सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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निरक्षवृत्तं विलिखेत्तदन्तस्तदूर्ध्वं केन्द्रावधि गोलाकार्द्धे
तत्त्वाश्वि २२५ ) लिप्ता प्रमितानि वृत्तान्यब्धाक्षि (२४)
संख्यानि विलिख्यन्तानि । १६० ।
गोल के मध्यभागमें जो परिधि लिखी गयी है (२१,६०० कला में विभक्त)
वह निरक्ष वृत्त है यह उर्ध्वाधर विन्दुओं के ठीक बीच में हैं। ऊर्ध्व बिन्दु से
विषुव वृत्त तक (९०° की दूरी) प्रति २२५ कला अन्तर पर एक एक वृत्त विषुव
वृत्त के समानान्तर खींचेंगे ।
भवन्ति तस्मिन् वलयाभिधानि क्षेत्राणि तेषां क्रमतो निरक्षात्
व्यासः समानः परिधिः क्रमोनः प्रत्येक मध्यं प्रतिलम्ब जीवाः । १६१ ।
विषुव क्षेत्र और इन २३ अन्य वृत्तों के बीच के वलयाकार क्षेत्रों की संख्या
२३ है। प्रत्येक व प्रक्षेत्र ( वलयाकार क्षेत्र) की मोटाई (व्यास) समान अर्थात्
२२५ कला है । विषुव से ऊपरी तरफ जाने पर वृत्तों की परिधि क्रमशः छोटी
होती जाती है। वलय क्षेत्र की मोटाई (व्यास) का चाप प्रति व प्रक्षेत्र की परिधि
पर लम्बरूप है ।
स्वस्वाक्ष लिप्ताः क्रमतः प्रसाध्याः पुनः पुनस्तत्तु कृत वर्जितायाः
त्रिज्या कृते (११,८,१९,८४४) मूलतया गृहीताः स्थिरीकृताः
स्युश्च परस्परंता । १६२ ।
प्रति स्थान की अक्षज्या निकाल कर उसका वर्ग त्रिज्या के वर्ग से घटाकर
उसका वर्गमूल निकालने से लम्ब ज्या होगी ।
तासां युतिर्दन्तशराक्षिबाणाः षष्ठ्यंशकैरष्ट
गुणैश्च सिद्धैः (५२,५३२।३८।२४)
समं भवेयुः पुनरक्ष पक्ष पक्षा (२२५)
हताश्चक्रकला (२१,६००) निरक्षे । १६३ ।
इन सभी लम्बज्या का योग (५२, ५३२। ३८ । २४) होगा । निरक्ष वृत्त का
क्षेत्रफल (कला में) निकालने के लिये २२५ वलय की चौड़ाई ) तथा २१,६००
(परिधि) में गुणा करेंगे ।
फलं वृहत् क्षेत्रभवं भवन्ति खखाभ्रशून्यांग
गजाब्धिसंख्याः (४८,६०,०००)
तत् संगुणाल्लम्ब गुणैक्यतो यत्
त्रिज्या विभक्तात् फलमेत देव । १६४ ।
इसको (निरक्ष केवलय क्षेत्रफल को) सभी लम्बज्या के योग से गुणा करने
पर (४८,६०,०००) होगा । इस फल को त्रिज्या (३४३८) भाग देने पर