सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० सिद्धान्त दर्पण
इत्थं शैघ्यार्द्ध मान्द्यार्द्ध मान्द्य शैघ्यः फलैरपि
ज्ञारार्किणां कियद् भेद लाभात्तत् शुद्धयेमया । १४३ ।
इसी प्रकार शीघ्र फलार्द्ध, मन्दफलार्द्ध मन्दफल, शीघ्रफल- इन चार फलों
के संस्कार से मंगल बुध, और शनि की स्पष्टता की जाती है । तब भी इसमें कुछ
त्रुटि दीखने के कारण और शुद्धि के लिये -
परोच्च संस्कृति प्रोक्ता विधोस्तुं गान्तरादियत्
तत्तफलं मुनि प्रोक्त बीजमित्य विधार्यताम् । १४४ ।
मैने इन सभी में परोच्च संस्कार भी किया है । चन्द्र का तुंगान्तर आदि जितने
फलों का संस्कार कहा गया है उन सबों को आर्ष वचन का बीज (संशोधन)
मानना चाहिये ।
आर्ष सिद्धान्ततो ये ये विशेषा दृष्टि सिद्धये
स्फुटीकृतौ प्रकल्प्यन्ते ते बीजत्वेन सम्मता । १४५ ।
ग्रह को दृक् सिद्ध करने के लिए आर्षसिद्धान्त से जितने विशेष संस्कारों की
कल्पना की गयी है, उन सभी को बीज संस्कार माना जाता है ।
तथाहिवार्तिके ज्ञात ग्रहों पदेशाद् बीजं ज्ञात्वा सुदैवज्ञैः
सत्संस्कृत ग्रहेभ्यः कर्तव्यौ निर्णयादेशौ । इति । १४६ ।
उत्तम ज्योतिषियों ने प्रसिद्ध ज्योतिष शास्त्रों का बीज संस्कार देखकर उनसे
स्फुट ग्रह साधन किया तथा इसी बीज संस्कार से स्पष्ट ग्रहके अनुसार तिथि,
ग्रहण आदि का निर्माण और शुभ अशुभ फल कहा जाता है । (वार्त्तिक में)
सिद्धान्त शिरोमणौ मध्येहि मन्दप्रतिमण्डले स्वे मन्द स्फुटो द्राक् प्रतिमण्डले च
भ्रमत्यतश्चञ्चल कर्मणोह मन्दस्फुटो मध्य खगः प्रकल्प्यः । १४७ ।
मन्द प्रति वृत्त में मध्य ग्रह और शीघ्र प्रतिवृत्त में मन्द स्फुट ग्रह घूमते हैं ।
अतः शीघ्र फल संस्कार करने के समय मन्द स्फुट ग्रह को मध्यम ग्रह मानना
चाहिये । (सिद्धान्त शिरोमणि से)
भ्रमन् ग्रहः स्वे प्रतिमण्डल नृभिः सयत्र कक्षा वलये विलोक्यते
स्फुटो हि तत्रस्य फलोपपत्तये प्रकल्पितं तुंग मिहाद्य सूरिभिः । १४८ ।
अपने प्रतिवृत्त में ग्रह घूमने के समय उनको मनुष्य कक्षावृत्त (भकक्षा) में
जिस स्थान पर देखते हैं, वही वास्तविक स्फुट ग्रह है । वही स्थान (या दिशा)
उस समय का स्फुट ग्रह है । इस स्फुट ग्रह की राशि आदि जानने के लिए
प्राचीन आचार्यों ने उच्च (मन्दोच्च तथा शीघ्रोच्च) की कल्पना की है ।
यःस्यात् प्रदेशः प्रतिमण्डलस्य दूरे भुवस्तस्यकृतोच्च संज्ञा ।
सोऽपि प्रदेशश्चलतीति तस्मात् अकल्पिता तुंग गति र्गतिज्ञैः । १४९ ।