सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३८३
यदादृक् क्षेप वृत्तस्यः खेचरोऽवनति स्तदा
परमाल्म्बनाभावस्ततो दृक् क्रान्तिवृत्तयोः । १६२ ।
ग्रह दृक् क्षेप वृत्त में रहने से नति होती है । किन्तु परम लम्बन नहीं होता
(अधिकतम मान से कुछ कम होता है) अतः दृङ् मण्डल और क्रान्तिवृत्त में
नत्यन्तजान्तर कलाधिक्या लम्बन संक्षयः
क्रान्तिदृग् वृत्त संयोगात् सार्द्धगस्य न तद् युगम् । १६३ ।
अन्तर के कारण या रवि चन्द्र इन दोनों की उत्तर और दक्षिण क्रान्ति में अन्तर
के कारण दोनों की पूर्व पश्चिम अन्तर कला भी बढ़ जाती है ।
खमध्य में दोनों (क्रान्ति वृत्त और दृङ्मण्डल) एक होने के कारण नत या
लम्बन नहीं होता ।
त्रिभोन लग्न जा द्यस्मात् क्रान्ति वृत्ताद् गतः शरः
प्राप्नोति नभसि मध्यं मध्याह्ने, तु शराग्रतः । १६४ ।
त्रिभोन लग्न का शर क्रान्ति वृत्त से खस्वस्तिक तक जाता है । मध्याह्न में
पुनः शराग्र पर-
याम्योदिग् लम्बित श्चन्द्रो दर्शान्तेऽर्क समो न यत्
लम्बनेऽवनतौ तस्मात् ग्राह्यो लग्नस्त्रि भोनितः । १६५ ।
लम्बित चन्द्र अमान्त में रवि के समान दृक् सूत्र में नहीं रह पाता है । अतः
लम्बन नति साधन करते समय वित्रिभ लग्न की कल्पना की जाती है ।
त स खार्द्धे नतज्या या सा प्राक् पश्चिम संस्थितेः
वक्रत्वात् सम्भवेद् बहो तत् सिद्धा वुदयज्यका । १६६ ।
वित्रिभ की याम्योत्तर वृत्त में जो नतज्या (दृग्ज्या) होती है, वह वित्रिभ के
पूर्व पश्चिम अन्तर में वक्र होने के कारण अधिक होती है । विभिन्न लग्न का नतांश
उक्ता यद् वित्रिभ तनु क्रान्ति वृत्तं यथा यथा
वक्रं तथा तथा लग्न क्रान्तिज्या महती भवेत् । १६७ ।
वित्रिभ दृङ्मण्डल में अर्थात् दृक् क्षेप वृत्त में ही होता है । यह दृक् क्षेपवृत्त
कदम्ब प्रोत वृत्त होने के कारण क्रान्ति वृत्त पर सदा लम्ब होता है । उसकी क्रान्ति
ज्या के अनुपात में ही विभिन्न लग्न की नतज्या भी बढ़ जाती है ।
यदा वित्रिभ लग्नस्य क्रान्तिः सौभ्याक्ष तुल्यताम्
प्रयाति विषु व क्रान्ति रुदेति च यदा तदा । १६८ ।
विभिन्न लग्न की उत्तर क्रान्ति जिस देश के अक्षांश के समान होती है, उस
देश में सायन मेषादि जिस समय उदय होता है, उस समय