सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३९३
सूर्योष्मणाति लघवः परमाणवोऽपा
मूर्ध्वं व्रजन्ति गुरवोलवणस्यतेन
तेनाभिवृष्टि सलिलं मधुरं महाब्धेः सिद्धं
पुनः कुतुकतो गणितं ब्रुतेऽल्पम् । २३१ ।
महासागर में लवण जल है । सूर्य ताप से जल के अत्यन्त छोटे अणु ऊपर
ऊठ जाते हैं पर लवण के अणु नहीं उठते । अतः वर्षा का पानी मीठा होता है ।
अब मनोरञ्जन के लिए कुछ पाटीगणित कहता हूँ ।
घनः समांक त्रिनयस्य घातस्तदीय मूलानयनाय सूत्रम् ।
पश्चांकं पंक्ते श्चर ये निधाय विन्दुं ततो वाम गते चतुर्थे । २३२ ।
तीन समान अंकों के गुणनफल को घन कहा जाता है । इस घनांक का मूल
निकालने के लिए यह सूत्र कहा जा रहा है । घन संख्या के दाहिने अन्तिम अंक
पर विन्दु देकर उससे बायीं तरफ चतुर्थ अंक पर-
तत्तचतुर्थे क्रमतश्चदत्वा सविन्दु शिष्टं कितएव यस्य
यातुं घनो युज्यत एतमकं लब्धं न्यसेत्तद् घन वर्जितायः । २३३ ।
बिन्दु देकर बायीं तरफ प्रति चतुर्थ अंक पर उसी प्रकार विन्दु देते जायं ।
बायीं छोर से दाहिनी तरफ बिन्दु वाले अंक तक जो संख्या होगी, उससे जितनी
अधिक संख्या का घन घट सकता है, घटाते हैं । जिस संख्या का घन घटा उसे
लब्धि के रूप में रखते हैं ।
पंक्ते स्थिरात्मत्रिविधांक हानि जाताद्वितीयादिक लब्ध सिद्धयै ।
तस्यास्तलेन्यस्य पृथक् स्थिताया लब्धांक वर्गं त्रिशतघ्नमेकम् । २३४ ।
दूसरी लब्धि संख्या निकालने के लिये पहले लब्धांक को वर्गकर ३०० से
गुणा करके अलग स्थान में रखते हैं ।
वामाद् द्वितीयादिसविन्दुकांक स्याधोऽन्य शून्यस्य यथा स्थितः स्यात्
तेनैव तस्या हरणे प्रवृत्ते नवाधिकं चेत्पततीह लब्धम् । २३५ ।
उससे भाज्य में बायें से दूसरे बिंदु के नीचे के अंक तक जो शेष बचा उसमें
भाग देते हैं । फल दूसरी लब्धि के रूप में रखते है ।
नवैव कृत्वा तदनेन हारं हत्वा पृथक् पंक्ति तले निधाय
कृतिं द्वितीयादि फलस्य पूर्वं लब्धैर्हतां ख्राग्नि (३०) गुणांततोऽधः । २२६ ।
यदि लब्धि ९ से अधिक होती है । तो उसे ९ ही लेते हैं ( लब्धि के रूप
में) (१) द्वितीय लब्धि से भाजक को गुणा कर उसके नीचे (२) द्वितीय लब्धि
का वर्ग से पूर्व लब्धांक को गुणा कर ३० से गुणा कर प्राप्त संख्या को रखें ।
घन द्वितीयादि फलस्य चैवं त्रिधांक योगं विजहातु पंक्तेः
साल्पायदि त्र्यंकं युतेः द्वितीय चेकैक हीनं क्रमशॊऽ त्रलब्धम् । २३७ ।