सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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समता सम्भवेन्मध्य लग्न वित्रिभ लग्नयोः
नान्यदा तत्तयोः स्यातां येनत ज्ये तदन्तरा । १६९ ।
मध्य लग्न तथा वित्रिभ लग्न समान होता है । अन्य स्थानों पर ऐसा नहीं
होता । वहां पर मध्य लग्न और वित्रिभ लग्न के अन्तर की नतज्या-
शरवद् भाति दृक् क्षेपो दृग् ज्या सा वित्रिभांगजा
विक्षेपाग्र स्थित स्येन्दो भवेद वनतिः स्फुटा । १७० ।
उन दोनों के नीच वित्रिभज्या के शर के समान मानी जाती है । शर के अग्र
में स्थित चन्द्र की इस स्थिति में स्फुट अवनति होती है ।
तत् शरेणाक्ष संस्कारे कृते तस्मात् शराक्षतः
क्रान्ति संस्कार संसिद्धोदृक् क्षेपः स्यात् परिस्फुटः । १७१ ।
अतः शर में अक्ष संस्कार करने के बाद उसको पुनः वित्रिभ क्रान्ति द्वारा
संस्कृत करने से दृक् क्षेप परिस्फुट होता है ।
पर्वान्तो यः समदितः स्फुटां लम्बन संस्कृतः
अर्केन्द्वोः क्रान्ति वृत्तोदक् याम्य स्थितैस केवलम् । १७२ ।
लम्बन संस्कृत जो स्फुट पर्वान्त कहा गया, वह पृथ्वी की सतह से रवि और
चन्द्र एक कदम्ब प्रोत वृत्त में उत्तर दक्षिण स्थित रहने पर ही होता है ।
त्रिभोन लग्नज क्रान्ति गति र्बंहो यथा यथा
शरानुसारतो ग्रास काल भेदस्तथा तथा । १७३ ।
त्रिभोन लग्न की क्रान्ति गति जैसे जैसे बढ़ेगी शर गति के कारण ग्रास और
स्पर्श आदि काल का अन्तर भी उसी प्रकार बढेगा ।
उक्ता ग्राहक मार्गस्य छेद के या दृशो स्थितिः
तत्क्रमाञ्चालिते तस्मिन् ग्रासकाले भवेत्स्फुटः । १७४ ।
ग्रहण परिलेख में ग्राहक मार्ग से छेदक की जिस प्रकार स्थिति बतायी जाती
है, उसी क्रम से ग्राहक मार्ग से चलाने से ग्रहण समय स्पष्ट हो जायेगा ।
विषुवोदय काले चेत् पर्वलम्बन संस्कृतम्
तदा मध्य ग्रहस्तुल्योऽन्यथान्यूनोऽधिको भवेत् । १७५ ।
सायन मेषादि के उदय समय में यदि स्फुट अमान्त पड़े तब पहले निकाला
गया मध्य ग्रहण काल ही समान होगा अर्थात् उसमें कुछ जोड़ने या घटाने की
आवश्यकता नहीं होगी ।
एवं तदुदये स्पर्श मोक्ष कालस्य तुल्यता
उदय ज्योद् भवः काल भेदः स्यादिक् शर क्रमात् । १७६ ।
इसका कारण उस समय लग्न क्रान्ति का अभाव है । अन्य समय में अमान्त