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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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३७८ सिद्धान्त दर्पण

  • प्राक् सिद्धान्त मते सैव इति कक्षा कुजस्य तु
    नवाशा (१०९) ङ्गुल सूत्रोत्थ कार्याभूवेष्टन क्रमात् । १३० ।
    पूर्व सिद्धान्त के अनुसार पहले कहे गये रवि कक्षा को ही रवि कक्षा मानें ।
    पृथ्वी केन्द्र की मंगल कक्षा का केन्द्र माने । पृथ्वी के चारों तरफ भू केन्द्र से १०९
    अंगुल व्यासार्द्ध से मंगल कक्षा बनाये ।
    एक सूत्रेऽर्क भू भौमाः स्थाप्या भञ्चपुनः पुनः
    स्वशीघ्र तपनाकृष्टः पश्चाद् व्यद्रा (७२) ङ्गुलान्तरे । १३१ ।
    एक सूत्र में सूर्य, पृथ्वी और मंगल बिम्ब को रखकर भकक्षा के के एक नक्षत्र
    को भी प्रायः उसी सूत्र में रखेंगे । मध्यम सूर्य मंगल के शीघ्रोच्च है । उससे आकृष्ट
    होकर मंगल पश्चिम दिशा में ७२ अंगुल दूरी पर
    स्थितश्चक्रार्द्धगो दृश्यस्ततो दिन गतिः समा
    याम्ये सौम्येऽर्क कुजयोर्दत्वा प्राग् वत् स्वकक्षयोः । १३२ ।
    अपने नीच स्थान (चक्रार्द्ध) में दीखेगा । इसके बाद रवि और मंगल की
    दैनिक गति क्रमशः दक्षिण और उत्तर की तरफ अपनी अपनी कक्षा में पहले के
    समान दिखायेंगे ।
    ततस्तावदिनाकृष्टे रङ्गुलं गां (७) शउत्तरे
    सूत्राद् गंतस्य दृश्यस्य प्राग् गति विश्व (१३) लिप्ति का । १३३ ।
    वहां से सूर्य आकर्षण के १/७ भाग (७ २/७) उत्तर को मंगल की १३ कला
    पूर्व गति दीखेगी ।
    भूमध्यार्क समे सूत्रे भकक्षायां यदीष्यते
    शीघ्रोच्च तद् गति द्वैधा चक्र चक्रार्द्धयो भवेत् । १३४ ।
    परन्तु नीच स्थित मंगल की वक्र पश्चिम गति भी दीख सकती है । पृथ्वी
    केन्द्र और सूर्य केन्द्र से जाते हुए सूत्र (रेखा) भकक्षा को जिस स्थान पर काटेगा
    वहां शीघ्रोच्च पर उच्च और नीच स्थान में दो प्रकार की गति होगी - एक पूर्व और
    दूसरी पश्चिम ।
    तदाकर्षात् कुजादीनां यद्यत् स्यात् प्रतिमण्डलम्
    तत्रन्मध्येऽर्क मध्यस्य स्थितेः सिद्धयति तद् भ्रमः । १३५ ।
    शीघ्रोच्च आकर्षण के कारण मंगल आदि ग्रहों का जो शीघ्र प्रतिवृत्त होता है
    उन्हीं के केन्द्र में रवि का केन्द्र होने से मध्यम रवि की मध्यम गति भी सिद्ध
    होती है ।
    यदि भूमध्यका कक्षा मन्यते तन्मृदून्नयात्
    आकर्षणान्न भिद्येत शरस्तेषां विधोरिवः । १३६ ।