सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३७९
मंगल आदि की कक्षा का केन्द्र यदि पृथ्वी केन्द्र होता है, तो मन्दोच्च आकर्षण
से ही इसका भी शर होता है, जैसे चन्द्रमा का होता है। (चन्द्र शर के लिए एक
ही अनुपात होता है। उसी प्रकार इनका भी होता दो अनुपातों की आवश्यकता
नहीं होती) ।
केवलं शीघ्रजाकर्षा भेदोयः प्रतिपद्यते
सत्रिज्याघ्नन्त्य कर्णाप्त मध्येष्पोरेव सिद्धयते । १३७ ।
यह नहीं होने से अर्थात् शीघ्रोच्च आकर्षण के कारण उनका प्रभेद उत्पन्न
होने के कारण उस शर को त्रिज्या से गुणा कर ४ र्थ कर्ण से भाग देने पर ही
भगोलीय शर प्राप्त होता है ।
तत्रांर्कोत्थ गुणद्वन्द्वे शरान्तौ लगतौ यतः
मन्दाकृष्टस्य नीचोच्च गतावपि नभः सदः । १३८ ।
रवि केन्द्रित ग्रह कक्षा में मन्दोच्च से आकृष्ट ग्रह नीच उच्च की तरफ गति
करते समय रवि से ग्रह गोलीय विमण्डल तथा प्रतिमण्डल के दो सूत्रों से दो
शरान्त लगता है ।
मदुक्तयोशर श्रुत्या संस्कृतेषोः स्फुटत्वतः
मध्यार्काभिभ्रमः सिद्धः शुक्रेज्यार्कि बुधाः सृजाम् । १३९ ।
अतः मैने पहले जैसा कहा है कि उसके अनुसार शर साधन योग्य कर्ण द्वारा
स्फुट शर होने के कारण शुक्र, गुरु, शनि बुध और मंगल का मध्यम सूर्य के
चारों तरफ भ्रमण करना सिद्ध होता है ।
मध्यार्क केन्द्र का कक्षा यत्ताराक्ष नभः सदाम्
तन्मन्दा कृष्टि रे वैषां भूमौ भनैक्ष्यतेऽर्कतः । १४० ।
मंगल आदि पांच तारा ग्रहों की कक्षा रवि केन्द्रित तथा इनकी मन्दा कर्षण
रेखा पृथ्वी से सदा अलग दीखती है ।
ततोमन्द स्फुटं खेटं ज्ञातुं कर्मद्वयं कृतम्
शैघ्र मान्धार्द्ध नामादौ इतः स्पष्टां मृदुक्रियाम् । १४१ ।
मंगल आदि तारा ग्रह सूर्य केन्द्रित अपनी अपनी कक्षा में घूमने के कारण
मन्द स्फुट ग्रह जानने के लिये पहले मध्यम ग्रह का शीघ्र फलार्द्ध तथा उसके
बाद मन्द फलार्द्ध संस्कार किया जाता है ।
मन्दस्पृष्टस्य भूगोल दूरता दूरता वशात्
भचक्रावस्थितीक्षायै तुर्यं द्राक् कर्म निर्मतम् । १४२ ।
उसके बाद स्फुट मन्दफल संस्कार किया जाता है। तब भूगोल से अति दूर
होने के कारण और मन्द स्पष्ट ग्रह का भचक्र में स्थिति देखने के लिये ४र्थ शीघ्र
फल का संस्कार किया जाता है ।