सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 487, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ें३९० सिद्धान्त दर्पण
' भेद से अलग अलग ऋतुयें होती हैं ।
तिरश्चिनाः करायत्र पतन्त्यर्कस्य भूतले
नाप्नोति तत्तथा तापं तत्र शीतं बलोत्तरम् । २११ ।
पृथ्वी के ऊपर सूर्य किरण तिरछे पड़ने से उष्णता अधिक नहीं होने के कारण
शीत बढ़ता जाता है ।
पतन्त्यृजुतया यत्र तत्र तापातिरेकतः
तत्रत्यानां तपर्तुः स्याद्रवि सम्मुख वृत्ति जात् । २१२ ।
जहां पर सूर्य किरण सरल (लम्ब रूप) पड़े वहां ताप अधिक होने के कारण
ग्रीष्म ऋतु होती है ।
तीक्ष्णैः सूर्याशुभि सिन्धो र्लघुतोयं समुत्थितम्
पतत्याकर्षणाद् भूमौ तत्तपान्ते घनागमः । २१३ ।
ग्रीष्म में सूर्य की सीधी किरण समुद्र में पड़ने से उसका पानी गर्म होने से
बाष्प बनकर ऊपर उठता है । पुनः भूमि के आकर्षण से ऊपर ठण्डा होकर
आकाश से पृथ्वी पर पड़ता है । अतः ग्रीष्म समाप्त होने पर वर्षा का आरम्भ
होता है ।
निरक्ष देशतोंऽशाना मक्षाणां यावदष्टकम्
हेमन्त शिशिरौ नस्तो ग्रीष्म वर्षातिरेकतः । २१४ ।
निरक्षदेश से आठ अंश तक (भारत में कुमारी अन्तरीप का निकटवर्ती स्थान
अत्यन्त गर्म होने के कारण वहां हेमन्त और शिशिर नहीं होता तथा ग्रीष्म और
वर्षा अधिक होती है ।
प्रावृडन्ते शरत्कालस्त पादो स्यात् वसन्तकः
एतयोरन्तरे किंचित् शीतं देशे जलाधिके । २१५ ।
वर्षा समाप्त होने पर शरत् काल होता है । ग्रीष्म के आरम्भ में वसन्त होता
है । शरत् और वसन्त के बीच में अधिक जल (वर्षा) वाले स्थान में सामान्य
शीत होता है ।
पौष माघ द्वयं शीतं द्वितीयेऽक्ष लवाष्टके
दशस्वेन्येषु मासेषु वसन्तादि चतुष्टयम् । २१६ ।
अक्षांश ८ से १६ तक पौष और माघ दो मास शीत होता है तथा बाकी दस
मास में वसन्त आदि चार ऋतुयें ही होती है ।
तृतीयेऽंशाष्टके शीतं स्यान्मार्गादि चतुष्टयम्
चैत्राद्येषु वसन्ताद्या श्चात्तारोऽत्रैवषट् समाः । २१७ ।
अक्षांश १६ से २४ के बीच में स्थित भारत में मार्गशीर्ष से आरम्भकर चार