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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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भूगोल विवरणम् ३१३
पृथ्वी के उत्तरार्द्ध में स्थल परिमाण = १५,५५,१७५ योजन
जल ,, = २४,५६,३२० ,,
,, दक्षिणार्द्ध में स्थल ,, = ५५,२३,९० ,,
,, ,, जल ,,, = ३४,७८,००० ,,
सिद्धान्त शिरोमणौ - वृत्त क्षेत्रे परिधिगुणितव्यास पादः फलं तत्
क्षुण्णं वेदैरुपरि परितः कन्दुकस्येव जालम्
गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठजं व्यास निघ्नम्
षड्भिर्भक्तं भवति नियतं गोल गर्भे घनारूयं । इति । १५६ ।
परिधि को व्यास से गुणा कर ४ से भाग देने पर वृत्त का क्षेत्रफल होता है ।
इस वृत्त क्षेत्रफल के ४ से गुणा करने पर वह उस व्यास पर वाले गोत की सतह
का क्षेत्रफल होता है । वर्गाकृति क्षेत्र वाले जाल से लपेटे हुए गेन्द की तरह गोले
का क्षेत्रफल होता है । गोल की सतह के क्षेत्रफल को व्यास से गुणा कर ६ से
भाग देने पर उसका घनफल होता है । प्रतिघन (आकार की वस्तु) में लम्बाई,
चौड़ाई ऊंचाई (या मोटाई) रहती है । एक गोल में कितने घन है, इस घनफल
से पता चलेगा ।
केचिद्वदन्त्यत्र च वेष्टनार्द्धं न्यासं
प्रकल्पस्य भुजाक्षि (२२) घातात्
नगो (७) द् धृता तत् परिधि र्विधेय
स्तद् युग्म घातस्य चतुर्थ भाग । १५७ ।
किसी किसी का (भास्कर आदि का) मत है कि परिधि के अर्द्धभाग के छोरों
के बीच की दूरी को व्यास कहा जाता है । व्यास में २२ से गुणा कर ७ से भाग
देने पर परिधि होती है । परिधि और व्यास के गुणनफल में ४ से भाग देने पर ।
क्षेत्रस्य वृत्तस्य फलं यदेतद् गोलाहृतुल्यस्य ततो द्विनिघ्नम् ।
तद् गोल पृष्ठस्य फलं पुरोक्ता त्यादाधिकं सम्भवतीति तत्र । १५८ ।
वृत्त का क्षेत्रफळ होता है । वृत्त क्षेत्रफल में २ से गुणा करने पर उस वृत्त
पर बने गोलार्द्ध की सतह क्षेत्रफल होता है । यह पूर्वफल से चतुर्थांश अधिक
होता है ।
वक्ष्ये स्फुटं साधनमिष्ट गोलं भचक्र लिप्ता । (२१,६००) सममारंचय्य
त्रिज्या (३४३०) मितंव्यासदलं प्रकल्प्यतद्यात्तद ध्वांधर केन्द्रबिन्दु । १५९ ।
अब स्फुट पृष्ठफल तथा घन फल निकालने की विधि कही जाती है । इष्ट
व्यासार्द्ध का एक गोल तैयार कर उसकी किसी परिधि को २१, ६०० कला में
विभक्त करेंगे । उसके व्यासार्द्ध को त्रिज्या ३४३८ कला मानेंगे । परिधि के ऊपर
और नीचे की दिशा में पृष्ठ के केन्द्र विन्दु को चिह्नित करेंगे ।