रान्ति समान होने से इनकी किरणों के
मिलन के
वासना शेष रहस्य वर्णन ३८९
विविधग्रह भुक्तीनां साक्षात्कारात् शरीरिणाम्
शुभाशुभानिकर्माणि ज्ञायन्ते प्राक् कृतान्यपि । २०३ ।
विविध ग्रहों की अनेक प्रकार की गति देख कर शरीरधारियों के पूर्व जन्म
में किये हुए शुभ अशुभ कर्मों का ज्ञान होता है ।
तथा तद् बिम्बमानानां कक्षाणां योजनानि च ।
तत्तद् विक्षेपतो भूमेः स्थिरत्वं चानुमानतः । २०४ ।
(ग्रहगति से) ग्रह कक्षा योजन और ग्रह बिम्ब योजन भी ज्ञात होता है । ग्रहों
के.शर के से पृथ्वी स्थिरता का भी अनुमान होता है ।
भचक्रालोकतो लोक स्रष्टु लोको त्तराकृतिः
प्रतीयतेऽन्धतमसं ततोऽव तमसो भवेत् । २०५ ।
भचक्र से सृष्टि कर्ता का असाधारण कार्य का अनुमान होता है । उससे
अन्धकार का गाढा पन कुछ कम हो जाता है । (भचक्र का भी कुछ प्रकाश होता
है ।)
पथिकानां मतिमतां प्रथमं याति दिग् भ्रमः
इत्यादयो बहुविध उपकारा भवन्त्यतः । २०६ ।
भचक्र में नक्षत्र स्थिति से पथिकों (विशेषतः नाविकों) का दिग् भ्रम नहीं
होता है । इस प्रकार भचक्र से अनेक उपकार होते हैं ।
तपोवर्षा ततः शीतं कालस्येति गुणास्त्रयः
ततद्वैविध्यतो लोके षड् भवन्त्यृतवः खलु । २०७ ।
ग्रीष्म, वर्षा और शीत-काल के ये तीन प्रधान गुण है । प्रत्येक के दो दो
भेद होने से ६ ऋतुएं होती हैं ।
प्रायशो भारते वर्षे तेषां सम्पूर्ण भुक्तयः
भवन्ति भूमि भेदभ्य उत्कटाः केऽप्यनुत्कटाः । २०८ ।
भारत वर्ष में सभी ६ ऋतुओं का भोग प्रायः पूर्ण मात्रा में होता है । भूमि
(स्थान) भेद से इन ऋतुओं का फल कहीं अति उत्कट कहीं अति कम होता है ।
तपस्य प्राग् दलं सौख्याद् वसन्तो ह्य परं दलम्
ग्रीष्म स्यादथ वर्षाणां तत् प्रावृट् शरद्दौमते । २०९ ।
ग्रीष्म का प्रथमार्द्ध वसन्त सुखकर होता है । द्वितीयार्द्ध गर्म होता है । वर्षा
काल का प्रथमार्द्ध वर्षा तथा शेषार्द्ध शरत् होता है ।
हेमन्तः शिशिरः शीत प्राक् पश्चिम दले इति ।
सूर्य क्रान्ति वशात्तेस्य देश भेदात् पृथग् विधाः । २१० ।
शीत का पूर्वार्द्ध हेमन्त, परार्द्ध शिशिर । देश भेद (अक्षांश) तथा सूर्य क्रान्ति
३९० सिद्धान्त दर्पण
' भेद से अलग अलग ऋतुयें होती हैं ।
तिरश्चिनाः करायत्र पतन्त्यर्कस्य भूतले
नाप्नोति तत्तथा तापं तत्र शीतं बलोत्तरम् । २११ ।
पृथ्वी के ऊपर सूर्य किरण तिरछे पड़ने से उष्णता अधिक नहीं होने के कारण
शीत बढ़ता जाता है ।
पतन्त्यृजुतया यत्र तत्र तापातिरेकतः
तत्रत्यानां तपर्तुः स्याद्रवि सम्मुख वृत्ति जात् । २१२ ।
जहां पर सूर्य किरण सरल (लम्ब रूप) पड़े वहां ताप अधिक होने के कारण
ग्रीष्म ऋतु होती है ।
तीक्ष्णैः सूर्याशुभि सिन्धो र्लघुतोयं समुत्थितम्
पतत्याकर्षणाद् भूमौ तत्तपान्ते घनागमः । २१३ ।
ग्रीष्म में सूर्य की सीधी किरण समुद्र में पड़ने से उसका पानी गर्म होने से
बाष्प बनकर ऊपर उठता है । पुनः भूमि के आकर्षण से ऊपर ठण्डा होकर
आकाश से पृथ्वी पर पड़ता है । अतः ग्रीष्म समाप्त होने पर वर्षा का आरम्भ
होता है ।
निरक्ष देशतोंऽशाना मक्षाणां यावदष्टकम्
हेमन्त शिशिरौ नस्तो ग्रीष्म वर्षातिरेकतः । २१४ ।
निरक्षदेश से आठ अंश तक (भारत में कुमारी अन्तरीप का निकटवर्ती स्थान
अत्यन्त गर्म होने के कारण वहां हेमन्त और शिशिर नहीं होता तथा ग्रीष्म और
वर्षा अधिक होती है ।
प्रावृडन्ते शरत्कालस्त पादो स्यात् वसन्तकः
एतयोरन्तरे किंचित् शीतं देशे जलाधिके । २१५ ।
वर्षा समाप्त होने पर शरत् काल होता है । ग्रीष्म के आरम्भ में वसन्त होता
है । शरत् और वसन्त के बीच में अधिक जल (वर्षा) वाले स्थान में सामान्य
शीत होता है ।
पौष माघ द्वयं शीतं द्वितीयेऽक्ष लवाष्टके
दशस्वेन्येषु मासेषु वसन्तादि चतुष्टयम् । २१६ ।
अक्षांश ८ से १६ तक पौष और माघ दो मास शीत होता है तथा बाकी दस
मास में वसन्त आदि चार ऋतुयें ही होती है ।
तृतीयेऽंशाष्टके शीतं स्यान्मार्गादि चतुष्टयम्
चैत्राद्येषु वसन्ताद्या श्चात्तारोऽत्रैवषट् समाः । २१७ ।
अक्षांश १६ से २४ के बीच में स्थित भारत में मार्गशीर्ष से आरम्भकर चार
वासना शेष रहस्य वर्णन ३९१
मास तक शीत होता है तथा चैत्र आदि आठ मासों में वसन्त आदि चार ऋतुयें
होती हैं ।
चतुर्विं शति रंशानांमियं स्यादुष्णमण्डलम्
इतः षोड़ शकं प्रोक्तं सममण्डल नामकम् । २१८ ।
२४ अंश अक्षांश तक उष्ण मण्डल होता है । २४ अंश के स्थान में सभी ६
ऋतुएं २-२ मास की होती हैं । २४ से ४० अक्षांश तक का स्थान सममण्डल
कहा जाता है ।
चतुर्थेऽष्टाष्ट के व्यक्षाद् भार्द्ध मुर्जादि शीतलम्
माधवा द्युष्णमत्रैव वसन्तादि चतुष्टयम् । २१९ ।
२४ से ३२ अक्षांश तक कार्तिक आदि ६ मास तक शीत होता है । वहां
वैशाख आदि ६ मास उष्ण होता है तथा उसीमे वसन्त आदि ऋतुयें होती हैं ।
उषाद्यं शीतलं प्रोक्तम् पञ्चमेऽष्टाष्टकेऽष्टकम्
वसन्तादि चतुष्टं स्यात्तत्र ज्येष्ठ चतुष्टये । २२० ।
अक्षांश ३२ से ४० के बीच के स्थानों में आश्विन आदि ८ मास शीत होता
है। ज्येष्ठ आदि ४ मासों में वसन्त आदि ४ ऋतुएं होती हैं ।
इतः केन्द्रातमक्षांशाः पञ्चाशच्छीतमण्डलम्
निरक्षादष्ट के षष्ठे भागानां भाद्रतो दश । २२१ ।
अक्षांश ४० से ५० तक शीतमण्डल होता है । अक्षांश ४० से ४८ तक भाद्र
से दस -
मासाः शीताः शुचिद्वन्द्वे वसन्ताद्भूतवोऽल्पकाः ।
इत्युक्तः षड् ऋतु स्थान मष्टा म्भो धि (४८) लवावधि । २२२ ।
मास तक शीत होता है तथा आषाढ़ और श्रावण मासों में बहुत कम समय
के लिए वसन्त आदि ऋतु होती हैं । इस प्रकार निरक्ष से ८-८ अंश उत्तर अक्षांश
के ६ ऋतुस्थानों का वर्णन हुआ ।
आसु मेरु ततो द्वयब्धि (४२) भागस्थं केवलं हिमम्
एवं देवे सुरांशे तु तुल्याद्याः स्युरजादिवत् । २२३ ।
अक्षांश ४८ से मेरु तक ४२° अक्षांश क्षेत्र बर्फ से ढंका रहता है । इस प्रकार
उत्तरार्द्ध की ऋतुयें हुईं । दक्षिण गोलार्द्ध में तुला आदि ६ राशियों में उत्तर
गोलार्द्ध के मेष आदि ६ राशियों के सूर्य के समान ऋतु होती हैं ।
अत्र राधादयोमासा संस्कृतस्यायनांशकैः ।
भानेर्मेष प्रवेशादेः स्वीकार्य ऋतु भुक्तये । २२४ ।
सायन रवि के मेष प्रवेश से वैशाख आदि १२ मास ऋतु भाग के लिये ग्रहण
..."?
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ह
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द (1), ह (2), त्य (3), दा (4), व (5), म् (6).
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There is:
दहत्यथदावम्
Wait, let's look atथ:
Is that aथ?
Wait, is itदहत्यदोषम्? No.
Wait, let's look at:
Could it beदहत्यथ दावम्?
Let's look at:द(da)ह(ha)त्य(tya)थ(tha)दा(dā)व(va)म्(m).
Wait, look at:द ह त्य- wait, where wouldहbe?
Wait,
वासना शेष रहस्य वर्णन ३९३
सूर्योष्मणाति लघवः परमाणवोऽपा
मूर्ध्वं व्रजन्ति गुरवोलवणस्यतेन
तेनाभिवृष्टि सलिलं मधुरं महाब्धेः सिद्धं
पुनः कुतुकतो गणितं ब्रुतेऽल्पम् । २३१ ।
महासागर में लवण जल है । सूर्य ताप से जल के अत्यन्त छोटे अणु ऊपर
ऊठ जाते हैं पर लवण के अणु नहीं उठते । अतः वर्षा का पानी मीठा होता है ।
अब मनोरञ्जन के लिए कुछ पाटीगणित कहता हूँ ।
घनः समांक त्रिनयस्य घातस्तदीय मूलानयनाय सूत्रम् ।
पश्चांकं पंक्ते श्चर ये निधाय विन्दुं ततो वाम गते चतुर्थे । २३२ ।
तीन समान अंकों के गुणनफल को घन कहा जाता है । इस घनांक का मूल
निकालने के लिए यह सूत्र कहा जा रहा है । घन संख्या के दाहिने अन्तिम अंक
पर विन्दु देकर उससे बायीं तरफ चतुर्थ अंक पर-
तत्तचतुर्थे क्रमतश्चदत्वा सविन्दु शिष्टं कितएव यस्य
यातुं घनो युज्यत एतमकं लब्धं न्यसेत्तद् घन वर्जितायः । २३३ ।
बिन्दु देकर बायीं तरफ प्रति चतुर्थ अंक पर उसी प्रकार विन्दु देते जायं ।
बायीं छोर से दाहिनी तरफ बिन्दु वाले अंक तक जो संख्या होगी, उससे जितनी
अधिक संख्या का घन घट सकता है, घटाते हैं । जिस संख्या का घन घटा उसे
लब्धि के रूप में रखते हैं ।
पंक्ते स्थिरात्मत्रिविधांक हानि जाताद्वितीयादिक लब्ध सिद्धयै ।
तस्यास्तलेन्यस्य पृथक् स्थिताया लब्धांक वर्गं त्रिशतघ्नमेकम् । २३४ ।
दूसरी लब्धि संख्या निकालने के लिये पहले लब्धांक को वर्गकर ३०० से
गुणा करके अलग स्थान में रखते हैं ।
वामाद् द्वितीयादिसविन्दुकांक स्याधोऽन्य शून्यस्य यथा स्थितः स्यात्
तेनैव तस्या हरणे प्रवृत्ते नवाधिकं चेत्पततीह लब्धम् । २३५ ।
उससे भाज्य में बायें से दूसरे बिंदु के नीचे के अंक तक जो शेष बचा उसमें
भाग देते हैं । फल दूसरी लब्धि के रूप में रखते है ।
नवैव कृत्वा तदनेन हारं हत्वा पृथक् पंक्ति तले निधाय
कृतिं द्वितीयादि फलस्य पूर्वं लब्धैर्हतां ख्राग्नि (३०) गुणांततोऽधः । २२६ ।
यदि लब्धि ९ से अधिक होती है । तो उसे ९ ही लेते हैं ( लब्धि के रूप
में) (१) द्वितीय लब्धि से भाजक को गुणा कर उसके नीचे (२) द्वितीय लब्धि
का वर्ग से पूर्व लब्धांक को गुणा कर ३० से गुणा कर प्राप्त संख्या को रखें ।
घन द्वितीयादि फलस्य चैवं त्रिधांक योगं विजहातु पंक्तेः
साल्पायदि त्र्यंकं युतेः द्वितीय चेकैक हीनं क्रमशॊऽ त्रलब्धम् । २३७ ।
३९४ सिद्धान्त दर्पण
उसके नीचे (३) दूसरी लब्धि का घन-इन तीन संख्याओं के योग को भाज्य
से घटाने पर यदि बहुत कम शेष आता है । तो दूसरी लब्धि को एक कम कर
पुनः इसी प्रकार एक के नीचे एक तीन संख्यायें लिखते हैं ।
कृत्वा विधाय त्रिविधांक योगं स्थिरं विशुद्ध्यान्त मथांक पंक्तेः
तेनोज्झिताया पुनरन्य लब्धाः न्येवं फलां का घनमूल संज्ञा । २३८ ।
इस प्रकार तीन संख्यायें स्थिर होने पर उनका योग भाज्य से घटाते हैं और
शेष में अगले बिन्दु तक के अंक मिलाते हैं । अबतक के दो लब्धि अंको को
पहली लब्धि मानकर अगला लब्धि अंक पहले की तरह प्राप्त करते हैं और तीन
संख्याओं का योग घटाकर तब तक क्रिया करते हैं । जबकि अन्तिम बिन्दु तक
भाज्य के अंक समाप्त न हों । यही लब्धि घनमूल होता है ।
पतन्ति पंक्त्युर्ध्व रविन्दु तुल्या स्तेषां घनः पूर्ववदंक पंक्तिः ।
सा चेत्सहस्राल्पतयास्थिता स्यात् सकृद् भवेत्तद् घनमूलमेकम् । २३९ ।
घन अंक संख्या के ऊपर जितने बिन्दु होते हैं । घनमूल में उतने ही अंक
होते हैं । घन १००० से कम होने से उसका एक ही अंक का घनमूल होता है
तथा एक ही बार में निकलता है, बिना अन्य क्रियाओं के ।
भास्करपोष्यां घनकरण सूत्र वृत्तम्--
समत्रिघातश्च घनः प्रदिष्टः स्थाप्योधनोऽन्तस्य ततोऽन्त्यवर्गः
आदि त्रिनिघ्नस्तत आदि वर्गस्त्वन्त्या हताश्वादि घनश्च सर्वे । २४० ।
तीन समान अंक (संख्या) के गुणनफल को उस संख्या का घन कहा जाता
है । संख्या को रखकर उसके अन्तिम अंक के घन को रखेंगे । शेष अंक के वर्ग
को आदि अंक और तीन द्वारा गुणा कर और तब आदि संख्या के वर्ग को अन्त्यं
अंक और तब आदि अंक के घन को
स्थानान्तरत्वेन युतः घनः स्यात्प्रकल्प्यतत् खण्डयुगं ततोऽन्त्यम् ।
एवं मुहुर्वर्ग घन प्रसिद्धा वाद्यंकतो वा विधिरेष कार्यः । २४१ ।
एक-एक स्थान हटाकार रखेंगे । अन्त में सबको जोड़ देने पर पूरी संख्या
का घन आ जायेगा ।
संख्या को दो खण्डों में बांट कर भी अन्तिम खण्ड से इस प्रकार कार्य कर
बाकी खण्ड से भी कार्य करेंगे । इससे पूरी संख्या का घन आ जायेगा ।
खण्डाभ्यतां हतो राशिस्त्रिघ्नः खण्डघनै क्य युक्
वर्गमूल घनः स्वघ्नी वर्ग राशि घनोभवेत् । २४२ ।
संख्या के दो खण्डों को आपस में गुणा कर ३ से गुणा कर उससे संख्या
को गुणा करेंगे । उसके दाहिने अन्तिम संख्या का घन तथा बायें आदि संख्या
का घन जोड़ने से पूरी संख्या का घन आ जायेगा । किसी वर्ग संख्या का घन
वासना शेष रहस्य वर्णन ३९५
निकालने के लिए वर्गमूल का घन निकालेंगे। और घन का वर्ग निकालेंगे।
घनमूले करण सूत्रं वृत्तद्वयम् --
आद्यं घनस्थान मथाघने द्वेपुन स्थान्त्याद् घनतो विशोध्य
घनं पृथक् स्थं पदमस्य कृत्या त्रिघ्ना दातव्यं विजभेत् फलंतु । २४३ ।
घन संख्या को लिखकर दाहिने तरफ के अन्तिम अंक पर घन चिह्न दें।
उससे बायीं तरफ के दो अंकों पर अघन चिह्न दें। इसके बाद फिर एक अंक पर
घन और उससे बायें दो अंको पर अघन चिह्न दें। पूरी संख्या में घन अघन चिह्न
देने पर अन्तिम (बायें तरफ) घन संख्या से जिस अंक का घन घट सकता है
उस अंक को अलग लिखेंगे। और घन को घटायेंगे। इसके अंक के वर्ग को ३
से गुणा कर फल से प्रथम भाज्यशेष और उसके बाद के प्रथम अघन अंक से
भाग देंगे।
पंक्त्या न्यसेतत् कृतिमन्त्य निघ्नीं त्रिघ्नों त्यजेत्तत्प्रथमात् फलस्य
घनं तदाद्यात् घनमूलमेवं पंक्तिर्भवेदेव मतः पुनश्च । २४४ ।
फल को प्रथम घनमूल अंक के बाद रखेंगे। फल के वर्ग को पंक्ति में स्थित
बाकीअंक से गुणा कर और उसको तीन से गुणा कर भाज्य राशि से घटायेंगे।
पुनः जो शेष बचा उससे इस फल के घन को घटायेंगे। इस प्रकार बारबार करने
पर उक्त घन संख्या का घन मूल निकलेगा।
मूलावशेषात् कथयामसिद्धि षष्ट्यंशकानां पदशेष भाजाम्
पदं घनीकृत्य पदोत्तरांक घनाद्विजह्याद्य इहावशेषः । २४५ ।
सावयव संख्या का घनमूल निकालने के लिए प्रथम अवयव का जितना
मूल होता है, उतने का घन घटाने के बाद शेष को घनकर उसके बाद के अंक
के घन से घटायेंगे। फल शेष हार होगा।
स चान्त्यहारो यदि मूल संख्या त्रिंशद् बहुत्वत्र पदावशेषः
षष्ट्याहतोऽन्वेन हरेण भक्तः फलं कलास्तत्पद मल्पकं चेत् । २४६ ।
मूलसंख्या ३० से अधिक होने पर मूल शेष को ६० से गुणा कर अन्त्यहार
से भाग देने पर कला (१/६० वें भाग) में फल आयेगा। मूल संख्या ३० से कम
होने पर
व्योमोऽनलेभ्य (३०) स्तदिहान्त्यहारोन्मूलावशेषं विरहस्य शेषः
गुण्योऽन्त्य हारान्तु सरूपमूल भक्तात् फैलं स्याद् गुणकाभिधानम् । २४७ ।
अन्त्यहार से मूल अवशेष को घटा कर उसको गुण्य नाम देंगे। अन्त्यहार
को मूल में एक जोड़ कर भाग देने से जो लब्धि होगी उसको गुणक कहेंगे।
तत् क्षुण गुणे ध्योऽन्यहरेण भक्तः फलोञ्झितो ऽन्यस्फुट हार उक्तः ।
मूलावशेषो वियदंग (६०) निघ्नो लिप्तामयः स्यात् स्फुटहार भक्तः । २४८ ।
३९६ सिद्धान्त दर्पण
गुण्य और गुणक को गुणा उसको अन्त्य हार से भाग देंगे । फल को पुनः
अन्त्यहार से घटाने से वह अन्त्य स्फुट हार होगा । मूल अवशेष को ६० से गुणा
कर इस स्फुट हार से हरने पर यह लिप्ता होगा ।
पुरोदितं वर्गपदं मयात्र बहूपयोगोद्धन मूल मुक्तम्
दिग् दर्शिता साधन वासनाया गोलज्ञ गम्यानुदिता खिलायत । २४९ ।
वर्गमूल निकालने की विधि में पहले कह चुका हूँ। गणित में अति आवश्यक
होने के कारण घनमूल के बारे में भी मैने कहा । गणित साधन विधि सामान्य
प्रकार से कही गयी है । बाकी विधियां गोलज्ञ गणक स्वयं जान सकते हैं
सिद्धान्तशिरोमणौ-इषदोषदिह मध्य गमादौ ग्रन्थ गौरवभयेन मयोक्ता
वासनामति मतासक्त लोह्या गोल बोध इदमेद फलंहि । इति । २५० ।
सिद्धान्त शिरोमणि में लिखा है- ग्रन्थ बढ़ने के भय से मैं पहले थोड़ा थोड़ा
तर्क देकर आगे बढ़ जाता हूँ । बुद्धिमान् उसी से बाकीयुक्ति भी समझ लेंगे ।
गोल ज्ञान होने से ही यह फल होता है ।
हृत्प्राणेन्द्रिय रोध शोधित समक्रोध स्मरादिद्विषः
पञ्चक्लेश मुचोन यत्क्षणमपि द्रष्टुंक्षमा योगिनः
तद्यः स्वं परमं पदं स्वचरण प्रेमाध्व पान्थैर्जनैः
सु प्रापं विद धाति नः स भगवानव्याद् भव व्यापदः । २५१ ।
मन, प्राण और इन्द्रियों पर नियन्त्रण के लिये योगी गण मोह, क्रोध तथा
काम आदि शत्रुओं को जीतते हैं । इससे वे पांच क्लेशों विद्या, अस्मिता, अनुराग,
द्वेष और अभि निवेश से मुक्त हो जाते है । इसके बाद भी योगी गण उस परमपद
को एक क्षण के लिये भी नहीं देख पाते । (अधिक समय के लिए देखना दूर की
बात है ) उसी परम पद को जो अपने पाद सेवकों को सहज दिला देते हैं । वे
महाप्रभु श्री जगन्नाथ हमें विपद् से मुक्त करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ, गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
सद् वासनोऽतिनख (२१) संख्यः इतः प्रकाशः । २५२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना और दृष्टि में समानता तथा बालकों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त
दर्पण में सद् वासना (तर्क युक्त व्याख्या) सहित २१ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।