सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

भूगोल विवरणम् ३११
अनुपात से अक्षांश द्वारा विषुव से योजन में दूरी निकाली जा सकती हैं ।
सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये याम्यंञ्चदैत्यानिक मस्तकोर्द्ध्वे
सव्यापसव्यं भ्रमदृक्ष चक्रं विलोक यन्ति क्षितिज प्रसक्तम् । १४७ ।
जिस प्रकार सुमेरू वासी उत्तर ध्रुव को अपने सिर के ऊपर देखते हैं, उसी
प्रकार कुमेरू वासी दक्षिण ध्रुव को । दोनों ध्रुव प्रदेश के लोग क्रान्ति वृत्त को
सव्य दिशा (दाहिने की तरफ) तथा दक्षिण ध्रुव के लोग अपनी अपसव्य (बायीं
तरफ) घूमता हुआ देखते हैं ।
वृद्धि र्विधेरह्नि भुवः समन्तात् स्याद् योजनं भू भव भूतपूर्वै ।
ब्राह्मे लये योजन मात्र वृद्धे र्नाशोभुवःप्राकृतिकेऽ खिलाया । १४८ ।
पृथ्वी से निकले हुए भौतिक पदार्थों के कारण ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) में
इसका आकार चारों तरफ एक योजन (९ कि.मी.) बढ़ जाता है । ब्रह्मा का लय
(रात्रि में) में १ योजन की वृद्धि नष्ट हो जाती है । प्राकृतिक प्रलय में पूरी पृथ्वी
नष्ट हो जाती है ।
दिने दिने यन्म्रियतेहि भूतैः दैनन्दिनं तं प्रलयं वदन्ति
ब्राह्म्यं लयं ब्रह्म दिनान्त काले भूतानि यद् ब्रह्मतनुं ब्रजन्ति । १४९ ।
प्रति दिन प्राणियों का मरना दैनन्दिन प्रलय कहलाता है । ब्रह्म का दिवस
समाप्त होने पर पूरी सृष्टि के देह में लुप्त हो जाती है । उसे ब्राह्म प्रलय कहा जाता
है ।
ब्रह्मात्यये यत् प्रकृति प्रयान्ति सर्वाण्यतः प्राकृतिकं कृतीन्द्राः
लीनान्यतः कर्मपुटान्तरत्वात् पृथक् क्रियन्ते प्रकृते र्विकारैः । १५० ।
ब्रह्मा की आयु समाप्त होने पर सम्पूर्ण सृष्टि प्रकृति में समा जाती है । जिससे
सभी पदार्थों का गुण भेद समाप्त होता है । इसे मीमांसक (कर्मी या कृतीन्द्र)
प्राकृतिक प्रलय कहते हैं । पुनः सृष्टि के समय प्रकृति इनमें कर्म या गुण भेद
उत्पन्न करती हैं ।
ज्ञानाग्नि दग्धाखिल पुण्य पापा मनः समाधायहरौ परेशे
यद् योगिनो यान्त्य निवर्त्ति मन्स्यादात्यन्तिकञ्चेति लयश्चतुर्धा । १५१ ।
योगी अपनी ज्ञान की अग्नि में पुण्य और पाप दोनों को नष्ट अपने मन को
पूरी तरह भगवान में मिला देते हैं । (नष्ट कर देते हैं) तथा वे फिर इस संसार में
आने की इच्छा नहीं करते है । इसे आत्यन्तिक प्रलय कहते हैं । इस प्रकार चार
प्रकार के प्रलय हैं । दैनन्दिन, ब्राह्म, प्राकृतिक आत्यन्तिक ।
भूभूधरत्रिदश दानव मानवाद्या
ये याश्चधिष्ण्य गगने चर चक्र कक्षाः ।