सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३७७
प्राग् भागे निजकक्षायां न्यसेद् बिम्बं महीभुवः
सूर्य भूमंगलस्यूत सूत्राग्रे बहु दूरतः । १२३ ।
इस कक्षा की पूर्व दिशा में मंगल को रखेंगे । पृथ्वी, रवि और मंगल के
केन्द्र से एक रेखा खींचकर बहुत दूर में
प्रकल्पां तारकां काञ्चित् प्राच्यं कौतत्समं कुजम्
दृष्ट्वा चक्राङ्कगं याम्य भाग मूर्ध्वं विचार्य च । १२४ ।
पूर्व दिशा में एक तारा की कल्पना कर उसे रखेंगे । पृथ्वी के अति निकट
में मंगल रखकर उसे उसी तारा की दिशा में रखेंगे । यह कक्षा के दक्षिण भाग
में होगा और इस भाग को ऊर्ध्व मानकर
मध्यार्कं दक्षिणं नीत्वा हर्गंत्यां गुल मानया
तथा भौमं सकक्षञ्च सार्धा (५) शोनांगुलात्मना (४८) । १२५ ।
दैनिक एक अंगुल गति से मध्यम रवि को दक्षिण भाग की तरफ चलायेंगे ।
कक्षा सहित मंगल को ४८ अंगुल गति से
स्वगत्यो तरणं कुर्यात्तारा सूत्रात् सयाम्यगः ।
षष्ठ्यंशकै र्द्वादशभ (१२) दृश्यतेऽन्तरितः स्फुटः । १२६ ।
उत्तर दिशा में चलायेंगे । ऐसा करने से स्फुट मंगल तारा सूत्र से १२ षष्ठ
यंश कला दक्षिण दिशा में खिसकेगा ।
भूमि सूर्यान्तराद्धं यद् भूमि भौमान्तर श्रवः
ततः सिद्ध कला दृश्या साक्षाद् वक्रा गति र्भुवि । १२७ ।
पृथ्वी से मंगल कर्ण (दूरी) सूर्य कर्ण दूरी या अन्तर का आधा होगा और
पृथ्वी से मंगल की वक्र गति २४ कला (१२ कला की दूनी) दीखेगी ।
चक्रे कुजार्कयोरेक दिङ् गतिर्नग दिक् (१०७) कला
भौमयाम्य गतिः सूर्य कर्ण (५८) घ्नी निजकर्म (१४५) हृत् । १२८ ।
उद्य स्थान से रवि और मंगल की एक दिशा में स्थिति के कारण १०७ कला
मंगल दक्षिण गति को सूर्य कर्ण (५८) से गुणा कर अपने कर्ण १४५ (सूर्य कक्षा
व्यासार्द्ध ५८ मंगल कक्षा व्यासार्द्ध ८७) से भाग देने पर (१०७ x ५८)/१४५ =
४३)।
रामाब्धि (४३) कलिका साक्षाद् ऋज्यो भवति तद् गतिः
इत्थमन्य ग्रहाणाञ्च द्रष्टव्या विविधा बुधैः । १२९ ।
४३ कला मंगल की मार्गी गति होगी । यह उक्त चित्र में स्पष्ट प्राप्त होता है।
इसी प्रकार उदाहरणों से अन्य ग्रहों की भी मार्गी और वक्री गति प्रत्यक्ष देखी जा
सकती है ।