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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

२९८ सिद्धान्त दर्पण
इस ५० योजन शंकु को ५०२६ योजन की भूगोल परिधि के ऊपर स्थित
मानेंगे । पूर्व रीति के अनुसार इसके संस्कृत शंकु का मान २२५ कला होगा ।
द्विः स्थाद स्यादुत्क्रमज्या दृङ्नखा (२०२) स्तद्धनुः कलाः
दृङ् नागेशो (११८२) दृष्टि सीमा शरभै (२७५) योजनैर्मता । ६३ ।
दो स्थानों पर रखकर क्रिया करने पर इसकी उत्क्रमज्या २०२ होगी । इसकी
चापकला ११८२ ही दृष्टि सीमा का मान कला में हुआ दृष्टि सीमा का योजन
मान २७५ है (अर्थात् ५० योजन हिमालय से २७५ योजन तक की दूरी से दीख
सकता है) ।
द्रष्टृ शंक्वन्तर धरामानं चक्रकला हतम्
हृतं परिधिमानेन लब्धा भुजकला स्ततः । ६४ ।
द्रष्टा और दृश्य वस्तु (शंकु) के बीच की दूरी को चक्र कला (२१, ६००) से
गुणा भू परिधि (५०२६) से भाग देने पर भुज कला होगी ।
द्रष्टृ दृश्यान्तरे राशि त्रयोने दृष्टि सम्भवः ।
भुंज लिप्ता ज्यका वर्ग हीन त्रिज्याकृतेः पदम् । ६५ ।
इस भुजकला का परिमाण ३ राशि से कम होने पर द्रष्टा दृश्य वस्तु को देख
सकता है । भुजलिप्ता के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटाकर उसका वर्गमूल
निकालने से
को टीज्या त्रिगुणा (३४३८) च्छोध्याशेषः स्यादुत्क्रमज्यका
अथ कोटिज्य याभ्यस्ता त्रिज्याप्तः संस्कृतो नरः । ६६ ।
कोटिज्या होगी । इस कोटिज्या को त्रिज्या (३४३८) से घटाने पर उत्क्रमज्या
होगी । इसके बाद संस्कृत शंकु को कोटिज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने
पर-
स्फुट शंकु स चेदल्प उत्क्रमज्या प्रमाणतः
तदा न दृश्यते भूयान् दृश्यते व्यवधान भित् । ६७ ।
स्फुट शंकु आता है । यह उत्क्रमज्या से कम होने पर नहीं दीखता है । यह
उत्क्रमज्या से जितना अधिक होता है उतना भाग अवरोध के ऊपर दीखता है ।
उत्क्रमज्योत्झितः स्पष्टा शंकुर्दृश्य ज्यका भवेत्,
सात्रिज्याघ्नान्तरक्ष्मात्थ भुजज्याप्तोन्नतज्यका । ६८ ।
स्फुट शंकु से उत्क्रमज्या घटाने पर दृश्य ज्या होती है । इस दृश्यज्या को
त्रिज्या से गुणा कर द्रष्टा और दृश्य के अन्तर की ज्या से भाग देने पर उन्नत ज्या
होती है ।

भूगोल विवरणम् २९९
तद् धनुर्दृश्यलिमाः स्युस्तच्छंकौः क्षितिज्या परि ।
दृश्य ज्या परिधिक्षुण्णा चक्रलिमोद्धृता फलम् । ६९ ।
इस उन्नत ज्या का चाप क्षितिज के ऊपर उस संस्कृत शंकु की दृश्यकला
(२१,०००) से भाग देने पर फल-
शंको दृश्ये नतिः साथ त्रिज्याघ्नी कोटि भाजिता
दृश्य भागः स्फुटः शंको स्याद् योजन करादिकः ।
शंकु का योजन में दृश्य भाग होता है । शंकु की दृश्योन्नति होती है । इस
दृश्योन्नति को त्रिज्या से गुणा कोटिज्या से भाग देने पर फल शंकु का योजनात्मक
दृश्य भाग होता है ।
परिधिघ्नोत्क्रमज्याथ भचक्र कलिकोद्धृता
त्रिज्याघ्नी कोटि जीवाप्तां लुप्तांश प्रमिति र्भवेत् । ७१ ।
पुनः उत्क्रमज्या को भू परिधि से गुणा कर भचक्र कला से भाग दें । और
फल को त्रिज्या से गुणा कर कोटिज्या से भाग दें । फल शंकु के अदृश्य भाग
का परिमाण होता है ।
हिमाद्रीशृंग तलतः कुनृपै (१६१) योजनैः स्थिते
दक्षिणे नीलशैलेऽत्र द्रष्टुः स्थानं प्रकल्प्यते । ७२ ।
हिमाचल के शृंग तल से दक्षिण की तरफ १६१ योजन पर नीलाचल (पुरी
में श्री जगन्नाथ मन्दिर) को द्रष्टा का स्थान मानें ।
तदन्तरोत्थदे र्लिप्ताद् व्यं कांग (६९२) न्युत्क्रमज्यका
सप्ततिः (७०) कोटि जीवाष्ट रसाग्न्यग्निमिता (३३६८) भवेत् । ७३ ।
उसकी (१६१) योजना की भुजकला ६९२, उत्क्रमज्या ७० तथा कोटिज्या
३३६८ हुयी ।
पूर्वोक्तः संस्कृत शंकुः (२१५) स्फुटो रुद्राक्षिः (२११) सम्मितः
दृश्यज्याधरणी शक्र (१४१) उन्नतज्येषु खाद्रयः (७०५) । ७४ ।
संस्कृत शंकु २१५, स्फुट शंकु २११, दृश्यज्या १४१ तथा उन्नतज्या (७०५) ।
दिगाद्रयो (७१०) नतकलादेव ३३ दृश्योन्नतिस्तथा
स्फुट दृश्योन्नति वेदगुण (३४) योजन सम्मिता । ७५ ।
उन्नतज्या का चाप (७१०) उन्नतकला, दृश्य की उन्नति ३३ स्फुट दृश्योन्नति
३४ तथा
षोडशा दृश्यमानानि योजनानि गिरेर्यतः
क्षितिज्या द्वादशांशोन्नस्तत्र दृश्यो हिमालयः । ७६ ।
दृश्यमान १६ योजन हुआ । अतः क्षितिज से १२ अंश (१६ योजन का चाप)

३०० सिद्धान्त दर्पण
ऊपर हिमालय नीलाद्रि से दृश्य होना चाहिये ।
धूमधूलि हिम घनेर दृष्टोऽपीह दूरगे
छादनाद् ध्रुवमत्स्यस्थ भाना स्यात्तत्समक्षता । ७७ ।
धूम, धूलि, हिम और मेघ द्वारा आच्छादित होने के कारण अति दूरी पर ये
पर्वत दीखते नहीं हैं । पर ध्रुव मत्स्य के अनेक नक्षत्र उसके सामने होने के कारण
(अवरोध से)
अतोन् तावदौन्नत्यं सिद्धं नायाम विस्तृती
प्रत्यक्षे तस्य तुच्छत्वं खार्णवांश (४०) मितं ततः । ७८ ।
हिमालय की स्थिति प्रत्यक्ष (आभास) होती है । पर उससे उसकी ऊंचाई,
लम्बाई और विस्तार वास्तव में सिद्ध नहीं होता । नक्षत्र मेघ आदि के कारण भी
छिप सकते हैं, यदि उतनी ऊंचाई तक हिमालय नहीं भी होता । वास्तव में
हिमालय की उन्नता ४० अंश ही है ।
सोऽयुतद्वय (२०,०००) हस्तोङ्गः शंकुश्चेत्संस्कृतः पुनः
दृग्दन्त (३२२) विकलास्तावत्युत्क्रमज्या (५/२

भूगोल विवरणम् ३०१
सार्द्धांशा (११/३०) स्तत्रलम्बांश दृष्ट्यंशाः पञ्चविंशति (२५)
तच्चापान्तर्गतः सूर्य क्षितिजाद् विश्वभागकैः । ८३ ।
क्योंकि उसका लम्बांश (११°/३०') अंक्षाश ७८°/३०') होने से दृष्ट्यंश (२५°)
इसके चाप के बीच में स्थित सूर्य क्षितिज से १३° उच्च देवताओं को दीखेगा ।
अतः यह नहीं कहा जा सकता है कि देवता लोग ६ मास सूर्य को नहीं देखते ।
उच्चस्थो द्रक्ष्यते देवैः षण्मासास्तमय कथम्
विषुवत्कालके खण्ड ग्रहणे शीतगोस्तथा । ८४ ।
सम दिवस (जब सूर्य विषुव रेखा ०° क्रान्ति पर हो) में तब चन्द्र के खण्ड
ग्रहण में
अद्रक्षतः कुभान्तःस्थ मेरुच्छाया चतुः कला
अतो मेरूर्न्नति न्यूनं मन्यतां हिमवन् मिते । ८५ ।
भू छाया के अन्तर्गत मेरू की छाया ४ कला अधिक दीखती है । अतः
हिमवान की उच्चता से मेरू की उच्चता

३०२ सिद्धान्त दर्पण
अतो भारत वर्षस्य याम्य भागे त्रिकोणता
प्राक् पश्चान्मध्य देशानामन्तरज्ञानतोऽपि च । ९० ।
अतः इन तीन स्थानों का त्रिकोण भारत वर्ष के दक्षिणी भाग में स्थित है ।
पुनः भारत वर्ष का पूर्व, पश्चिम और मध्य भागों का अन्तर देखने से भी स्पष्ट होता
है कि -
शंखाग्रा कारता सिद्धि स्तद्वीपेऽस्मिन्न वृत्ततां
तन्मानता न चैवाब्धौ न चापि वलयाकृतिः । ९१ ।
भारत का आकार शंख के अग्रभाग की तरह है । अतः जम्बूद्वीप का आकार
वृत्ताकार नहीं है । इसी प्रकार समुद्र भी वलयाकार नहीं है । (जैसा पुराणों में
कहा गया है ।)
तत्ततोऽधिक मानोऽसौ सागरो विविधाकृतिः
प्राक्पश्चाद् याम्य सौम्याख्या नानारूपः स्थानभेदतः । ९२ ।
समुद्र भी विविध आकार के तथा अधिक मान के हैं । पूर्व पश्चिम, दक्षिण
तथा उत्तर नाम से इन समुद्रों का नाम करण हुआ है । स्थान भेद से इनका नाम
अलग अलग है ।
लवणार्णव मध्यस्था द्वीप भेदः परः शताः
दशार्बुदाधिका संख्या मनुष्याणां भुविश्रुता । ९३ ।
लवण समुद्र में भिन्न भिन्न सौ से अधिक द्वीप हैं । सुना जाता है । कि
पृथ्वी पर १०० कोटि से भी अधिक लोग रहते हैं ।
समन्ताद् योजनं कल्पे भूगोलः किल वर्द्धते
इति सिद्धान्त तो वृद्धे वैषम्याद्देश भेदतः । ९४ ।
एक कल्प में पृथ्वी गोल की वृद्धि चारों तरफ चार कोस होती है यह सिद्धान्त
स्थिर हो चुका है । अवश्य स्थान भेद से यह वृद्धि कम या अधिक होती है ।
बहुदिक् प्रसरद् वात क्षुब्धाम्भोधि जला हते
वर्षो द्रेकान्नदी वेगान्मृदां नाना विध स्थिते । ९५ ।
अनेक दिशाओं में हवा से क्षुब्ध समुद्र जल के आघात से तथा वर्षा वेग
और नदी के प्रवाह से मिट्टी का कटाव अनेक प्रकार से होता है ।
उन्मजन्ति निमजन्ति केचित्केचित्कदा कदा
क्षुद्राद्वीपा महन्तस्तु भिन्नाकारा भवन्ति हि । ९६ ।
मिट्टी के असमान कटाव के कारण विभिन्न आकार के छोटे और बड़े द्वीप
कभी दब जाते हैं । तथा कभी समुद्र से ऊपर उठ जाते हैं । तथा आकार भी
बदल जाता है ।

भूगोल विवरणम् ३०३
तथापि वृत्ततो भूमेर्मृद् भिस्तो यैर्न भिद्यते ।
मृदा पमाञ्च संस्थानान्याप्नुवन्ति सदा भिदाम् । ९७ ।
तथापि मिट्टी और पानी के इस परिवर्तन से पृथ्वी का गोलकार नहीं बदलता
है । सिर्फ मिट्टी और पानी का स्थान परिवर्तन होता है ।
लवणोदेन सम्पृक्ताः क्षीरोदाद्याक्वचित्क्वचित्
दघतिक्षीर दध्यादि न स्वरूपन्तु कात्स्न्यर्तः । ९८ ।
क्षीर और दधि मिला हुआ लवण समुद्र कहीं कहीं पर है । पुराणों में वर्णित
शुद्ध क्षीर या दधि समुद्र कहीं नहीं है ।
तत्प्राक् सिद्धान्त सम्प्रोक्त सृष्टिकाल कुसंस्थिते-
र्वर्तते वर्तमानक्ष्मा संस्थिते श्चान्तरं महत् । ९९ ।
अवश्य पहले के सिद्धान्त ग्रन्थों में वर्णित सृष्टिकाल तथा पृथ्वी की स्थिति
से अभी की पृथ्वी की स्थिति में बहुत अन्तर है ।
आदियामले-यस्य शृंगैक देशस्था देवास्त्रींशं त्रिकोटयः
समेरु पृथिवीमध्ये श्रूयते न च दृश्यते । इति । १०० ।
आदि यामल ग्रन्थ के अनुसार जिसके श्रृंग के एक स्थान पर ३३ कोटि
देवता रहते हैं । वही मेरु पर्वत पृथ्वी के मध्य भाग में है वह मेरु सिर्फ सुनने
में आता है किन्तु दीखता नहीं है ।
सूर्य सिद्धान्ते-अनेक रत्न निचयो जाम्बू नद मयो गिरिः
भूगोल मध्य गो मेरू रुभयत्र विनिर्गतः । १०१ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार -भूमि के मध्य भाग में दोनों दिशाओं में निकले
हुये दो मेरू हैं । यह सुवर्णमय तथा इनमें अनेक मणि माणिक्य हैं ।
उपरिष्टात् स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः
अधस्तादसुरास्त द्व वद्विषन्तोऽन्योऽन्य माश्रितः । १०२ ।
उनके ऊपर इन्द्र सहित देवता गण और महर्षि निवास करते हैं । नीचे स्थित
मेरु (कुमेरू) पर देवताओं के द्वेषी असुरों का आश्रय स्थान है ।
ततः समन्ता परिधि क्रमेणायं महार्णवः
मेखलेव स्थितो धात्रा देवासुर विभागकृत् । इति । १०३ ।
यह दोनों मेरु के चारों तरफ पृथ्वी की परिधि के रूप में महा समुद्र घेरे हुए
हैं और इसके द्वारा देव तथा असुरों का विभाग स्पष्ट दिखाई देता है (उद्धरण
समाप्त)
देवावासः सुमेर्वाख्यः कुमेरु रसुरश्रयः
तत्सामान्तरगा रेखा व्यक्षरूपा परिधिर्महान् । १०४ ।

३०४ सिद्धान्त दर्पण
सुमेरू पर देवता तथा कुमेरू पर असुरों का वास है । इन दोनों स्थानों से
बराबर दूरी पर स्थित महापरिधि को व्यक्ष या विषुव वृत्त कहा जाता है ।
अक्षांश मेरू पर्यन्तं क्रमोना वृत्त रेखिकाः
तद् भिदो मेरू युक् सक्ता द्राघिमाख्याः समा मताः । १०५ ।
इस विषुव वृत्त से क्रम से छोटे होते गये वृत्त मेरू तक ही दीखते हैं । जिन्हें
अक्षांश रेखा कहते हैं । दोनों मेरू पर्वत के बीच की रेखा जो इन अक्ष वृत्तों को
काटती है उसे द्राघिमा (देशान्तर ) रेखा कहते हैं ।
इत्थामाकाश वद् भूमावपि सर्वं प्रकल्प्यते
भूमध्यात्स्व स्थितिर्यस्मात् पृष्ठे सूत्र समाभवेत् । १०६ ।
इस प्रकार आकाश में जिन रेखाओं की कल्पना की गयी है, उसी अनुसार
पृथ्वी पर भी रेखाओं की कल्पना है । आकाश वर्णित रेखा से भू केन्द्र का सूत्र
(रेखा) पृथ्वी की सतह को जहां स्पर्श करता है, वहां वही रेखा मानी जाती है ।
ब्रह्माण्डात्म विराड् देह मेरुदण्डायिते स्थिरे
वायौ भूरादयः स्युताश्चक्राणोवतनौ नृणाम् । १०७ ।
जिस प्रकार मनुष्य देह में चक्र हैं । (मेरू दण्ड में ६ तथा ऊपर सहस्त्रार)
उसी प्रकार परमात्मा के विराट देह में भी मेरुदण्ड रूपी जो स्थायी वायु (प्रवह)
है उसमें भू, भुवः स्वः आदि लौक स्थित हैं ।
ख मेरु समरुत् प्रोक्तो लोकाधार तया गमैः
गर्भोद सिन्धु युङ् मूलः षोडशाधार भृच्छिखः । १०८ ।
आकाश के मेरु को शास्त्रों ने सभी लोकों का आधार माना है । प्रसिद्ध है
कि वहां बहुत पवन होता है । उसका श्रृंग १६ आधार का है । तथा मूल जल
समुद्र के भीतर है ।
लोका लोक तया प्रोक्ता कटाह प्रथमावृतिः
हिरणमयो भूमि संज्ञा ततो दश गुणोत्तरा । १०९ ।
पृथ्वी का नाम हिरण्मयी है । लोगों की दृष्टि में इसका आकार कड़ाह के
समान (गोलाकार है ) । भूमि का इसका प्रथम आवरण है । उससे क्रमशः
दस-दस गुणा अधिक
क्रमाज्जलादयः प्रोक्ताः प्रकृत्यन्ताः प्रसंगताः ।
यस्याधारण भूगोल शास्त्रे देशादि वर्णना । ११० ।
जल आदि के आवरण हैं, अन्त में प्रकृति है । प्रसंग के अनुसार इनका
शास्त्रों में वर्णन है । देश, (सागर, नगर) आदि का वर्णन साधारणतः भूगोल में
ही होता है, अतः

भूगोल विवरणम् ३०५
कर्तुर्महा तदेतस्मिन् गणितेदिक् प्रदर्शिता
पश्चाद् व्यासादि गोलस्य वाच्यं दृक्शास्त्र सम्मतम् । १११ ।
अतः इस गणित शास्त्र में उसका दिग्दर्शन मात्र दिया गया है। बाद में गोल
अध्याय में वास्तविक व्यास आदि के बारे में कहा जायेगा ।
अथ भूभाग संस्थान परिचित्ये कुतूहलात्
लिख्यन्ते कतिचित्श्लोकाः सत्सिद्धान्त शिरोमणौ । ११२ ।
भूभाग में कौन सा स्थान कहां पर है इसका परिचय और कुतूहल शान्ति के
लिये प्रमाणिक सिद्धान्त शिरोमणि के कई श्लोक लिखे जाते हैं ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-लंका कुमध्ये यम कोटिरस्याः
प्राक्पश्चिमे रोमकपत्तनञ्च ।
अधस्ततः सिद्ध पुरं सुमेरू सौम्येऽथ याम्ये वडवानलश्च । ११३ ।
सिद्धान्त शिरोमणि के अनुसार-पृथ्वी के मध्य (विषुव रेखा पर) लंका नगरी
है। उससे पूर्व (९०° पर ) यम कोटि पत्तन, लंका से पश्चिम उतनी ही दूरी पर
रोमक पत्तन है। लंका के ठीक नीचे (१८०° पर) सिद्ध पुर तथा इन चारों से ठीक
उत्तर (९०°) पर सुमेरू और दक्षिण में कुमेरू या बड़वानल है ।
कुवृत्त पादान्तरितानि यानि स्थानानि षड्गोल विदोवदन्ति
वसन्त मेरौ सुरसिद्ध संघा और्वेच सर्वे नरकाः सदैत्याः । ११४ ।
यह सभी ६ स्थान एक दूसरे से एक वृत्त पाद (९०°) की दूरी पर हैं। (कुमेरू
और सुमेरू के बीच दूरी २ पाद या १८०° की दूरी है)। मेरू में सुर और सिद्ध
निवास करते हैं । तथा और्व या बड़वानल (कुमेरू) में असुर रहते हैं ।
यो यत्र तिष्ठत्यवनीं तलस्था मात्मानमस्या उपरिस्थितञ्च
समन्यतेऽतः कु चतुर्थ संस्था अधश्चते तिर्यंगिता मनन्ति । ११५ ।
पृथ्वी में जो जहां पर है अपने से पृथ्वी को नीचे तथा अपने को ऊपर समझता
है। ९०° की दूरी से लोगों को वह तिरघा मानते हैं ।
अधः शिरस्काः कुजलान्तरस्थाश्छाया मनुष्या इव नीरतीरे ।
अनाकुलास्तिर्यगधः स्थिताश्च तिष्ठन्तिते तत्र वयं यथात्र । ११६ ।
जिस प्रकार जल में छाया नीचे की तरफ दीखती है उसी प्रकार पृथ्वी पर
परस्पर १८०° दूरी पर स्थित मनुष्य अपने को ऊपर और दूसरे को नीचे की तरफ
सिर किये हुये देखते हैं । लेकिन हम लोग जिस प्रकार स्थिर होकर बैठे हैं ।
उसी प्रकार नीचे की दिशा या तिर्यक् दिशा वाले भी ।
भूमेरर्द्धं क्षारसिन्धो रुदक्स्थं जम्बूद्वीपं प्राहुराचार्य वर्याः
उर्ध्वेऽन्यस्मिन् द्वीप षट् कस्य याम्ये क्षार क्षीराद्यम्बुधिना निवेशः । ११७ ।
लवण समुद्र के उत्तर स्थित आधी पृथ्वी को श्रेष्ठ आचार्यों

३०६ सिद्धान्त दर्पण
है । इसके विपरीत पृथ्वी के दक्षिणार्द्ध में ६ द्वीप तथा लवण क्षीर आदि समुद्र
हैं ।
लवण जलधीरादौ दुग्धसिन्धुश्च तस्मा
दमृतमृतरश्मिश्रीश्च यस्माद् वभूव ।
महतचरणपद्मः पद्म जन्मादि देवै र्वसति
सकल वासो वासुदेवश्च यत्र । ११८ ।
पहले लवण तथा उसके बाद क्षीर समुद्र हैं । क्षीर समुद्र से चन्द्र और लक्ष्मी
का जन्म हुआ । इसमें स्वयं वासुदेव निवास करते हैं । जिनके शरीर में सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड है । ब्रह्मा आदि सभी देवता उनकी चरण वन्दना करते हैं ।
दध्नोघृतस्येक्षुरसस्य तस्मान्मद् यस्य च स्वादु जलस्य चान्त्यः
स्वादु द्यकान्तर्वड़वानलौऽसौ पाताल लोकाः पृथिवी पुटानि । ११९ ।
क्षीर के बाद दधि (दही) घृत (घी) गुड़ (ईख का रस), मद्य और अन्त में
पानी का समुद्र क्रमशः अधिक दूरी पर है । इस स्वादु जल समुद्र के भीतर
बड़वानल है । पृथ्वी के गड्ढों को ही पाताल कहा जाता है ।
चञ्चत् फणामणि गणांशुकृत प्रकाशा
एतेषुसासुर गणाः फणिनोवसन्ति ।
दीव्यन्ति दिव्य रमणी रमणीय देहैः
सिद्धाश्च तत्र चलसत् कनका विभासैः । १२० ।
पाताल लोक में असुर और सर्प निवास करते हैं । सर्पों के सिर की मणि
से वह प्रकाशित है । सिद्ध अपने रूप गुण रूपी मणि को धारण कर वहां विचरण
करते हैं । उनके विचरण (या क्रीड़ा) के समय उनके देह के स्वर्ण गहने सदा
चमकते हैं । सिद्ध और दिव्य स्त्रियों के सुन्दर देह गहनों की क्रान्ति से प्रकाशित
हैं ।
शाकं ततः शाल्मलीमत्र क्रौशं क्रौञ्चञ्च गोमेदक (प्लक्ष) पुष्करे च
द्वयोर्द्वयोरन्तरमेक मेकं समुद्रयोर्द्वीप मुदाहरन्ति । १२१ ।
ये सभी सात समुद्र वलयाकार हैं । इनके भीतर ६ द्वीप हैं । द्वीपों के नाम
क्रमशः शाक, शाल्मली, कौश, क्रौञ्च, गोमेदक और पुष्कर, गोमेदक का एक
अन्य नाम प्लक्ष है ।
लंकादेशाद्धिमगिरि रुदग् हेमकूटोऽथ तस्मात्
तस्माञ्चान्यो निषध इति ते सिन्धु पर्यन्त दैर्घ्याः
एवं सिद्धादुद गपि पुरा च्छृंग वच्छृङ्ग नीला
वर्षाण्येषां जगुरिह बुधा अन्तरे द्रोणि देशान् । १२२ ।
लंका से हिमालय उत्तर की तरफ है । उससे उत्तर हेमकूट पर्वत तथा और

भूगोल विवरणम् ३०७
उत्तर निषध पर्वत है । प्रत्येक का विस्तार समुद्र तक है । पुनः सिद्धपुर से उत्तर
क्रमशः श्रृंगवान् शुक्ल और नील पर्वत है । दो दो पर्वतों के बीच में जो वर्ष हैं
उन्हें द्रोणी देश कहते हैं ।
भारत वर्ष मिदं ह्युदगस्मात् किन्नर वर्ष मतो हरिवर्षम्
सिद्धपुराच्च तथा कुरु तस्माद् विद्धि हिरण्मय रम्यक वर्षे । १२३ ।
लंका से उत्तर दिशा में पहले भारतवर्ष तब किन्नर देश तथा उसके बाद हरि
देश है । सिद्ध पुर से उत्तर क्रमशः कुरु, हिरण्मय तथा रम्यक देश हैं ।
माल्यवांश्च यमकोटि पत्तनो द्रोमकाच्च किल गन्धमादनः
नीलशैल निषधावधी च तावन्तराले मनयोरिलावृतम् । १२४ ।
यमकोटि पत्तन से उत्तर की तरफ माल्यवान् तथा रोमक में उत्तर गन्धमादन
पर्वत है । यह दोनों क्रमशः नील और निषध पर्वत तक फैले हुए हैं । इनके बीच
के क्षेत्र को इलावृत्त वर्ष कहा जाता है ।
माल्यवज्जलधि मध्यवर्ती यतत् तु भद्र तुरगं जगुर्बुधाः
गन्धशैल जलराशि मध्यगं केतुमालक भिला कलाविदः । १२५ ।
माल्यवान पर्वत तथा समुद्र के बीच का भाग भद्र तुरग कहलाता है ।
गन्धमादन तथा समुद्र के बीच का क्षेत्र को भूगोल विद लोग केतुमालक देश
कहते हैं ।
निषध नील सुगन्ध समाल्यकै रतमिला वृत्त मावृत मांवभौ
अमरकेरकुलाय समाकुलं रुचिर काञ्चन चित्र महीतलम् । १२६ ।
निषध, नील, गन्धमादन और माल्यवान् इन चार पर्वतों से चार दिशाओं में
घिरा हुआ विस्तृत इलावृत्त देश है । इस देश में देवता घर बनाकर सुख से रहते
हैं । इस देश की मिट्टी सुन्दर और बिचित्र है तथा उसके नीचे स्वर्ण भण्डार है ।
इह हि मेरु गिरिः किल मध्यगः कनक रत्नमयस्त्रिद शालयः
द्रुहिण जन्म कुपद् मज कर्णिकेति च पुराणविदोऽ मुमवर्णमन् । १२७ ।
इसके मध्यभाग में मेरू पर्वत है । इसकी मिट्टी स्वर्णमय है तथा पुराणविदों
के अनुसार यहां देवताओं का निवास है । यह पर्वत ही पृथ्वी रूपी पद्म की
डण्टी (कर्णिका) है जिससे ब्रह्म का जन्म हुआ था ।
विष्कम्भ शैलाः खलु मन्दरोऽस्य सुगन्ध शैला विपुलः सुपार्श्वः
तेषुकमात्सन्ति च केतु वृक्षाः कदम्ब जम्बू वट पिप्पलाख्या । १२८ ।
इस मेरू पर्वत के चार विष्कम्भः (शाखा) पर्वत हैं-मन्दर, (मन्दराचल) सुगन्ध •
(गन्धमादन) विपुल और सुपार्श्व । इनमें क्रमशः कदम्ब, जम्बू (जामुन), वट
तथा पीपल की प्रधानता है ।

३०८ सिद्धान्त दर्पण
जम्बूफलामलगल द्रसतः प्रवृत्ता
जम्बूनदोरसहुते मृदभूत् सुवर्णम् ।
जाम्बूनदं हि तदप सुरसिद्ध संघाः
शाश्वत्पिवन्त्यमृतपान पराङ्मुखास्ते । १२९ ।
पके हुए जम्बू फल के रस गिरने से जम्बू रस की एक नदी बन गयी है ।
जिसके संसर्ग से मिट्टी से सोना बना । इस जम्बू नद का पानी पीने के लिये
देवताओं और सिद्धों का इतना आग्रह है कि वे अमृत पान से भी विमुख हो जाते
हैं ।
वनं तथा चैत्र रथं विचित्रं तेष्वप्सरो नन्दन नन्दनञ्च
धृत्याह्वयं यद् धृतिकृत् सुराणां भ्राजिष्णवैभ्राजमिति प्रसिद्धम् । १३० ।
मेरु के चार विष्कुम्भ पर्वतों के नीचे के भाग में चार वन हैं । प्रसिद्ध हैं-चैत्ररथ
अत्यन्त विचित्र है, नन्दन में अप्सरायें क्रीड़ा करती है, धृति वन देवताओं को धैर्य
देता है । तथा वैभ्राज अत्यन्त रुचिकर है ।
संरास्यथैतेष्वरुणञ्च मानस महाहदं श्वेत जलं यथाक्रमम्
सरत्सुरामा रमणश्रमालसाः सुरा रमन्ते जल के लिलालसाः । १३१ ।
इन चार वनों में चार हृद (झील) हैं- अरुण, मानस, महाह्रद और श्वेत
दल) देव स्त्रियां घूमने से थककर इन्हीं हृदों में जल क्रीड़ा करती हैं ।
सद्रत्नकाञ्चनमयं शिखरत्रयञ्च
मेरौ मुरारिक परारिपुराणि तेषु
तेषामधः शतमखज्वनान्त संख्य
रक्षोऽम्बुपानिल धनेशपुराणि चाष्टौ । १३२ ।
मेरु के पर्वत के तीन शृंग हैं-प्रत्येक रत्न और स्वर्ण से बने हैं । एक पर
विष्णु, दूसरे पर ब्रह्मा और तीसरे पर शिव अपना अपना पुर बनाकर रहते हैं ।
इन चोटियों के नीचे क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, पवन, कुबेर तथा
शिव के नगर हैं ।
विष्णु पदी विष्णुपदा त्यतिता मेरौ चतुर्द्धास्मात्
विष्कुम्भा चल मस्तक शस्तसरः संगता वयता । १३३ ।
विष्णु के पाद से निकल कर गंगा का अवतरण पहले मेरू पर हुआ । उससे
वह चार भागों में विभक्त होकर चार विष्कुम्भ पर्वतों के नीचे के चार हृदों में
मिल कर आगे बढ़ी ।
शीतारूया भद्राश्वं सालकनन्दा च भारतं वर्षम्
वंक्षुश्च केतुमालम् भद्रारूया चोत्तरान कुरुन् याता । १३४ ।
शीता गंगा भद्राश्व देश में, अलकनन्दा (गंगा) भारत वर्ष में वंक्षु गंगा

भूगोल विवरणम् ३०९
केतुमाल में और भद्र गंगा उत्तर कुरु वर्ष में प्रवाहित हुयी ।
या कर्णिता भिलाषिता दृष्टा स्पृष्टावगाहिता पीता
भक्ता स्मृता स्तुतावा पुनाति बहुधापि पापिनः पुरुषान् । १३५ ।
गंगा के द्वारा बहुत प्रकार से पापी पुरुष पवित्र होते हैं । नाम सुनने, पाने
की इच्छा करने से, दर्शन से, स्पर्श से, स्नान से, पानी पीने से, भक्ति करने से,
स्मरण करने या स्तुति करने से ।
याञ्चलिते दलिताखिल बन्धो गच्छति वल्गति तत् पितृसंघः ।
प्राप्त तटे विजितान्तक दुतो याति नरेनिरयात् सुरलोकम् । १३६ ।
गंगा की तरफ प्रयाण करने से ही लोगों का पितृ ऋण का सब बन्धन टूट
जाता है । गंगा तट पर पहुंच ने से ही मनुष्य खुशी से नाच उठता है । (अहा
गंगा तट पर पहुंच गया) यमदूतों को जीत लेता है । जल में प्रवेश करने से नरक
से मुक्ति पाकर स्वर्ग में प्रवेश करता है ।
ऐन्द्रं कशेरुशकलं किल ताम्र पर्णमन्यद् गभस्ति मदथश्वकुमारिकाख्यम् ।
नागञ्च सौम्य वारुण मन्त्यखण्डं गान्धर्व संज्ञमिति भारत वर्ष मध्ये ।१३७।
भारत वर्ष के कई खण्ड हैं- इन्द्र, कशेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, कुमारिका,
नाग, सौम्य, वारुण और गान्धर्व ।
वर्णव्यवस्थितिरिहैव कुमारिकाख्ये
शेषेषु चान्यजजना निवसन्ति सर्वे
माहेन्द्रशुक्ति मलयर्क्षक पारियात्रा सह्यः
सविन्ध्य इह सप्तकुलाचलारूयाः । १३८ ।
कुमारिका खण्ड में ही वर्ण व्यवस्था है । अन्य खन्डों में अन्त्यज (चान्डाल)
प्रायः निवास करते हैं । इस भारत वर्ष में ७ कुलाचल (श्रेष्ठ पर्वत) हैं- महेन्द्र,
शुक्ति, मलय, ऋक्ष, पारियात्र, सह्य और विन्ध्य ।
भूर्लोकाख्यो दक्षिणे व्यक्षदेशात् तस्मात् सौम्योऽयं भुवः स्वश्चमेरु
लभ्यः पुण्यैस्ते महोऽस्माज्जनोऽतोलोभ्योऽ नल्पैस्तैस्तपः सत्यमन्त्यः । १३९ ।
शून्य अक्षांश के स्थान को व्यक्ष (या निरक्ष देश-विषुव रेखा ) कहते हैं ।
विषुव रेखा से दक्षिण का क्षेत्र भूलोक, तथा उत्तर का क्षेत्र भुवलोक कहलाता
है । मेरु (सुमेरु) ही स्वः लोक है । उससे ऊपर महः लोक, जन लोक, तपलोक
तथा अन्त में सत्यलोक है ।
लंकापुरेऽर्कस्य यदोदयः स्यात्तदादिनार्द्धं यमकोटिपुर्याम् ।
अधस्तदा सिद्धपुरेऽस्तकालः स्याद्रोमके रात्रिदलं तदैव । १४० ।
जब लंका में सूर्योदय होता है उस समय यमकोटि नगर में दिनार्द्ध (दो
पहर), लंका के ठीक नीचे सिद्ध पुर में सूर्यास्त तथा रोमक नगर में आधी रात

३१० सिद्धान्त दर्पण
होती है ।
यत्रोदितोऽर्क किल तत्रपूर्वातत्रापरायत्र गतः प्रतिष्ठाम्
तन्मध्यतोऽन्ये च तलोऽखिलानामुदक् स्थितो मेरुरिति प्रसिद्धिः । १४१ ।
सूर्य की उदय दिशा को पूर्व तथा अस्त होने की दिशा को पश्चिम कहते
हैं । पूर्व और पश्चिम के बीच की दोनों दिशायें उत्तर और दक्षिण हैं । इन चार
दिशाओं से अन्य विदिग (कोण दिशाओं) का निर्णय हो सकता है । मेरु (सुमेरू)
सभी के उत्तर में स्थित है ।
अथोज्जयिन्या कुचतुर्थ भागे प्राच्यां दिशिस्यात् यमकोटिरेव
ततश्चपश्चान्नभवेद वन्ती लंकैव तस्याः ककुभिः प्रतीच्यम् । १४२ ।
उज्जयिनी से पृथ्‍वी के १/४ भाग (९०°) पूर्व दिशा में यमकोटि पत्तन है ।
परन्तु इस यमकोटि पत्तन के ठीक पश्चिम में अवन्ति (उज्जयिनी) नहीं हैं । परन्तु
यमकोटि के ठीक पश्चिम में लंका ही है ।
तथैव सर्वत्र यतोहि यत्स्यात् ततस्तन्नभवेत् प्रतीच्यम् ।
निरक्ष देशादितरत्र तस्मात् प्राची प्रतीच्ये च विचित्र संस्थे । १४३ ।
इससे लगता है कि जिस स्थान के पूर्व में जो स्थान है वहां से पहला स्थान
ठीक पश्चिम में नहीं है । यह विचित्र व्यवस्था सिर्फ विषुव वृत्त पर नहीं होती
है ।
निरक्षदेशे क्षतिमण्डलोपगो ध्रुवोनरः पश्यति दक्षिणोत्तरो
तदाश्रितं खे जलयन्त्रवत्तथा भ्रमद् भ चक्रं निजमस्तकोपरि । १४४ ।
विषुववृत्त (निरक्ष देश) में रहने पर मनुष्य अपने दिग वलय में दोनों ध्रुवों
सुमेरू तथा कुमेरु को क्रमशः उत्तर तथा दक्षिण की तरफ देखता है । उसे क्रान्ति
वृत्त अपने सिर के ऊपर आकाश में जलयन्त्र के समान दीखता है ।
उदग् दिशं याति यथा यथानरस्तथा तथा स्यान्नत मृक्ष मण्डलम् ।
उदग् ध्रुवं पश्यति चोन्नतं क्षिते स्तदन्तरे योजन जाः फलांशकाः । १४५ ।
मनुष्य विषुव वृत्त से जैसे जैसे उत्तर की तरफ जाता है, क्रान्ति वृत्त दक्षिण
दिशा में धीरे धीरे नीचे झुकता है, तथा उत्तरी ध्रुव क्षितिज से ऊपर उठता है ।
उत्तरी ध्रुव की उन्नति (या क्रान्ति वृत्त की नति) उतनी ही होती है, जितना विषुव
से उस स्थान की योजनात्मक दूरी का अंशात्मक मान होता है ।
योजना संख्या भांशै (३६०) गुणिता स्वपरिधि हृता भवन्त्यंशाः
भूमौकक्षायां भागेभ्यो योजनानि च व्यस्तम् । १४६ ।
देशान्तर योजन को ३६० से गुणाकर भूपरिधि योजन से भाग देने पर उस
स्थान का अक्षांश होगा । ग्रह कक्षा में भी इसी प्रकार अक्षांश आयेगा । उल्टे

भूगोल विवरणम् ३११
अनुपात से अक्षांश द्वारा विषुव से योजन में दूरी निकाली जा सकती हैं ।
सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये याम्यंञ्चदैत्यानिक मस्तकोर्द्ध्वे
सव्यापसव्यं भ्रमदृक्ष चक्रं विलोक यन्ति क्षितिज प्रसक्तम् । १४७ ।
जिस प्रकार सुमेरू वासी उत्तर ध्रुव को अपने सिर के ऊपर देखते हैं, उसी
प्रकार कुमेरू वासी दक्षिण ध्रुव को । दोनों ध्रुव प्रदेश के लोग क्रान्ति वृत्त को
सव्य दिशा (दाहिने की तरफ) तथा दक्षिण ध्रुव के लोग अपनी अपसव्य (बायीं
तरफ) घूमता हुआ देखते हैं ।
वृद्धि र्विधेरह्नि भुवः समन्तात् स्याद् योजनं भू भव भूतपूर्वै ।
ब्राह्मे लये योजन मात्र वृद्धे र्नाशोभुवःप्राकृतिकेऽ खिलाया । १४८ ।
पृथ्वी से निकले हुए भौतिक पदार्थों के कारण ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) में
इसका आकार चारों तरफ एक योजन (९ कि.मी.) बढ़ जाता है । ब्रह्मा का लय
(रात्रि में) में १ योजन की वृद्धि नष्ट हो जाती है । प्राकृतिक प्रलय में पूरी पृथ्वी
नष्ट हो जाती है ।
दिने दिने यन्म्रियतेहि भूतैः दैनन्दिनं तं प्रलयं वदन्ति
ब्राह्म्यं लयं ब्रह्म दिनान्त काले भूतानि यद् ब्रह्मतनुं ब्रजन्ति । १४९ ।
प्रति दिन प्राणियों का मरना दैनन्दिन प्रलय कहलाता है । ब्रह्म का दिवस
समाप्त होने पर पूरी सृष्टि के देह में लुप्त हो जाती है । उसे ब्राह्म प्रलय कहा जाता
है ।
ब्रह्मात्यये यत् प्रकृति प्रयान्ति सर्वाण्यतः प्राकृतिकं कृतीन्द्राः
लीनान्यतः कर्मपुटान्तरत्वात् पृथक् क्रियन्ते प्रकृते र्विकारैः । १५० ।
ब्रह्मा की आयु समाप्त होने पर सम्पूर्ण सृष्टि प्रकृति में समा जाती है । जिससे
सभी पदार्थों का गुण भेद समाप्त होता है । इसे मीमांसक (कर्मी या कृतीन्द्र)
प्राकृतिक प्रलय कहते हैं । पुनः सृष्टि के समय प्रकृति इनमें कर्म या गुण भेद
उत्पन्न करती हैं ।
ज्ञानाग्नि दग्धाखिल पुण्य पापा मनः समाधायहरौ परेशे
यद् योगिनो यान्त्य निवर्त्ति मन्स्यादात्यन्तिकञ्चेति लयश्चतुर्धा । १५१ ।
योगी अपनी ज्ञान की अग्नि में पुण्य और पाप दोनों को नष्ट अपने मन को
पूरी तरह भगवान में मिला देते हैं । (नष्ट कर देते हैं) तथा वे फिर इस संसार में
आने की इच्छा नहीं करते है । इसे आत्यन्तिक प्रलय कहते हैं । इस प्रकार चार
प्रकार के प्रलय हैं । दैनन्दिन, ब्राह्म, प्राकृतिक आत्यन्तिक ।
भूभूधरत्रिदश दानव मानवाद्या
ये याश्चधिष्ण्य गगने चर चक्र कक्षाः ।

लोक व्यवस्थितिरुपर्युपरिप्रदिष्टा
ब्रह्माण्ड भाण्ड जठरेतदिदं समस्तम् । इति । १५२ ।
इन श्लोकों में पृथ्‍वी, पर्वत, देव, दानव, मानव, नक्षत्र, ग्रह और उनकी
कक्षा, मह, जन, तप आदि एक के ऊपर एक श्लोकों की स्थिति कही गयी । ये
सभी ब्रह्माण्ड के उदर रूपी भाण्ड में ही एक आधार से स्थित हैं । (सिद्धान्त
शिरोमणि का उद्धरण समाप्त) ।
भूव्यासः खख भूप (१६००) योजनमितः सोद् यर्क्षनन्दाग्निभिः (३९२७)
क्षुण्णः खाशुगसूर्य (१२५०) हत् स्वपरिधिः सूक्ष्मोऽपि कक्षावलौ ।
खेटानां भूविलिप्तिकांश घटना सौकर्यहेतो रिह-
व्यासः खाभ्ररसा (६००) हतः कुनव भू (१९१) भक्तो मतो वेष्टनम् । १५३।
पृथ्‍वी का व्यास (१६००) योजन है । इसे (३९२७) से गुणा कर (१२५०) से
भाग देने पर पृथ्‍वी की परिधि का मान आता है । पृथ्‍वी, ग्रह तथा उनकी कक्षा
आदि के व्यास से उनकी परिधि निकालने की एक और सरल विधि है । पृथ्‍वी
(या किसी ग्रह) के व्यास को ६०० से गुणा कर १९१ से भाग देने पर भी उसकी
परिधि होगी ।
तस्याद् योजनसंख्ययाकूपरिधिः षट् पक्षशून्याशुगाः (५०२६)
षष्ट्यंशौ दर्शभिस्ततः (१०) क्षितिकृतैः (४१)
सार्द्धं मयात्रोदिताः (५०२६।१०।४१)
व्यासघ्नः परिधिः कुपृष्ठफलं वाणाष्ट
नागावनी, वेदाग्न द्विरदा (८०,४१,८८५)
स्ततो घनफलं व्यासांग (६) भागाहतेः (२१४४५०२६६६।४०) । १५४ ।
इस विधि से पृथ्‍वी की परिधि (१६०० x ६००) / १९१ = ५०२६ । १० । ४१ योजन है ।
जो मेरा (लेखक का) भी मत है । पृथ्‍वी परिधि को पुनः व्यास से गुणा
करने से पृष्ठफल हुआ ५०२६।१०।४१ x १६०० = ८०,४१,८८५ योजन (वर्ग) इससे
पृथ्‍वी का घनफल (पृष्ठफल x व्यास /६)
हुआ (८०,४१,८८५ x १६००) / ६ = २,१४,४५,०२,६६६ । ४० ।
क्ष्मापृष्ठस्य निरक्षदेशत उदग् भागे स्थलं योजने
बाणाद्रीन्दुशरेषु वाण विधुभि (१५,५५,१७५) स्तोयं मितं चाम्बुधेः
शून्यद्व्यग्नि रसेषु सागर भुजै (२४,५६,३२०) र्याम्ये दले शून्यगे
रामाक्षीषु (५५२३९०) स्थलं ख खाष्टाद्रय ब्धि रामे र्जलम् । १५५ ।

भूगोल विवरणम् ३१३
पृथ्वी के उत्तरार्द्ध में स्थल परिमाण = १५,५५,१७५ योजन
जल ,, = २४,५६,३२० ,,
,, दक्षिणार्द्ध में स्थल ,, = ५५,२३,९० ,,
,, ,, जल ,,, = ३४,७८,००० ,,
सिद्धान्त शिरोमणौ - वृत्त क्षेत्रे परिधिगुणितव्यास पादः फलं तत्
क्षुण्णं वेदैरुपरि परितः कन्दुकस्येव जालम्
गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठजं व्यास निघ्नम्
षड्भिर्भक्तं भवति नियतं गोल गर्भे घनारूयं । इति । १५६ ।
परिधि को व्यास से गुणा कर ४ से भाग देने पर वृत्त का क्षेत्रफल होता है ।
इस वृत्त क्षेत्रफल के ४ से गुणा करने पर वह उस व्यास पर वाले गोत की सतह
का क्षेत्रफल होता है । वर्गाकृति क्षेत्र वाले जाल से लपेटे हुए गेन्द की तरह गोले
का क्षेत्रफल होता है । गोल की सतह के क्षेत्रफल को व्यास से गुणा कर ६ से
भाग देने पर उसका घनफल होता है । प्रतिघन (आकार की वस्तु) में लम्बाई,
चौड़ाई ऊंचाई (या मोटाई) रहती है । एक गोल में कितने घन है, इस घनफल
से पता चलेगा ।
केचिद्वदन्त्यत्र च वेष्टनार्द्धं न्यासं
प्रकल्पस्य भुजाक्षि (२२) घातात्
नगो (७) द् धृता तत् परिधि र्विधेय
स्तद् युग्म घातस्य चतुर्थ भाग । १५७ ।
किसी किसी का (भास्कर आदि का) मत है कि परिधि के अर्द्धभाग के छोरों
के बीच की दूरी को व्यास कहा जाता है । व्यास में २२ से गुणा कर ७ से भाग
देने पर परिधि होती है । परिधि और व्यास के गुणनफल में ४ से भाग देने पर ।
क्षेत्रस्य वृत्तस्य फलं यदेतद् गोलाहृतुल्यस्य ततो द्विनिघ्नम् ।
तद् गोल पृष्ठस्य फलं पुरोक्ता त्यादाधिकं सम्भवतीति तत्र । १५८ ।
वृत्त का क्षेत्रफळ होता है । वृत्त क्षेत्रफल में २ से गुणा करने पर उस वृत्त
पर बने गोलार्द्ध की सतह क्षेत्रफल होता है । यह पूर्वफल से चतुर्थांश अधिक
होता है ।
वक्ष्ये स्फुटं साधनमिष्ट गोलं भचक्र लिप्ता । (२१,६००) सममारंचय्य
त्रिज्या (३४३०) मितंव्यासदलं प्रकल्प्यतद्यात्तद ध्वांधर केन्द्रबिन्दु । १५९ ।
अब स्फुट पृष्ठफल तथा घन फल निकालने की विधि कही जाती है । इष्ट
व्यासार्द्ध का एक गोल तैयार कर उसकी किसी परिधि को २१, ६०० कला में
विभक्त करेंगे । उसके व्यासार्द्ध को त्रिज्या ३४३८ कला मानेंगे । परिधि के ऊपर
और नीचे की दिशा में पृष्ठ के केन्द्र विन्दु को चिह्नित करेंगे ।

३१४ सिद्धान्त दर्पण
निरक्षवृत्तं विलिखेत्तदन्तस्तदूर्ध्वं केन्द्रावधि गोलाकार्द्धे
तत्त्वाश्वि २२५ ) लिप्ता प्रमितानि वृत्तान्यब्धाक्षि (२४)
संख्यानि विलिख्यन्तानि । १६० ।
गोल के मध्यभागमें जो परिधि लिखी गयी है (२१,६०० कला में विभक्त)
वह निरक्ष वृत्त है यह उर्ध्वाधर विन्दुओं के ठीक बीच में हैं। ऊर्ध्व बिन्दु से
विषुव वृत्त तक (९०° की दूरी) प्रति २२५ कला अन्तर पर एक एक वृत्त विषुव
वृत्त के समानान्तर खींचेंगे ।
भवन्ति तस्मिन् वलयाभिधानि क्षेत्राणि तेषां क्रमतो निरक्षात्
व्यासः समानः परिधिः क्रमोनः प्रत्येक मध्यं प्रतिलम्ब जीवाः । १६१ ।
विषुव क्षेत्र और इन २३ अन्य वृत्तों के बीच के वलयाकार क्षेत्रों की संख्या
२३ है। प्रत्येक व प्रक्षेत्र ( वलयाकार क्षेत्र) की मोटाई (व्यास) समान अर्थात्
२२५ कला है । विषुव से ऊपरी तरफ जाने पर वृत्तों की परिधि क्रमशः छोटी
होती जाती है। वलय क्षेत्र की मोटाई (व्यास) का चाप प्रति व प्रक्षेत्र की परिधि
पर लम्बरूप है ।
स्वस्वाक्ष लिप्ताः क्रमतः प्रसाध्याः पुनः पुनस्तत्तु कृत वर्जितायाः
त्रिज्या कृते (११,८,१९,८४४) मूलतया गृहीताः स्थिरीकृताः
स्युश्च परस्परंता । १६२ ।
प्रति स्थान की अक्षज्या निकाल कर उसका वर्ग त्रिज्या के वर्ग से घटाकर
उसका वर्गमूल निकालने से लम्ब ज्या होगी ।
तासां युतिर्दन्तशराक्षिबाणाः षष्ठ्यंशकैरष्ट
गुणैश्च सिद्धैः (५२,५३२।३८।२४)
समं भवेयुः पुनरक्ष पक्ष पक्षा (२२५)
हताश्चक्रकला (२१,६००) निरक्षे । १६३ ।
इन सभी लम्बज्या का योग (५२, ५३२। ३८ । २४) होगा । निरक्ष वृत्त का
क्षेत्रफल (कला में) निकालने के लिये २२५ वलय की चौड़ाई ) तथा २१,६००
(परिधि) में गुणा करेंगे ।
फलं वृहत् क्षेत्रभवं भवन्ति खखाभ्रशून्यांग
गजाब्धिसंख्याः (४८,६०,०००)
तत् संगुणाल्लम्ब गुणैक्यतो यत्
त्रिज्या विभक्तात् फलमेत देव । १६४ ।
इसको (निरक्ष केवलय क्षेत्रफल को) सभी लम्बज्या के योग से गुणा करने
पर (४८,६०,०००) होगा । इस फल को त्रिज्या (३४३८) भाग देने पर

भूगोल विवरणम् ३१५
ख खाष्ट षष्ट्यक्षि कृताद्रि तुल्यं (७,४,२६०, ८००)
स्याद् गोल पृष्ठार्द्ध फलं कलात्म ।
द्विनिघ्न मेतत् सकलं फलं स्यात् (१४,८५,२१,६००)
पृष्ठोद् भवं चक्र कलारूप गोले । १६५ ।
फल (७,४२,६०,८००) गोलार्द्ध के सतह का क्षेत्रफल होगा । इसे २ से गुणा
करने पर गोल के पृष्ठ का क्षेत्रफल (१४,८५,२१,६००) कला में होगा ।
द्विघ्न त्रिज्जीवा (६८७६) गुणितक्षं चक्रलिप्ता समंतद् भवतीह यस्मात्
तद् वेष्टनं व्यासहतैः प्रसिद्धं पृष्ठं फलं तच्चतुरस्र रूपम् । १६६ ।
व्यास (त्रिज्या x २ = ६८७६) तथा परिधि (२१,६०० कला) को गुणा करने
से भी गोल पृष्ठ इतना ही आता है । अतः परिधि और व्यास की लम्बाई चौड़ाई
के चतुर्भुज के समान ही गोल का क्षेत्रफल होता है - ऐसा प्रसिद्ध है ।
प्रत्येक वलयाभिधानं फलानि तद् वद् वृहतः फलेन
निघ्नाञ्च लम्बा त्रिगुणोद्धृतात् स्युस्तद् योगतः पृष्ठफलं तदेव । १६७ ।
वलयाकार क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने के लिये बृहत् वृत्त (विषुव के
वलयक्षेत्र) के क्षेत्रफल को उस वलय की लम्बज्या से गुणा कर त्रिज्या (३४३८)
से भाग देते हैं । इन सभी वलयों का योग भी गोलार्द्ध के पृष्ठ फल के समान
होगा ।
कृत्वा मृत्तिकया सवर्तुल चतुष्कोणौ पृथक् पङ्कौ
तुल्य व्यास तया तयोर्गुरुतयोः स्याद् योऽनुपातः पुनः
तत्पृष्ठच्छदनां शुकंद्वय तुलां जातोऽनुपातश्च य-
स्ताभ्यमुक्त घनारूप पृष्ठजफले बोध्ये हि बालै रपि । १६८ ।
समान व्यास (चौड़ाई) का मिट्टी का गोला तथा चतुष्कोण (समघन ) बनायें ।
उनके वजन के अनुपात के अनुसार ही उनके घनफल का अनुपात होगा जो मापा
जा सकता है । उनको ढंकने में जितना कपड़ा लगेगा । उसका अनुपात निकालें ।
दोनों अनुपातों की समानता से एक बालक को भी स्पष्ट हो जायेगा कि गोल और
घन के क्षेत्र फल का जो अनुपात है, वही अनुपात उनके घनफल का भी होगा ।
मात्रांगुलं वसु (८) यवोदर सम्मितं तै
मुष्टिः कृतै (४) श्वरस (६) मुष्टि भिरेव हस्तः
हस्तैश्चतुर्भिरिह दण्ड उदीरितस्तैः
क्रोशः खखाभ्रः नयनै (२,०००) रथ तद् युगेन । १६९ ।
८ यवों के एक दूसरे के पेट (चौड़ाई) से सटाकर रखने पर जो दूरी होती है
उसे १ अंगुल कहते हैं । ४ अंगुल की एक मुष्टि, तथा ६ मुष्टि का एक हाथ होता
है । ४ हाथ का एक दण्ड, तथा २००० दण्ड का एक कोस होता है ।

३१६ सिद्धान्त दर्पण
गव्यूतिरे तदुभयं किलयोजनं स्यात्
केचित् खभूप गजलोचन (२८,१६०) हस्तमूचुः ।
गच्छत् समांगं कनॄणां खखतर्क बाणैः (५६,००)
क्रोशः पदैर्भवति वेग विलम्ब हीनैः । १७० ।
२ कोस का एक गव्यूति । २ गव्यूति का एक योजन । कोई कोई विद्वान्
(२८, १६०) हाथ का एक योजन मानते हैं । सामान्य उच्चता का व्यक्ति समगति
से चलने पर ५,६०० पग में एक कोस चलता है ।
ज्यार्द्धं ज्योतिर्यथा श्रुतेश्व विहितं लोकेश सूर्यादिभि
र्गव्यूतिर्गदिता त्र योजनमितिक्ष्माकार्दि माने तथा
तस्माद् वास्तव भूमि विस्तृत रसौ खाभ्राष्टभिः (८००) सम्मिता
सेन्दो र्द्विद्विभुजै (२२२) रवेः खखनभः षड् वह्निभिर्योजनैः । १७१ ।
ब्रह्मा सूर्य आदि सिद्धान्तियों ने पूर्ण ज्या के आधे भाग को ही ज्या कहा
है । शास्त्र में पृथ्वी और सूर्य का बिम्बमान समान कहने के साथ साथ गव्यूति
को भी योजन के बराबर कहा गया है । इस गणना के अनुसार पृथ्वी का व्यास
८०० योजन, (१६००/२) चन्द्रका व्यास २२२ योजन (४४४/२) तथा सूर्य का व्यास
३६००० योजन (७२०००/२) ।
शंकुः सूर्य (१२) मितांगुल स्तदुभयं हस्तश्चतुर्भिर्द्धनुः
तैः क्रोशो धनुषां सहस्त्र मितवा स्याद् विष्णु धर्मोत्तरादत्
तस्माद्देश विशेष सिद्ध मितिभि स्तद् योजनैः सम्मताः
पूर्वोक्ता रवि (७२०००) चन्द्र (४४४) भू (१६००)
प्रभृतयः सिद्धास्तुवा विस्तृतः । १७१ ।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार शंकु का मान १२ अंगुल १२ शंकु का एक
हाथ, ४ हाथ का एक धनु तथा १०० धनु का एक कोस । इसके मान के अनुसार
व्यासों का वास्तविक मान इस प्रकार है- रवि व्यास, ७२,००० योजन, चन्द्र
व्यास ४४४ योजन तथा पृथ्वी व्यास १६०० योजन ।
विष्णु धर्मोत्तरे - द्वादशांगुलकः शंकुस्तद्वयञ्च शरःस्मृतः
तच्चतुष्क धनुः प्रोक्तं क्रोशोधनुः सहस्त्रकम् । इति । १७३ ।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण से उद् धृत-१२ अंगुल का एक शंकु, २ शंकु का एक
शर (बाण या हाथ), ४ शर एक धनु तथा १००० धनु का एक कोस होता है ।
उद् बाहोः प्रपदोत्थितस्य पुरुषस्यार्था (५) श हस्तैः ख षड्
भूनागाक्षि (२८,१६०) मितैर्मतंसुमतिभिर्यद् योजनं तैः पुन
त्रिशोनैः कृतनन्द खाग्निभि । ३०९३४० । रिलागोलस्य चेद् वेष्टनं
व्यासो व्याघ्रि शराष्टगोभि (९८४।४५) रुपयाघातात् फलं पृष्ठजम् । १७४ ।

भूगोल विवरणम् ३१७
पैर की उंगली पर खड़ा होकर अपने दोनों हाथ ऊपर उठाने से पुरुष की जो
ऊंचाई होती है उसके १/५ भाग की एक हाथ कहा जाता है । इस मान से २८,
१६० हाथ का एक योजन पण्डितों ने माना है । इस मान के अनुसार ३०९३/४०
योजन पृथ्वी की परिधि तथा ९८४।४५ योजन व्यास होगा ।
नागाष्टाब्धि रसाब्धि खानल (३०,४६,४८८) मितंपञ्चाशताकोटिभिः
स्यादल्पाभ्यधिकैर्धनाभिधफलं गर्भेऽस्यतद् योजनेः (५००००४८४३)
तुल्यं खाशुग (५०) कोटि भिश्छ विकला द्यानां वियोगाद् भवे-
दित्थं भू विततिः कृताथ नभसि ज्योतिः क्रमे विक्ष्यते । १७५ ।
इसके अनुसार पृथ्वी का क्षेत्रफल ३०,४६,४८८ योजन तथा घनफल
५००००४८४३ जिससे अन्तिम अल्पमान घटाने पर प्रायः ५० कोटियोजन पृथ्वी का
घनफल होगा । इस प्रकार पृथ्वी का विवरण समाप्त कर अब मैं आकाश के
ज्योतिर्पिण्डों के बारे में कहूँगा ।
नीलारविन्द सुमिलिन्द कलिन्द जेन्द्र-नीलाम्बुदालि दलिताञ्जन पुञ्ज मञ्जुम
नीलाचलाधर शिरोमुकुटायमानं नीलाम्बुरानु जम जं शरणं ब्रजामः । १७६ ।
नील कमल, श्रेष्ठ भ्रमर, इन्द्रनील मणि, यमुना के नील जल, काजल के
समान काला चमकदार शोभा के साथ नीलाचल शिखर पर मुकुट के समान
शोभित नीलम्बर (बलराम) के अनुज की शरण में जाता हूँ ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
ह्यष्टादशो गत इलाविवृतिः प्रकाशः । १७७ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
एवं दर्शन में समानता तथा बालकों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण में
भूगोल विवरण सहित १८ वां अध्याय समाप्त हुआ ।