सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३९१
मास तक शीत होता है तथा चैत्र आदि आठ मासों में वसन्त आदि चार ऋतुयें
होती हैं ।
चतुर्विं शति रंशानांमियं स्यादुष्णमण्डलम्
इतः षोड़ शकं प्रोक्तं सममण्डल नामकम् । २१८ ।
२४ अंश अक्षांश तक उष्ण मण्डल होता है । २४ अंश के स्थान में सभी ६
ऋतुएं २-२ मास की होती हैं । २४ से ४० अक्षांश तक का स्थान सममण्डल
कहा जाता है ।
चतुर्थेऽष्टाष्ट के व्यक्षाद् भार्द्ध मुर्जादि शीतलम्
माधवा द्युष्णमत्रैव वसन्तादि चतुष्टयम् । २१९ ।
२४ से ३२ अक्षांश तक कार्तिक आदि ६ मास तक शीत होता है । वहां
वैशाख आदि ६ मास उष्ण होता है तथा उसीमे वसन्त आदि ऋतुयें होती हैं ।
उषाद्यं शीतलं प्रोक्तम् पञ्चमेऽष्टाष्टकेऽष्टकम्
वसन्तादि चतुष्टं स्यात्तत्र ज्येष्ठ चतुष्टये । २२० ।
अक्षांश ३२ से ४० के बीच के स्थानों में आश्विन आदि ८ मास शीत होता
है। ज्येष्ठ आदि ४ मासों में वसन्त आदि ४ ऋतुएं होती हैं ।
इतः केन्द्रातमक्षांशाः पञ्चाशच्छीतमण्डलम्
निरक्षादष्ट के षष्ठे भागानां भाद्रतो दश । २२१ ।
अक्षांश ४० से ५० तक शीतमण्डल होता है । अक्षांश ४० से ४८ तक भाद्र
से दस -
मासाः शीताः शुचिद्वन्द्वे वसन्ताद्भूतवोऽल्पकाः ।
इत्युक्तः षड् ऋतु स्थान मष्टा म्भो धि (४८) लवावधि । २२२ ।
मास तक शीत होता है तथा आषाढ़ और श्रावण मासों में बहुत कम समय
के लिए वसन्त आदि ऋतु होती हैं । इस प्रकार निरक्ष से ८-८ अंश उत्तर अक्षांश
के ६ ऋतुस्थानों का वर्णन हुआ ।
आसु मेरु ततो द्वयब्धि (४२) भागस्थं केवलं हिमम्
एवं देवे सुरांशे तु तुल्याद्याः स्युरजादिवत् । २२३ ।
अक्षांश ४८ से मेरु तक ४२° अक्षांश क्षेत्र बर्फ से ढंका रहता है । इस प्रकार
उत्तरार्द्ध की ऋतुयें हुईं । दक्षिण गोलार्द्ध में तुला आदि ६ राशियों में उत्तर
गोलार्द्ध के मेष आदि ६ राशियों के सूर्य के समान ऋतु होती हैं ।
अत्र राधादयोमासा संस्कृतस्यायनांशकैः ।
भानेर्मेष प्रवेशादेः स्वीकार्य ऋतु भुक्तये । २२४ ।
सायन रवि के मेष प्रवेश से वैशाख आदि १२ मास ऋतु भाग के लिये ग्रहण