सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३८९
विविधग्रह भुक्तीनां साक्षात्कारात् शरीरिणाम्
शुभाशुभानिकर्माणि ज्ञायन्ते प्राक् कृतान्यपि । २०३ ।
विविध ग्रहों की अनेक प्रकार की गति देख कर शरीरधारियों के पूर्व जन्म
में किये हुए शुभ अशुभ कर्मों का ज्ञान होता है ।
तथा तद् बिम्बमानानां कक्षाणां योजनानि च ।
तत्तद् विक्षेपतो भूमेः स्थिरत्वं चानुमानतः । २०४ ।
(ग्रहगति से) ग्रह कक्षा योजन और ग्रह बिम्ब योजन भी ज्ञात होता है । ग्रहों
के.शर के से पृथ्वी स्थिरता का भी अनुमान होता है ।
भचक्रालोकतो लोक स्रष्टु लोको त्तराकृतिः
प्रतीयतेऽन्धतमसं ततोऽव तमसो भवेत् । २०५ ।
भचक्र से सृष्टि कर्ता का असाधारण कार्य का अनुमान होता है । उससे
अन्धकार का गाढा पन कुछ कम हो जाता है । (भचक्र का भी कुछ प्रकाश होता
है ।)
पथिकानां मतिमतां प्रथमं याति दिग् भ्रमः
इत्यादयो बहुविध उपकारा भवन्त्यतः । २०६ ।
भचक्र में नक्षत्र स्थिति से पथिकों (विशेषतः नाविकों) का दिग् भ्रम नहीं
होता है । इस प्रकार भचक्र से अनेक उपकार होते हैं ।
तपोवर्षा ततः शीतं कालस्येति गुणास्त्रयः
ततद्वैविध्यतो लोके षड् भवन्त्यृतवः खलु । २०७ ।
ग्रीष्म, वर्षा और शीत-काल के ये तीन प्रधान गुण है । प्रत्येक के दो दो
भेद होने से ६ ऋतुएं होती हैं ।
प्रायशो भारते वर्षे तेषां सम्पूर्ण भुक्तयः
भवन्ति भूमि भेदभ्य उत्कटाः केऽप्यनुत्कटाः । २०८ ।
भारत वर्ष में सभी ६ ऋतुओं का भोग प्रायः पूर्ण मात्रा में होता है । भूमि
(स्थान) भेद से इन ऋतुओं का फल कहीं अति उत्कट कहीं अति कम होता है ।
तपस्य प्राग् दलं सौख्याद् वसन्तो ह्य परं दलम्
ग्रीष्म स्यादथ वर्षाणां तत् प्रावृट् शरद्दौमते । २०९ ।
ग्रीष्म का प्रथमार्द्ध वसन्त सुखकर होता है । द्वितीयार्द्ध गर्म होता है । वर्षा
काल का प्रथमार्द्ध वर्षा तथा शेषार्द्ध शरत् होता है ।
हेमन्तः शिशिरः शीत प्राक् पश्चिम दले इति ।
सूर्य क्रान्ति वशात्तेस्य देश भेदात् पृथग् विधाः । २१० ।
शीत का पूर्वार्द्ध हेमन्त, परार्द्ध शिशिर । देश भेद (अक्षांश) तथा सूर्य क्रान्ति