सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल विवरणम् ३०९
केतुमाल में और भद्र गंगा उत्तर कुरु वर्ष में प्रवाहित हुयी ।
या कर्णिता भिलाषिता दृष्टा स्पृष्टावगाहिता पीता
भक्ता स्मृता स्तुतावा पुनाति बहुधापि पापिनः पुरुषान् । १३५ ।
गंगा के द्वारा बहुत प्रकार से पापी पुरुष पवित्र होते हैं । नाम सुनने, पाने
की इच्छा करने से, दर्शन से, स्पर्श से, स्नान से, पानी पीने से, भक्ति करने से,
स्मरण करने या स्तुति करने से ।
याञ्चलिते दलिताखिल बन्धो गच्छति वल्गति तत् पितृसंघः ।
प्राप्त तटे विजितान्तक दुतो याति नरेनिरयात् सुरलोकम् । १३६ ।
गंगा की तरफ प्रयाण करने से ही लोगों का पितृ ऋण का सब बन्धन टूट
जाता है । गंगा तट पर पहुंच ने से ही मनुष्य खुशी से नाच उठता है । (अहा
गंगा तट पर पहुंच गया) यमदूतों को जीत लेता है । जल में प्रवेश करने से नरक
से मुक्ति पाकर स्वर्ग में प्रवेश करता है ।
ऐन्द्रं कशेरुशकलं किल ताम्र पर्णमन्यद् गभस्ति मदथश्वकुमारिकाख्यम् ।
नागञ्च सौम्य वारुण मन्त्यखण्डं गान्धर्व संज्ञमिति भारत वर्ष मध्ये ।१३७।
भारत वर्ष के कई खण्ड हैं- इन्द्र, कशेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, कुमारिका,
नाग, सौम्य, वारुण और गान्धर्व ।
वर्णव्यवस्थितिरिहैव कुमारिकाख्ये
शेषेषु चान्यजजना निवसन्ति सर्वे
माहेन्द्रशुक्ति मलयर्क्षक पारियात्रा सह्यः
सविन्ध्य इह सप्तकुलाचलारूयाः । १३८ ।
कुमारिका खण्ड में ही वर्ण व्यवस्था है । अन्य खन्डों में अन्त्यज (चान्डाल)
प्रायः निवास करते हैं । इस भारत वर्ष में ७ कुलाचल (श्रेष्ठ पर्वत) हैं- महेन्द्र,
शुक्ति, मलय, ऋक्ष, पारियात्र, सह्य और विन्ध्य ।
भूर्लोकाख्यो दक्षिणे व्यक्षदेशात् तस्मात् सौम्योऽयं भुवः स्वश्चमेरु
लभ्यः पुण्यैस्ते महोऽस्माज्जनोऽतोलोभ्योऽ नल्पैस्तैस्तपः सत्यमन्त्यः । १३९ ।
शून्य अक्षांश के स्थान को व्यक्ष (या निरक्ष देश-विषुव रेखा ) कहते हैं ।
विषुव रेखा से दक्षिण का क्षेत्र भूलोक, तथा उत्तर का क्षेत्र भुवलोक कहलाता
है । मेरु (सुमेरु) ही स्वः लोक है । उससे ऊपर महः लोक, जन लोक, तपलोक
तथा अन्त में सत्यलोक है ।
लंकापुरेऽर्कस्य यदोदयः स्यात्तदादिनार्द्धं यमकोटिपुर्याम् ।
अधस्तदा सिद्धपुरेऽस्तकालः स्याद्रोमके रात्रिदलं तदैव । १४० ।
जब लंका में सूर्योदय होता है उस समय यमकोटि नगर में दिनार्द्ध (दो
पहर), लंका के ठीक नीचे सिद्ध पुर में सूर्यास्त तथा रोमक नगर में आधी रात