सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३८१
प्रतिवृत्त जिस स्थान पर पृथ्वि से सबसे दूर हो उस स्थान को ही उच्च नाम
दिया गया है। यह स्थान भी गति शील होने के कारण विज्ञानियों ने उच्च गति
की कल्पना की है।
उच्चात् भषट् कान्तर तच्च नीचं मध्यः स्वनीचोच्च समोयदा स्यात्
कक्षास्थ मध्योपर कर्ण सूत्र पातात् स्फुटो मध्य समस्तदानीम् । १५० ।
उच्च से ६ राशि दूरी पर (प्रति वृत्त का जो स्थान पृथ्वी के सबसे निकट हो)
उसे नीच स्थान कहा गया है। मध्य ग्रह उच्च सहित या नीच सहित समान होते
पर कर्ण सूत्र (भूकेन्द्र से स्पष्ट ग्रह की रेखा) कक्षा वृत्त में मध्य ग्रह के स्थान से
होकर जाता है। अतः भुजफल का अभाव होता है, और मध्यग्रह तथा स्पष्ट ग्रह
समान होता है।
उच्चस्थितो व्योम चरः सुदूरे नी चस्थितः स्यान्निकटेधरिञ्य
अतोऽणुबिम्बः पृथुलश्च भाति भानोस्तथासन्नसुदूरवर्ती । इति । १५१ ।
ग्रह उच्च स्थान में पृथ्वि से सबसे दूर नीच स्थान पर सबसे निकट होता
है। अतः उच्च और नीच का ग्रह क्रमशः बड़ा और छोटा दीखता है। (उद्धरण
समाप्त) ।
छाया लोकाद् यन्त्र वेधो दयनात्तद्वयं रवेः
सप्ताब्धयं (४७) शान्तरं दृष्टं तत्सिद्धां (२४) शाल्यकोपमः । १५२ ।
शंकु और उसकी छाया, यन्त्रवेध तथा आयन आदि विचार द्वारा मैंने देखा
है कि सूर्य की दोनों क्रान्ति (उत्तर तथा दक्षिण) ४७° अंश के भीतर ही है। अतः
मैंने प्राचीन शास्त्र मत के प्रति क्रान्ति के २४° से कम २३° ३०' (दोनों क्रान्ति
४७°) माना है।
चन्द्र ग्रहस्य गणितं सवासन मुदाहृतम्
लम्बनस्योपपत्तिश्च तस्याल्प बहुतोच्यते । १५३ ।
चन्द्र ग्रहण का गणित सभी युक्ति के साथ कहा गया है। इस समय लम्बन
की उपपत्ति उसके कम और अधिक होने के विषय में कहता हूँ।
चक्रार्द्धान्तरितौ तुल्य भागलिप्ताविलिप्तकौ
स्यातां यदर्क शशिनौ शराल्पत्वे यदा विधौ । १५४ ।
जिस समय रवि और चन्द्र दोनों ६ राशि की दूरी पर रहते हैं, तथा उनका
अंश कला और विकला समान होते हैं, उस समय मानैक्यार्द्ध (बिम्ब व्यासों के
योग का आधा) से चन्द्र का शर कम होने से -
भूछाया लगतीत्यत्र समकक्ष स्थिते स्तयो
लम्बना वनती न स्तो रजनीरमण ग्रहे । १५५ ।