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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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३९६ सिद्धान्त दर्पण
गुण्य और गुणक को गुणा उसको अन्त्य हार से भाग देंगे । फल को पुनः
अन्त्यहार से घटाने से वह अन्त्य स्फुट हार होगा । मूल अवशेष को ६० से गुणा
कर इस स्फुट हार से हरने पर यह लिप्ता होगा ।
पुरोदितं वर्गपदं मयात्र बहूपयोगोद्धन मूल मुक्तम्
दिग् दर्शिता साधन वासनाया गोलज्ञ गम्यानुदिता खिलायत । २४९ ।
वर्गमूल निकालने की विधि में पहले कह चुका हूँ। गणित में अति आवश्यक
होने के कारण घनमूल के बारे में भी मैने कहा । गणित साधन विधि सामान्य
प्रकार से कही गयी है । बाकी विधियां गोलज्ञ गणक स्वयं जान सकते हैं
सिद्धान्तशिरोमणौ-इषदोषदिह मध्य गमादौ ग्रन्थ गौरवभयेन मयोक्ता
वासनामति मतासक्त लोह्या गोल बोध इदमेद फलंहि । इति । २५० ।
सिद्धान्त शिरोमणि में लिखा है- ग्रन्थ बढ़ने के भय से मैं पहले थोड़ा थोड़ा
तर्क देकर आगे बढ़ जाता हूँ । बुद्धिमान् उसी से बाकीयुक्ति भी समझ लेंगे ।
गोल ज्ञान होने से ही यह फल होता है ।
हृत्प्राणेन्द्रिय रोध शोधित समक्रोध स्मरादिद्विषः
पञ्चक्लेश मुचोन यत्क्षणमपि द्रष्टुंक्षमा योगिनः
तद्यः स्वं परमं पदं स्वचरण प्रेमाध्व पान्थैर्जनैः
सु प्रापं विद धाति नः स भगवानव्याद् भव व्यापदः । २५१ ।
मन, प्राण और इन्द्रियों पर नियन्त्रण के लिये योगी गण मोह, क्रोध तथा
काम आदि शत्रुओं को जीतते हैं । इससे वे पांच क्लेशों विद्या, अस्मिता, अनुराग,
द्वेष और अभि निवेश से मुक्त हो जाते है । इसके बाद भी योगी गण उस परमपद
को एक क्षण के लिये भी नहीं देख पाते । (अधिक समय के लिए देखना दूर की
बात है ) उसी परम पद को जो अपने पाद सेवकों को सहज दिला देते हैं । वे
महाप्रभु श्री जगन्नाथ हमें विपद् से मुक्त करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ, गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
सद् वासनोऽतिनख (२१) संख्यः इतः प्रकाशः । २५२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना और दृष्टि में समानता तथा बालकों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त
दर्पण में सद् वासना (तर्क युक्त व्याख्या) सहित २१ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।