सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 492, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३९५
निकालने के लिए वर्गमूल का घन निकालेंगे। और घन का वर्ग निकालेंगे।
घनमूले करण सूत्रं वृत्तद्वयम् --
आद्यं घनस्थान मथाघने द्वेपुन स्थान्त्याद् घनतो विशोध्य
घनं पृथक् स्थं पदमस्य कृत्या त्रिघ्ना दातव्यं विजभेत् फलंतु । २४३ ।
घन संख्या को लिखकर दाहिने तरफ के अन्तिम अंक पर घन चिह्न दें।
उससे बायीं तरफ के दो अंकों पर अघन चिह्न दें। इसके बाद फिर एक अंक पर
घन और उससे बायें दो अंको पर अघन चिह्न दें। पूरी संख्या में घन अघन चिह्न
देने पर अन्तिम (बायें तरफ) घन संख्या से जिस अंक का घन घट सकता है
उस अंक को अलग लिखेंगे। और घन को घटायेंगे। इसके अंक के वर्ग को ३
से गुणा कर फल से प्रथम भाज्यशेष और उसके बाद के प्रथम अघन अंक से
भाग देंगे।
पंक्त्या न्यसेतत् कृतिमन्त्य निघ्नीं त्रिघ्नों त्यजेत्तत्प्रथमात् फलस्य
घनं तदाद्यात् घनमूलमेवं पंक्तिर्भवेदेव मतः पुनश्च । २४४ ।
फल को प्रथम घनमूल अंक के बाद रखेंगे। फल के वर्ग को पंक्ति में स्थित
बाकीअंक से गुणा कर और उसको तीन से गुणा कर भाज्य राशि से घटायेंगे।
पुनः जो शेष बचा उससे इस फल के घन को घटायेंगे। इस प्रकार बारबार करने
पर उक्त घन संख्या का घन मूल निकलेगा।
मूलावशेषात् कथयामसिद्धि षष्ट्यंशकानां पदशेष भाजाम्
पदं घनीकृत्य पदोत्तरांक घनाद्विजह्याद्य इहावशेषः । २४५ ।
सावयव संख्या का घनमूल निकालने के लिए प्रथम अवयव का जितना
मूल होता है, उतने का घन घटाने के बाद शेष को घनकर उसके बाद के अंक
के घन से घटायेंगे। फल शेष हार होगा।
स चान्त्यहारो यदि मूल संख्या त्रिंशद् बहुत्वत्र पदावशेषः
षष्ट्याहतोऽन्वेन हरेण भक्तः फलं कलास्तत्पद मल्पकं चेत् । २४६ ।
मूलसंख्या ३० से अधिक होने पर मूल शेष को ६० से गुणा कर अन्त्यहार
से भाग देने पर कला (१/६० वें भाग) में फल आयेगा। मूल संख्या ३० से कम
होने पर
व्योमोऽनलेभ्य (३०) स्तदिहान्त्यहारोन्मूलावशेषं विरहस्य शेषः
गुण्योऽन्त्य हारान्तु सरूपमूल भक्तात् फैलं स्याद् गुणकाभिधानम् । २४७ ।
अन्त्यहार से मूल अवशेष को घटा कर उसको गुण्य नाम देंगे। अन्त्यहार
को मूल में एक जोड़ कर भाग देने से जो लब्धि होगी उसको गुणक कहेंगे।
तत् क्षुण गुणे ध्योऽन्यहरेण भक्तः फलोञ्झितो ऽन्यस्फुट हार उक्तः ।
मूलावशेषो वियदंग (६०) निघ्नो लिप्तामयः स्यात् स्फुटहार भक्तः । २४८ ।