सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल विवरणम् ३१५
ख खाष्ट षष्ट्यक्षि कृताद्रि तुल्यं (७,४,२६०, ८००)
स्याद् गोल पृष्ठार्द्ध फलं कलात्म ।
द्विनिघ्न मेतत् सकलं फलं स्यात् (१४,८५,२१,६००)
पृष्ठोद् भवं चक्र कलारूप गोले । १६५ ।
फल (७,४२,६०,८००) गोलार्द्ध के सतह का क्षेत्रफल होगा । इसे २ से गुणा
करने पर गोल के पृष्ठ का क्षेत्रफल (१४,८५,२१,६००) कला में होगा ।
द्विघ्न त्रिज्जीवा (६८७६) गुणितक्षं चक्रलिप्ता समंतद् भवतीह यस्मात्
तद् वेष्टनं व्यासहतैः प्रसिद्धं पृष्ठं फलं तच्चतुरस्र रूपम् । १६६ ।
व्यास (त्रिज्या x २ = ६८७६) तथा परिधि (२१,६०० कला) को गुणा करने
से भी गोल पृष्ठ इतना ही आता है । अतः परिधि और व्यास की लम्बाई चौड़ाई
के चतुर्भुज के समान ही गोल का क्षेत्रफल होता है - ऐसा प्रसिद्ध है ।
प्रत्येक वलयाभिधानं फलानि तद् वद् वृहतः फलेन
निघ्नाञ्च लम्बा त्रिगुणोद्धृतात् स्युस्तद् योगतः पृष्ठफलं तदेव । १६७ ।
वलयाकार क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने के लिये बृहत् वृत्त (विषुव के
वलयक्षेत्र) के क्षेत्रफल को उस वलय की लम्बज्या से गुणा कर त्रिज्या (३४३८)
से भाग देते हैं । इन सभी वलयों का योग भी गोलार्द्ध के पृष्ठ फल के समान
होगा ।
कृत्वा मृत्तिकया सवर्तुल चतुष्कोणौ पृथक् पङ्कौ
तुल्य व्यास तया तयोर्गुरुतयोः स्याद् योऽनुपातः पुनः
तत्पृष्ठच्छदनां शुकंद्वय तुलां जातोऽनुपातश्च य-
स्ताभ्यमुक्त घनारूप पृष्ठजफले बोध्ये हि बालै रपि । १६८ ।
समान व्यास (चौड़ाई) का मिट्टी का गोला तथा चतुष्कोण (समघन ) बनायें ।
उनके वजन के अनुपात के अनुसार ही उनके घनफल का अनुपात होगा जो मापा
जा सकता है । उनको ढंकने में जितना कपड़ा लगेगा । उसका अनुपात निकालें ।
दोनों अनुपातों की समानता से एक बालक को भी स्पष्ट हो जायेगा कि गोल और
घन के क्षेत्र फल का जो अनुपात है, वही अनुपात उनके घनफल का भी होगा ।
मात्रांगुलं वसु (८) यवोदर सम्मितं तै
मुष्टिः कृतै (४) श्वरस (६) मुष्टि भिरेव हस्तः
हस्तैश्चतुर्भिरिह दण्ड उदीरितस्तैः
क्रोशः खखाभ्रः नयनै (२,०००) रथ तद् युगेन । १६९ ।
८ यवों के एक दूसरे के पेट (चौड़ाई) से सटाकर रखने पर जो दूरी होती है
उसे १ अंगुल कहते हैं । ४ अंगुल की एक मुष्टि, तथा ६ मुष्टि का एक हाथ होता
है । ४ हाथ का एक दण्ड, तथा २००० दण्ड का एक कोस होता है ।