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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 482

वासना शेष रहस्य वर्णन ३८५
काल होने पर उसमें अर्थात् मध्य और स्फुट अमान्त में अनेक भेद होगा। विषुवोदय
में स्पर्श और मोक्ष काल से भी तुल्यता होगी। शर की दिशा के कारण लग्न
क्रान्ति ज्या के अनुसार समय का भी अन्तर होगा।
गर्भात् पृष्ठाद् भुवः सूत्रे क्षितिजस्थं विधुं प्रति
प्रसारिते समे स्यातां ततश्चन्द्रे समुद् गते। १७७।
भूगर्भ और भू पृष्ठ से क्षितिज पर स्थित चन्द्र तक के दोनों सूत्रों की लम्बाई
समान होती है।
क्रमात् पृष्ठाद् गतं सूत्रम् अल्पस्याद् गर्भसूत्रतः
सन्निकर्षाद् विधोः तस्मात् मानाधिक्यं नरोद् भवम्। १७८।
चन्द्र क्षितिज से ऊपर उठ जाने पर चन्द्र पर इन दो रेखाओं में पृष्ठ से जाता
हुआ सूत्र गर्भ के सूत्र से छोटा होता है। अतः वहां चन्द्र शंकु भी अधिक हो
जायेगा। (शंकु की चौड़ाई अधिक होगी)
भिन्न कक्षा स्थिति वशाद् रवीन्दोः शंकु संम्भवा
तमसोऽधिकता ग्रासकालयोर्वृद्धि दा भवेत्। १७९।
रवि और चन्द्र भिन्न कक्षा में स्थित होने के कारण शंकु द्वारा उत्पन्न अन्धकार
(छाया) बड़ी होगी तथा ग्रास और ग्रहण काल में भी वृद्धि होगी (सतह पर)।
ग्राह्य ग्राहकयोरेक कक्षावासाद् विधुग्रहे।
न काल ग्रास भेद, स्यात् मानाधिक्येऽपिशंकुजे। १८०।
चन्द्र ग्रहण में ग्राह्य और ग्राहक एक ही कक्षा में होने के कारण शंक का
मान अधिक होने पर भी ग्रहण समय और ग्रास का अन्तर नहीं होगा।
विमण्डल गतिर्वक्रा पूर्णामान्तेऽप मण्डलात्
यावत् स्यात्त न्मिति श्चन्द्र गत्यर्काश मितायतः। १८१।
पूर्णान्त में विमण्डल क्रान्तिवृत्त के ऊपर लम्ब होने के कारण शरगति भी
वक्र होती है। शर गति का मान पृथ्वी पर चन्द्र गति के १/१२ भाग के बराबर
है।
स्पर्शाद्याः शशिनस्तस्मात् शराकां शोत्थ कालतः
प्राक् पश्चात् भावमायान्ति मध्य ग्रास श्च भूरिताम्। १८२।
अतः चन्द्र का स्पर्श आदि के समय से वास्तविक समय शर के १/ १२ अंश
से उत्पन्न समय पहले पीछे होगा। मध्य ग्रास का समय भी इसी के अनुसार
बढ़ जायेगा।
ग्राहकान्य दिशि स्पष्टो ग्राह्यस्यैव यतः शरः
ततश्चन्द्र ग्रहे ग्रास बाणयो र्दिग् भिदा मता। १८३।