सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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ग्राहक के विपरीत दिशा में ग्राह्य शर होने के कारण ग्रास और शर की दिशा
अलग होती है । (चन्द्र ग्रहण में)
ग्राहकस्यैव चन्द्रस्य स्फुटेष्युर्यत् स्वदिग् गतः
तद् ग्रास बाणयोः सिद्धं दिक् साम्यं सूर्य पर्वणि । १८४ ।
सूर्य ग्रहण में ग्राहक चन्द्र का शर ग्राहक दिशा में रहता है । अतः ग्रास
और शर एक ही राशि में होते हैं ।
चन्द्रस्यैव यतः सिद्धं वलनं ग्रहण द्वये
तस्माद्ग्राह्यस्य चन्द्रस्य स्पर्शे तत् स्यात् स्वदिग् गतम् । १८५ ।
दोनों ग्रहणों में चन्द्र का ही वलन होता है । अतः चन्द्र ग्रहण में चन्द्र के
स्पर्श के समय स्पष्ट वलन को पूर्व दिशा के चिह्न से अपनी दिशा में
व्यस्त दिङ् मोक्ष काले स्याद् ग्राहकस्य रवि ग्रहे
मोक्ष कालं निजाशास्थं स्पर्शे तद् विपरीत गम् । १८६ ।
तथा मोक्ष काल में पश्चिम चिह्न से विपरीत दिशा में देंगे । सूर्य ग्रहण में
पूर्व दिशा में मोक्ष होने के कारण मोक्ष समय में पूर्व चिह्न से अपनी दिशा में
स्पष्ट वलन दिया जायेगा । तथा स्पर्श समय में पश्चिम चिह्न से उल्टी दिशा में
दिया जायेगा ।
उदयेऽस्तमये देशेऽव्यक्षे प्रायिक दिङ्मुखम्
बिम्बं स्यादन्यदेशेऽस्मा दक्षजं वलनं भवेत् । १८७ ।
निरक्ष प्रदेश (विषुववृत्त स्थान) में उदय, अस्त और मध्याह्न समय में ग्रह
बिम्ब अपने वास्तविक दिशा में ही होता है । अन्य स्थानों में अक्ष वलन होता
है ।
ध्रुवा भिमुख विश्रान्ते स्तदुन्नत्यनुसारतः
प्राक् चिह्नं बिम्बगं खार्द्धे यत्तत् पूर्व कपाल के । १८८ ।
ग्रह बिम्ब ध्रुव की दिशा में भ्रमण करने के कारण ध्रुव की उन्नति (अर्थात्
अक्षांश) के अनुसार आकाश के मध्य स्थल में बिम्ब का पूर्व चिह्न पूर्व कपाल
में रहता है ।
भवेदुदन्मुखं प्रत्यक् कपाले दक्षिणामुखम्
तद् भेदादायनं दृश्यं वलनञ्च पृथग् विधम् । १८९ ।
और उत्तर की तरफ झुकता है । पश्चिम कपाल में यह दक्षिण की तरफ झुकता
है । आक्ष वलन के कारण बिम्ब की दिशा में अन्तर दीखने के कारण दृक् सिद्ध
आयन वलन भिन्न प्रकार का होता है ।