सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल विवरणम् ३११
अनुपात से अक्षांश द्वारा विषुव से योजन में दूरी निकाली जा सकती हैं ।
सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये याम्यंञ्चदैत्यानिक मस्तकोर्द्ध्वे
सव्यापसव्यं भ्रमदृक्ष चक्रं विलोक यन्ति क्षितिज प्रसक्तम् । १४७ ।
जिस प्रकार सुमेरू वासी उत्तर ध्रुव को अपने सिर के ऊपर देखते हैं, उसी
प्रकार कुमेरू वासी दक्षिण ध्रुव को । दोनों ध्रुव प्रदेश के लोग क्रान्ति वृत्त को
सव्य दिशा (दाहिने की तरफ) तथा दक्षिण ध्रुव के लोग अपनी अपसव्य (बायीं
तरफ) घूमता हुआ देखते हैं ।
वृद्धि र्विधेरह्नि भुवः समन्तात् स्याद् योजनं भू भव भूतपूर्वै ।
ब्राह्मे लये योजन मात्र वृद्धे र्नाशोभुवःप्राकृतिकेऽ खिलाया । १४८ ।
पृथ्वी से निकले हुए भौतिक पदार्थों के कारण ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) में
इसका आकार चारों तरफ एक योजन (९ कि.मी.) बढ़ जाता है । ब्रह्मा का लय
(रात्रि में) में १ योजन की वृद्धि नष्ट हो जाती है । प्राकृतिक प्रलय में पूरी पृथ्वी
नष्ट हो जाती है ।
दिने दिने यन्म्रियतेहि भूतैः दैनन्दिनं तं प्रलयं वदन्ति
ब्राह्म्यं लयं ब्रह्म दिनान्त काले भूतानि यद् ब्रह्मतनुं ब्रजन्ति । १४९ ।
प्रति दिन प्राणियों का मरना दैनन्दिन प्रलय कहलाता है । ब्रह्म का दिवस
समाप्त होने पर पूरी सृष्टि के देह में लुप्त हो जाती है । उसे ब्राह्म प्रलय कहा जाता
है ।
ब्रह्मात्यये यत् प्रकृति प्रयान्ति सर्वाण्यतः प्राकृतिकं कृतीन्द्राः
लीनान्यतः कर्मपुटान्तरत्वात् पृथक् क्रियन्ते प्रकृते र्विकारैः । १५० ।
ब्रह्मा की आयु समाप्त होने पर सम्पूर्ण सृष्टि प्रकृति में समा जाती है । जिससे
सभी पदार्थों का गुण भेद समाप्त होता है । इसे मीमांसक (कर्मी या कृतीन्द्र)
प्राकृतिक प्रलय कहते हैं । पुनः सृष्टि के समय प्रकृति इनमें कर्म या गुण भेद
उत्पन्न करती हैं ।
ज्ञानाग्नि दग्धाखिल पुण्य पापा मनः समाधायहरौ परेशे
यद् योगिनो यान्त्य निवर्त्ति मन्स्यादात्यन्तिकञ्चेति लयश्चतुर्धा । १५१ ।
योगी अपनी ज्ञान की अग्नि में पुण्य और पाप दोनों को नष्ट अपने मन को
पूरी तरह भगवान में मिला देते हैं । (नष्ट कर देते हैं) तथा वे फिर इस संसार में
आने की इच्छा नहीं करते है । इसे आत्यन्तिक प्रलय कहते हैं । इस प्रकार चार
प्रकार के प्रलय हैं । दैनन्दिन, ब्राह्म, प्राकृतिक आत्यन्तिक ।
भूभूधरत्रिदश दानव मानवाद्या
ये याश्चधिष्ण्य गगने चर चक्र कक्षाः ।