सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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गव्यूतिरे तदुभयं किलयोजनं स्यात्
केचित् खभूप गजलोचन (२८,१६०) हस्तमूचुः ।
गच्छत् समांगं कनॄणां खखतर्क बाणैः (५६,००)
क्रोशः पदैर्भवति वेग विलम्ब हीनैः । १७० ।
२ कोस का एक गव्यूति । २ गव्यूति का एक योजन । कोई कोई विद्वान्
(२८, १६०) हाथ का एक योजन मानते हैं । सामान्य उच्चता का व्यक्ति समगति
से चलने पर ५,६०० पग में एक कोस चलता है ।
ज्यार्द्धं ज्योतिर्यथा श्रुतेश्व विहितं लोकेश सूर्यादिभि
र्गव्यूतिर्गदिता त्र योजनमितिक्ष्माकार्दि माने तथा
तस्माद् वास्तव भूमि विस्तृत रसौ खाभ्राष्टभिः (८००) सम्मिता
सेन्दो र्द्विद्विभुजै (२२२) रवेः खखनभः षड् वह्निभिर्योजनैः । १७१ ।
ब्रह्मा सूर्य आदि सिद्धान्तियों ने पूर्ण ज्या के आधे भाग को ही ज्या कहा
है । शास्त्र में पृथ्वी और सूर्य का बिम्बमान समान कहने के साथ साथ गव्यूति
को भी योजन के बराबर कहा गया है । इस गणना के अनुसार पृथ्वी का व्यास
८०० योजन, (१६००/२) चन्द्रका व्यास २२२ योजन (४४४/२) तथा सूर्य का व्यास
३६००० योजन (७२०००/२) ।
शंकुः सूर्य (१२) मितांगुल स्तदुभयं हस्तश्चतुर्भिर्द्धनुः
तैः क्रोशो धनुषां सहस्त्र मितवा स्याद् विष्णु धर्मोत्तरादत्
तस्माद्देश विशेष सिद्ध मितिभि स्तद् योजनैः सम्मताः
पूर्वोक्ता रवि (७२०००) चन्द्र (४४४) भू (१६००)
प्रभृतयः सिद्धास्तुवा विस्तृतः । १७१ ।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार शंकु का मान १२ अंगुल १२ शंकु का एक
हाथ, ४ हाथ का एक धनु तथा १०० धनु का एक कोस । इसके मान के अनुसार
व्यासों का वास्तविक मान इस प्रकार है- रवि व्यास, ७२,००० योजन, चन्द्र
व्यास ४४४ योजन तथा पृथ्वी व्यास १६०० योजन ।
विष्णु धर्मोत्तरे - द्वादशांगुलकः शंकुस्तद्वयञ्च शरःस्मृतः
तच्चतुष्क धनुः प्रोक्तं क्रोशोधनुः सहस्त्रकम् । इति । १७३ ।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण से उद् धृत-१२ अंगुल का एक शंकु, २ शंकु का एक
शर (बाण या हाथ), ४ शर एक धनु तथा १००० धनु का एक कोस होता है ।
उद् बाहोः प्रपदोत्थितस्य पुरुषस्यार्था (५) श हस्तैः ख षड्
भूनागाक्षि (२८,१६०) मितैर्मतंसुमतिभिर्यद् योजनं तैः पुन
त्रिशोनैः कृतनन्द खाग्निभि । ३०९३४० । रिलागोलस्य चेद् वेष्टनं
व्यासो व्याघ्रि शराष्टगोभि (९८४।४५) रुपयाघातात् फलं पृष्ठजम् । १७४ ।