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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

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३१० सिद्धान्त दर्पण
होती है ।
यत्रोदितोऽर्क किल तत्रपूर्वातत्रापरायत्र गतः प्रतिष्ठाम्
तन्मध्यतोऽन्ये च तलोऽखिलानामुदक् स्थितो मेरुरिति प्रसिद्धिः । १४१ ।
सूर्य की उदय दिशा को पूर्व तथा अस्त होने की दिशा को पश्चिम कहते
हैं । पूर्व और पश्चिम के बीच की दोनों दिशायें उत्तर और दक्षिण हैं । इन चार
दिशाओं से अन्य विदिग (कोण दिशाओं) का निर्णय हो सकता है । मेरु (सुमेरू)
सभी के उत्तर में स्थित है ।
अथोज्जयिन्या कुचतुर्थ भागे प्राच्यां दिशिस्यात् यमकोटिरेव
ततश्चपश्चान्नभवेद वन्ती लंकैव तस्याः ककुभिः प्रतीच्यम् । १४२ ।
उज्जयिनी से पृथ्‍वी के १/४ भाग (९०°) पूर्व दिशा में यमकोटि पत्तन है ।
परन्तु इस यमकोटि पत्तन के ठीक पश्चिम में अवन्ति (उज्जयिनी) नहीं हैं । परन्तु
यमकोटि के ठीक पश्चिम में लंका ही है ।
तथैव सर्वत्र यतोहि यत्स्यात् ततस्तन्नभवेत् प्रतीच्यम् ।
निरक्ष देशादितरत्र तस्मात् प्राची प्रतीच्ये च विचित्र संस्थे । १४३ ।
इससे लगता है कि जिस स्थान के पूर्व में जो स्थान है वहां से पहला स्थान
ठीक पश्चिम में नहीं है । यह विचित्र व्यवस्था सिर्फ विषुव वृत्त पर नहीं होती
है ।
निरक्षदेशे क्षतिमण्डलोपगो ध्रुवोनरः पश्यति दक्षिणोत्तरो
तदाश्रितं खे जलयन्त्रवत्तथा भ्रमद् भ चक्रं निजमस्तकोपरि । १४४ ।
विषुववृत्त (निरक्ष देश) में रहने पर मनुष्य अपने दिग वलय में दोनों ध्रुवों
सुमेरू तथा कुमेरु को क्रमशः उत्तर तथा दक्षिण की तरफ देखता है । उसे क्रान्ति
वृत्त अपने सिर के ऊपर आकाश में जलयन्त्र के समान दीखता है ।
उदग् दिशं याति यथा यथानरस्तथा तथा स्यान्नत मृक्ष मण्डलम् ।
उदग् ध्रुवं पश्यति चोन्नतं क्षिते स्तदन्तरे योजन जाः फलांशकाः । १४५ ।
मनुष्य विषुव वृत्त से जैसे जैसे उत्तर की तरफ जाता है, क्रान्ति वृत्त दक्षिण
दिशा में धीरे धीरे नीचे झुकता है, तथा उत्तरी ध्रुव क्षितिज से ऊपर उठता है ।
उत्तरी ध्रुव की उन्नति (या क्रान्ति वृत्त की नति) उतनी ही होती है, जितना विषुव
से उस स्थान की योजनात्मक दूरी का अंशात्मक मान होता है ।
योजना संख्या भांशै (३६०) गुणिता स्वपरिधि हृता भवन्त्यंशाः
भूमौकक्षायां भागेभ्यो योजनानि च व्यस्तम् । १४६ ।
देशान्तर योजन को ३६० से गुणाकर भूपरिधि योजन से भाग देने पर उस
स्थान का अक्षांश होगा । ग्रह कक्षा में भी इसी प्रकार अक्षांश आयेगा । उल्टे