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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

प्रश्न वर्णनम् २५७
वाला होता है । नास्तिक (वैदिक विरोधी) -
यदवदन्नद उत्तर मस्ति किं
शशि तनावसितं किमुतेक्ष्यते
किम समाधिमता मपि मोक्षदं
यदनुगेः सुलभं परमं पदम् । ७८ ।
ऐसा कहते है क्या इसका उत्तर आप दे सकते हैं ? चन्द्र में कलंक क्यों
दीखता है ? ब्रह्म लीन लोगों को जिस प्रकार मोक्ष मिलता है, क्या समाधि हीन
को भी वह मिल सकता है ?
श्रम मृते कलयन्ति कथं जना
स्थिति मुखांग मतीत मनागतम् ।
कथय सर्व मिदं यदवेत्यमे
भ्रमचयः शममेष्यति दुर्दमः । ७९ ।
लोक बिना परिश्रम के किस प्रकार अतीत तथा भविष्यत की तिथि नक्षत्र
आदि पञ्चांग गणना कर सकें इसकी विधि बताये । इन सभी प्रश्नों का उत्तर
आपसे सुनने पर मेरा घोर संदेह दूर हो जायेगा ।
जलजनाभि विभूषण विग्रहे
जलज सम्भव राजदनुग्रह
जलजना जनिकारण दर्शनो
जलजनाभर भीति करोऽस्तुनः । ८० ।
जलज (कमल) फल की माला से जिनका सर्वांग शोभित है, जिनके नाभि
कमल से उत्पन्न ब्रह्म पर उनकी विशेष कृपा है, जिनके दर्शन मात्र से (अथवा
सुदर्शन चक्र से) ग्रह की मुक्ति हुयी, वही पद्म नाम (जगन्नाथ) हमारा भय दूर
करें ।
इत्युत्कलोञ्ज्वल नृपाल कुल प्रसूतः
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
प्रश्नान्वितो व्यरचि षोड़शकः प्रकाशः । ८१ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्र शेखर द्वारा गणना
और दर्शन में समानता तथा बलाकों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
प्रश्नों से भरा हुआ १६ वां अध्याय समाप्त हुआ ।

सप्त दशः प्रकाशः
भूगोलस्थिति वर्णनम्
सच्छास्त्र गुच्छात्कतिचित् विशेषान् सच्छास्त्र पृच्छाच्छलतः प्रदर्श्य
तत्सार भूतोत्तर मार्य वाचा यच्छामि वत्सावहितः सकृत्याः । १ ।
उत्तम शिष्य प्रश्न के छल से (बहाना से) अनेक शास्त्रों के विशिष्ट विषयों
की चर्चा कर उन सभी का सार उत्तर संस्कृत भाषा में देने के लिए मैं प्रयत्न कर
रहा हूँ । हे वत्स (शिष्य), तुम ध्यान दे कर सुनो ।
प्रत्यक्ष शब्दानुमिति प्रमाणै व्यवस्थया च स्थिरता स्थिरायाः ।
(परपक्ष निग्रह पूर्वक स्वपक्ष स्थापनेन यथोक्त कथनं नामं व्यवस्था)
अहस्कारादेश्चलता खिलाना गोलं कृतत्वं प्रति पा दनेऽ त्रं । २ ।
(टिप्पणी- प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं । (१) प्रत्यक्ष- देखकर मानना तथा
२. शब्द-वेद और आप्त वचन मानकर चलना (३) अनुमान कार्यकारण सम्बन्ध
द्वारा निष्कर्ष निकालना । व्यवस्था-विपक्ष युक्ति का खण्डन कर अपना पक्ष
स्थापित करना) ।
मैं अब पृथ्वी का अचलत्व तथा सूर्य आदि ग्रहों का गतिशील होना तथा
गोल आकार की (व्यवस्था का प्रमाण प्रत्यक्ष, शब्द और अनुमान द्वारा कर रहा
हूँ ।
भूगोलः सौम्य शुक्रावनितनय सुराचार्य सूर्यात्मजानाम्
कक्षावृत्तै वृत्तस्या स्फुट दिवसकृतः कक्षयावेष्टितोऽयम् ।
मध्ये मध्यर्कस्य दूरेऽन्ति के च स्फुट रविभगणर्क्षेश कक्षा परो तः
तिष्ठत्खण्डस्य मध्ये न भसि किल सदाधारशून्यः स्वशक्त्या । ३ ।
बुध, शुक्र, मंगल, गुरु और शनि इन पांच तारा ग्रहों की कक्षा के केन्द्र में
सूर्य है । किन्तु यह सूर्य स्फुट नहीं, मध्यम सूर्य है । इस मध्यम सूर्य की कक्षा
केन्द्र में पृथ्वी है । मध्यम सूर्य कभी पृथ्वी के निकट और कभी दूर रहता है ।
ब्रह्माण्ड के मध्य में पृथ्वी आधार शून्य होकर अपनी शक्ति से स्थित है । पृथ्वी
को स्फुट रवि, नक्षत्र समूह तथा चन्द्र की कक्षा घेरे हुए हैं ।
सिद्धान्त शिरोमणौ - सर्वतः पर्वताराम ग्राम चैत्य चयैश्चितः ।
कदम्बकुसुमग्रन्थिः केसर प्रकरैरिव । इति । ४ ।
पृथ्वी पर पर्वत, बगीचा, ग्राम, ईटा का चबूतरा या स्तूपआदि व्याप्त हैं जिस
प्रकार कदम्ब के फूल में केसर कण व्याप्त रहते हैं ।
ममायमेव सिद्धान्ते मतान्तर विधायकान्
काश्चित् प्रत्युत्तरं यच्छन्निमं कुर्वे सुनिश्चितम् । ५ ।

भूगोलस्थिति वर्णनम् २५९
मेरा यही सिद्धान्त है (अर्थात् ब्रह्माण्ड मध्य में पृथ्वी आधार शून्य है जिसके
चारों तरफ सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र कक्षा है, तथा पृथ्वी और सभी ग्रहों का आकार
गोल है) जिनका इससे भिन्न मत है उनके प्रश्नों का उत्तर देकर मैं अपना मत
सिद्ध करना चाहता हूँ ।
सूर्य सिद्धान्ते-मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति
विभ्राणः परमां शक्ति ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् । इति । ६ ।
आकाश में ब्रह्माण्ड के मध्य में पृथ्वी सब तरफ से स्थिर होकर स्थित है ।
ब्रह्मा द्वारा प्राप्त धारिणी शक्ति द्वारा स्वयं को धर रखने के कारण पृथ्वी को धारिणी
कहते हैं ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मूर्ती धर्त्ता चेद्धरित्र्य स्तदन्य-
स्तस्याप्यन्योऽस्यैव मत्रानवस्था ।
अन्त्ये कल्प्या चेन्न शक्तिः किमाद्ये ।
किं तो भूमिः साष्ट मूर्त्ते श्च मूर्तिः । इति । ७ ।
पृथ्वी का धारक किसी अन्य को मानने पर फिर उसका धारक तीसरे को,
तीसरे का चौथा और इस प्रकार क्रम की समाप्ति नहीं होगी । तथा पुनः अन्त में
एक अमूर्त शक्ति को ही धारक मानना होगा । इस दोष को दूर करने के लिए
आरम्भ में ही इस शक्ति को पृथ्वी का धारक मान ले तो क्या हानि है ? पृथ्वी
क्या अष्टमूर्ति धारी भगवान् की मूर्ति नहीं है ।
कूर्मादीनांमतो भूमेर्यत्किञ्चित् खण्ड धारणात्
संगच्छते धारकत्वं न तु कृत्स्न महीधृतेः । ८ ।
कूर्म आदि अवतारों ने पृथ्वी को धारण किया था । इसका अर्थ है कि उन्होंने
पृथ्वी के कुछ अंश का ही धारण किया था पूरी पृथ्वी को नहीं ।
भू धृताः पर्वता यद् वद् भूधरा इति कीर्तिताः
तथा धारत्व मेतेषां उक्तं भूस्थायिनामपि । ९ ।
पर्वत भी इसी प्रकार पृथ्वी के एक अंश को धारण करने के कारण भूधर कह
लाते हैं । इसी प्रकार का धारत्व कूर्मादि अवतारों का (अंश धारण ) था जिससे
उनका नाम भूस्थायी आदि हैं ।
भू भार खिन्न नागेन्द्र शीर्ष विश्राम सम्भव
भूकम्प इति यद वाक्यं तत्क्वचित् खण्ड धारणात् । १० ।
पृथ्वी के भार से थक जाने पर वासुकी नाग अपना सिर नीचे कर विश्राम
करते हैं जिससे भूमि कम्प होता है इस वाक्य का अर्थ भी भी पूरी पृथ्वी का
धारण करना नहीं है, पृथ्वी के एक अंश को ही वासुकी धारण करते हैं ।

२६० सिद्धान्त दर्पण
समाधेयं हि भूगोले लोका दृष्ट वशात् क्वचित्
अंगस्फुरणवत् कम्पो जातोऽग्न्युप चर्यते । ११ ।
यदि वासुकी आदि पृथ्वी के एक ही भाग को धारण करते हैं तो पृथ्वी के
हर भाग में भूकम्प क्यों आता है, इसका समाधान है कि शरीर के किसी भी अंग
में स्फुरण होने पर पूरा शरीर हिल जाता है । इसी प्रकार पृथ्वी के किसी एक
भाग में कम्पन होने पर वह अन्य स्थानों में भी फैल जाता है ।
यथा स्वमध्यं प्रति सन्निकृष्ट माकृष्टमाणं (द्रव्यम्) परमाणु भूम्नः ।
क्रमेण वेगोत्पतती वभाति द्रव्यं धरा सौक्व पतत्वनन्ते । १२ ।
कोई भी द्रव्य पृथ्वी का ही परमाणु (अर्थात् उसका बहुत छोटा अंश) है ।
अतः पृथ्वी अपनी शक्ति से हर द्रव्य को अपनी तरफ आकर्षित करती है । पृथ्वी
पर गिरने के बाद उसको आधार मिल जाता है अतः वह और कहीं नहीं जाता
है । आकाश में और किसी दिशा में जाने का कारण नहीं हैं ।
ब्रह्म सिद्धान्ते-पञ्चाशत् कोटि विस्तीर्णा केवलं कल्पिता मही
अल्पराज्य मदान्धानां विषादाय विरुक्तये । १३ ।
पृथ्वी का विस्तार ५० कोटि योजन है । अल्प राज्य के शासन से गर्व करने
वाले राजा यदि इसके बारे में समझें तो उनका मोह भंग होकर वैराग्य हो जायेगा ।
साकल्पना न च वृथा सतां पीठादि पूजने ।
सर्वत्र विषयारोपादेव सिद्धेन्दूपासना । १४ । इति ।
सज्जन लोग पीठ आदि की पूजा करने पर सभी स्थान में विषय का आरोप
करते हैं (छोटे पत्थर के टुकड़ो को देवता, अंजलि भर पानी में भारत की नदियों
का समावेश या कलश को समुद्र आदि मानते हैं । अतः इतनी बड़ी पृथ्वी की
कल्पना भी निरर्थक नहीं है और उपयोगी है । (उद्धरण समाप्त)
ब्रह्माण्डत्वं यथा देहे, धमन्या मादि शक्तिता
आत्मत्का शनी दासोत्वं तथैव स्थूलता क्षितेः । १५ ।
पिण्ड (देह) में ब्रह्माण्ड की कल्पना, शिरा (नाड़ी या चक्रों में) आदि शक्ति
की कल्पना या आत्मा को ईश्वर का दास जिस प्रकार माना गया है । उसी
प्रकार पृथ्वी की स्थूलता भी स्वीकृत हो चुकी है । (इसमें किसी को सन्देह नहीं
है)
मण्डूकादि क्रमश्चेति सर्व मारोपितं बुधैः ।
ध्यानं पूजा जपादीनां स्यात्तृष्टि स्तत् क्रमाद्यतः । १६ ।
पूजा पीठ में मण्डूक आदि की क्रम भी इसी प्रकार आरोपित है, इस मान्यता
से पूजा, ध्यान आदि स्पष्ट होता है तथा फल की भी प्राप्ति होती है ।

भूगोलस्थिति वर्णनम् २६१
सूर्य सिद्धान्ते-स्वल्पकायतया लोकाः स्वस्थानात्सर्वतोदिशम्।
पश्यन्ति वृत्तामप्येतां चक्राकारां वसुन्धराम्। इति। १७।
पृथ्वी की तुलना में मनुष्य का आकार अत्यन्त छोटा होने के कारण वह
सभी दिशाओं में बहुत कम दूरी तक देख पाता है और पृथ्वी के गोल आकार
की वक्रता नहीं दीखती। अतः पृथ्वी चक्राकार दीखती है।
सिद्धान्त शिरोमणौ - यदि समा मुकुरोदर सन्निभा भगवती धरणीतरणीःक्षिते
उपरिदूर गतोऽपि परि भ्रमन् किमुनरै रमरै रिवनिक्ष्यते। १८।
भगवती पृथ्वी यदि थाल के समान (समतल वृत्ताकार) है तो हर स्थान से
सूर्य एक ही दिशा में एक साथ दीखेगा। यदि ऐसा है तो उत्तर मेरू में देवता
लोग ६ मास तक सूर्य को देख पाते हैं। उसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी सूर्य
सदा क्यों नहीं दीखता है?
यदि निशा जनकः कनका चलः किमु तदन्तरगः सनदृश्यते
उदगयन्ननु मेरु रथांशुमान् कथमुदेति च दक्षिण भाग के। १९.।
यदि कनक गिरि रात्रि का कारण है, तो वह रात में क्यों नहीं दीखता, एक
तरफ सूर्य रहने के कारण वह चकाचक दीखता। मेरू यदि सिर्फ उत्तर में हो तो
उत्तर में ही सदा सूर्य का उदय होता, दक्षिण में क्यों होता है?
समोयतः स्यात्परिधेः शतांश पृथ्वी च पृथ्वी नितरां तनीयान्
नरश्च तत्पृष्ठ गतस्य कृत्स्ना समेव तस्य प्रतिभात्यतः सा। २०।
वृत्त की परिधि का १०० वां अंश सरल ही दीखता है। पृथ्वी की तुलना में
मनुष्य बहुत छोटा होने के कारण वह गोल पृथ्वी का और भी बहुत छोटा अंश
देख पाता है। अतः मनुष्य को गोल पृथ्वी भी समतल दीखती है।
पुरान्तरं चेदिद मुत्तरं स्यात् तदक्ष विश्लेष लवैस्तदा किम्
चक्रांशकै रित्यनुपातयत्या युक्तं निरुक्तं परिधेः प्रमाणाम्। २१।
विषुव के उत्तर दो नगर (उत्तर दक्षिण रेखा पर) का अक्षांश निकालें। दोनों
का उत्तर दक्षिण दिशा में योजन अन्तर भी निकालें। अक्षांश अन्तर का योजन
मालूम होने पर ३६० का योजन अन्तर अनुपात से निकालने पर पृथ्वी की परिधि
का परिमाण होगा।
निरक्ष देशात् क्षिति षोड़शांशे भवेदवन्ती गणितेन यस्मात्
तदन्तरं षोड़श संगुणं स्या भूमानमस्मात् बहु किंतदुक्तम्। इति। २२।
विषुव से अवन्ती नगरी पृथ्वी परिधि के १/१६ भाग की दूरी पर स्थित है।
इस अन्तर को १६ से गुणा करने पर भी पृथ्वी की परिधि का परिणाम आता है
। पृथ्वी की गोलाकार और परिधि के बारे में इससे अधिक स्पष्ट और क्या कहा
जा सकता है? (उद्धरण समाप्त)

२६२ सिद्धान्त दर्पण
भूमौ समाया मति दूर गस्य प्राच्यं रवेः साङ्गगतिर्न दृश्या
ततोऽल्प दूरस्य विलम्बि ता सा शीघ्रा ख मध्ये जलदस्य यद्वत् । २३ ।
पृथ्वी यदि गोल नहीं होकर समतल होती तो पूर्व दिशा में अत्यन्त दूर में
स्थित मेघ के समान सूर्य गति भी अत्यन्त मन्द दिखायी होगी । मध्याह्न में निकट
होने के कारण उसकी गति मेघ के समान तेज हो जायेगी ।
असंगतेय यदहस्करा देर्गति पुरः पश्चिम भागयोः सा
पानीय यन्त्र द्रुत शाँत गत्या कुम्भ प्रमापेक्षत एव साक्षात् । २४ ।
किन्तु मेघ के समान पूर्व में और मध्याह्न में सूर्य की गति का अन्तर नहीं
होता । मध्याह्न, क्या, पूर्व और पश्चिम में भी सूर्य की गति पानी यन्त्र में स्वर्ण
कलश की गति की तरह समान होती है । (पानीयन्त्र समय नापने के लिये है ।
इससे सिद्ध हुआ कि पृथ्वी समतल नहीं गोलाकार है ।
समुद्र मध्यादतटस्तटान्तं स्थूणाग्रमादौ तटगेनदृष्टम्
नरेण पोतस्य ततस्तदद्धं सर्वक्रमादन्तिक वर्तिनः स्यात् । २५ ।
समुद्र के मध्य से तट की तरफ आता हुआ जहाज का ऊपरी भाग तट पर
पहले दिखायी देता है । बाद में स्थूण (मस्तूल) का नीचा भाग तथा सबसे अन्त
में पूरा जहाज दीखता है !
वृत्तान चेत्क्ष्मा समवारि मध्ये दृक् पोत योस्तद् व्यवधापिनस्यात्
चन्द्र ग्रहे तद् गत भू प्रभायान वृत्त तास्यात् समयेऽ खिलेऽपि । २६ ।
पृथ्वी गोलाकार नहीं होने पर समतल पानी में इस प्रकार दृष्टि का व्यवधान
नहीं होता । अर्थात् पहले अग्रभाग, तब मध्य भाग तक पूर्ण जहाज नहीं दीखता ।
चन्द्र ग्रहण के समय भी सभी प्रकार ग्रास में चन्द्र को ढंकने वाली पृथ्वी की
छाया वृत्ताकार दीखती है । पृथ्वी की सब स्थिति में वृत्ताकार छाया होने का
अर्थ है कि इसका गोल आकार है ।
न स्याञ्च देशान्तर नाड़िका द्यमयक्षयद् वीक्षणतः सुधांशोः
गोलत्वमायाति भ भानुं मुख्य गोला पुरोक्ताः श्रुति दृष्टि मद् भिः । २७ ।
पृथ्वी गोलाकार पृथ्वी नहीं होने पर पूर्व पश्चिम दिशा के सभी स्थानों पर
सूर्य का उदय आदि एक समय होता, (उसमें समय का अन्तर होने का अर्थ है
कि पृथ्वी गोलाकार है) । चन्द्र का भी वृद्धि क्षय वृत्ताकार दीखता है । जिसका
अर्थ है कि गोलाकार है । शास्त्र और दृष्टि के आधार पर प्राचीन आचार्यों ने सूर्य
नक्षत्र आदि सभी को गोलाकार कहा है (अतः पृथ्वी भी गोलाकार है ) ।
वदन्त्यनन्तेऽपि धराँ न वा ये भाषा च तेषा ममृषा मता मे ।
परार्द्ध वारान् भ्रमता नरेण यद् गोल पृष्ठस्य न लभ्यते ऽन्तः । २८ ।
पृथ्वी को कुछ लोग अनन्त भी कहते हैं, यह बात असत्य नहीं है । पृथ्वी

भूगोलस्थिति वर्णनम् २६३
गोल होने के कारण उसकी सतह पर किसी भी दिशा में जाने पर बार बार चक्कर
लगता रहेगा । परार्द्ध चक्र में भी उसका अन्त नहीं होगा ।
सूर्योपरीन्दो स्थितिरन्य खेट स्थानं भचक्रोपरि या पुरोक्तिः ।
स्वर्गस्थ तत्तत्पुर पेक्षया सा न तु भ्रमज्ज्योतिर पेक्षयेव । २९ ।
सूर्य के ऊपर चन्द्र तथा नक्षत्र के ऊपर ग्रह की स्थिति प्राचीन आचार्यों ने
कही है- यह स्वर्ग की तरफ से देखने पर होता है । घूमते हुए ज्योति पिण्डों
की दृष्टि से नहीं ।
किं वा कुरुक्षेत्र उपेन्द्र इन्द्रपुत्रा य सन्ददर्शित विश्वरूपः ।
एकार्णवो भूतमहीतले च मृकुण्डपुत्राय निजोदरस्थम् । ३० ।।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को, प्रलय पयोधि जल में मार्कण्डेय
को विश्वरूप दिखाया था तथा
अदर्शयात् विश्वमसौ सभायां स्वविश्वरूपं धृतराष्ट्र राज्ञे
यद् भूमिपृष्ठे घट वत् सुदृष्टं क्वचित्प्रदेशेकिल विश्वरूपम् । ३१ ।
तथा राजा धृतराष्ट्र को उनकी सभा में विश्व रूप में दिखाया था-वह गोल
घटाकार पृष्ठ हमारी पृथ्वी से भिन्न है । वह बिम्ब और पृथ्वी एक नहीं है ।
तदस्मदावास भुवस्तदेव प्रभिद्यते तत्र पुराण सिद्धाः
भू भूधराम्भो निधि भानु भाद्या तिष्ठन्तु सिद्धान्त भुवः क्षितिः का । ३२ ।
अतः पुराणों में जिस पृथ्वी, पर्वत समुद्र, सूर्य और नक्षत्र आदि का वर्णन
है-उससे हमारा कोई मतलब नहीं है । गणित सिद्ध पृथ्वी इन सबसे बिल्कुल
अलग है ।
सिद्धान्त शिरोमणै-भूः खेऽधः खलु यातीति बुद्धि बौद्ध मुधाकथम्
याता यातन्तु दृष्ट वापि खे यत्क्षिप्तं गुरु क्षितिम् । ३३ ।
हे बौद्ध गण ! तुम्हारी बुद्धि वास्तव में मन्द है । स्पष्ट रूप से देखते हो कि
आकाश में फेंकी गयी प्रत्येक वस्तु भारी पृथ्वी पर आ जाती है । फिर भी किस
प्रकार मानत हो कि पृथ्वी लगातार नीचे की तरफ गिर रही है ?
किं चान्यत्तव वैगुण्यं द्वैगुण्यं यो वृथा कृताः ।
भार्केन्दूनां विलोक्याह्नां ध्रुवगतस्य परिभ्रमम् । इति । ३४ ।
इस ध्रुव मत्स्य की प्रतिदिन नक्षत्र, सूर्य और चन्द्र परिक्रमा करते हुए दीखते
हैं, फिर भी बेकार में कहते हो कि आकाश में दो सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र मण्डल
हैं । इससे मानना ही पड़ेगा कि तुम बिल्कुल गुणहीन हो । (उद्धरण समाप्त) ।
सौम्य मीनाकृतिं भानां ध्रुव मत्स्य इति श्रुता
ध्रुवस्तन्मुख देशस्थः पुच्छे तारा ततोऽवरा । ३५ ।

छेद्यक, उदयास्त, नक्षत्र-संयोग एवं ग्रह-युति प्रकाश (अध्याय १३-१८)

२६४ सिद्धान्त दर्पण
उत्तर आकाश में एक तारा समूह मछली के आकार का है, उसे ध्रुव मत्स्य
कहते हैं । इस .ध्रुव मत्स्य के मुख में ध्रुव तथा पुच्छ में उससे कुछ छोटा एक
तारा है ।
विशाल समसूत्रे सा तिष्ठत्यंकेन्दु भाग के ।
मुख पुच्छान्तरे बह्वयस्ताराः पंक्ति द्वयो स्थिताः । ३६ ।
विशाखा और इस पुच्छ तारा से जाता हुआ समसूत्र (ध्रुवप्रोतवृत्त) पर यह
तारा विशाखा से १९ अंश दूरी पर स्थित है । इस मुख और पुच्छ से बीच दो
पंक्तियों में बहुत से तारा हैं ।
विशाखास्तोऽस्त मेत्यर्को यदा तत्पुच्छगा तदा ।
तारका पश्चिमस्थास्यान्निशार्द्धेऽधोगता ध्रुवात् । ३७ ।
यह पुच्छ तारा विशाखा नक्षत्र में रह कर सूर्य अस्त होने के समय पश्चिम
क्षितिज में लगता है । अर्ध रात्रि में यह तारा ध्रुव से नीचे अर्थात् दक्षिणोत्तर वृत्त
में लगता है ।
पातरुद्ध द्रवेः सूत्रे प्राच्यं तिष्ठति सा यतः ।
तदर्क द्वितयं कुत्र सम्भवेत् भ्रात रुच्यताम् । ३८ ।
सबेरे पुनः सूर्योदय के समय पुच्छ तारा पूर्व क्षितिज में लगता है । इससे
स्पष्ट है कि सूर्य एक ही हैं । तन भी हे भाई (बौद्धगण) तुम दो सूर्यों की कल्पना
किस प्रकार करते हो ?
अति सूक्ष्म मते यदि तेऽस्ति मतेस्थिरता तरणेश्चलता धरणेः
निज वाग्य खण्डित पण्डित तच्छृणु मद् गिरमावृण चात्मवचः । ३९ ।
यदि तुम्हारी बुद्धि सूक्ष्म है और तुम्हारे अनुसार सूर्य स्थिर और पृथ्‍वी गतिशील
है तो तुम अपने ही शास्त्रों द्वारा खण्डित हो अपने ही वाक्य द्वारा परास्त हुये) ।
अतः अपनी तर्कहीन बात को छिपाकर मेरी बात सुनो ।
इयं भूर्निश्चला साक्षात् लक्ष्यते निखिलैर्जनैः ।
भ्रान्तिश्च रवि बिम्बस्य किं फलं ते विपर्ययात् । ४० ।
संसार में सभी इस पृथ्‍वी को गति हीन देखते हैं अतः पृथ्‍वी की स्थिर होना
प्रत्यक्ष प्रमाणित है । इसी प्रकार सूर्य की गति भी प्रत्यक्ष है । अतः सूर्य को स्थिर
और पृथ्‍वी को गतिशील मानने का क्या उपयोग है ?
चलत्तरणी गो जनः सवसति स्थिरां मन्यते
तटस्थविटपि ब्रजं स विपरि ब्रजन्तं पुनः
उदस्तमपि हस्तगं गगनतः पतत्कन्दुकं
प्रपश्यति यता क्षिति गता इतीक्षास्ति चेत् । ४१ ।

भूगोलस्थिति वर्णनम् २६५
नदी की धारा में बहती हुयी नाव में बैठा व्यक्ति अपनी नाव को स्थिर मान
कर नदीतट के स्थिर वृक्षों को विपरीत दिशा में चलता हुआ देखता है, तथा
ऊपर की तरफ फेंकी गयी चीज भी वापस हाथ में आते हुए देखता है (मानों
उसकी नाव स्थिर हो) पृथ्वी से भी यह दोनों क्रियायें इसी प्रकार दीखती हैं (
पृथ्वी की गति के कारण स्थिर नक्षत्र, सूर्य आदि चलते हुए दीखते हैं, तथा पृथ्वी
पर भी ऊपर की तरफ फेंकी हुई वस्तु वापस अपने ही स्थान पर वापस आती
है) । इस तर्क द्वारा यदि पृथ्वी को गतिशील माना गया है-
तदा हरि हरिन्मुख प्रजविना विना चेत् करे
विभर्त्यु परि यष्टि का शिखर जुष्ट चीनां शुकाम् ।
पुरः प्रवहदा शुप्रचलितं तदा लोक्यते ।
सदा वरुणदिङ्मुखं किम वनौ पराशा मरुत् । ४२ ।
उस अवस्था में, यदि हवा पूर्व दिशा में बहती हो, तथा कोई व्यक्ति डण्डे
के ऊपर रेशम की पता का बांध कर सीधा खड़ा करे तो वह पताका क्या सदा
पश्चिम दिशा में उड़ेगी ? पृथ्वी पर क्या पवन सदा पूर्व से पश्चिम की तरफ बहता
हुआ दीखता है ? (अपने अक्ष पर पूर्व दिशा की तरफ घूमने के कारण पवन की
गति पश्चिम की तरफ होनी चाहिये) ।
यदि प्रवहकर्षणात् व्रजति पश्चिमा शां ग्रहः
सदा कथमसौ पुरोगतिम् वामु मीष्टे ततः
इदं वदसि चेद्धराभ्रमण पूर्व कृष्टा घनाः
खगाश्च कथमीशते प्रचलितुं प्रतीचीं प्रति । ४३ ।
ज्योतिष मत से प्रवह वायु ग्रह नक्षत्रों को पूर्व से पश्चिम दिशा में दिन में
एक चक्र घुमाती है । इस पर यदि तुम्हारा प्रश्न है कि फिर ग्रह पुनः पूर्व की
तरफ (नक्षत्रों की तुलना में) किस प्रकार चलते हैं । उस का उत्तर है कि पृथ्वी
के वेग द्वारा मेघ और पक्षी आदि पूर्व की तरफ इसी प्रकार प्रवह वायु द्वारा नक्षत्र
आदि पश्चिम दिशा में घुमाये जाने पर भी ग्रह अपनी शक्ति के अनुसार पूर्व की
तरफ गति करते हैं ।
पुराणसिद्धान्त भिराप्त पुरुषै
स्थिरेति शब्दो धरणावुररीकृते
न चेत् प्रमाणो क्रियते त्वयाप्त वाक्
कथं प्रवृत्तिर्भवति सुकर्मसु । ४४ ।
प्राचीन आचार्यों तथा आप्त (वेद वादी) पुरुषों ने पृथ्वी
को स्थिर कहा है । यह स्वीकार नहीं करने पर कृत्य (शुभ) कर्म में तुम्हारी
प्रवृत्ति कैसे होगी ?

२६६ सिद्धान्त दर्पण
प्रतिक्षणं गच्छति यत्ततोजनञ्जगाद चेदित्थम्दोऽर्थविद् भवान्
चतुर्विधं याति लयं जगत्त्रयं ततोऽपि किं नार्थ समन्वयं व्रजेत् । ४५ ।
सदा गतिशील होने के कारण संसार का नाम जगत् है -ऐसा आप शब्दार्थ
के अनुसार कह सकते हैं । पर इसकी दूसरी व्याख्या है कि जगत अर्थात् स्वर्ग,
मर्त्य और पाताल का चार प्रकार के प्रलय में नाश हो जाता है ।
इस अर्थ में पृथ्‍वी को जगत् (नाश होने वाला, अस्थायी) कहा जाता है ।
इतोऽन्यथार्थः क्रियते यदा तदा स्थिरेति किं भूरचलेति कथ्यते ।
चराचरावा सतयाथवा धरा जगत स्थिरेत्येव समीरिता बुधैः । ४६ ।
यदि आप इससे भिन्न अर्थ करते हैं (अर्थात् केवल गति शील के कारण
जगत मानते हैं) तो कहिये-पृथ्‍वी का नाम स्थिरा और अचला क्यों हुआ ? इसके
अतिरिक्त स्थावर जगम (स्थिर और गतिशील) सभी को धर कर रखने के कारण
इसका नाम धरा विद्वानों ने रखा है ।
न शब्द मंगीकुरुतेऽनुमान वा न मान वाचाल वदे भवान् यदि
तदा तदा विष्क्रियया मया रयात्मना समाधान कृते प्रतायते । ४७ ।
आप वाचालता के कारण यदि केवल आप्त वचन को प्रमाण नहीं मानते
तथा अनुमान (तर्क) प्रमाण भी चाहते हैं तो मैं अनुमान द्वारा भी भास्कर मत को
सिद्ध करने की विधि निकालता हूँ ।
यथार्थ माकृष्ट बुधादयोग्रहा भ्रमत् स्वदेहाः परियान्ति सन्ततम् ।
स्वकक्षया प्रक्रम युक्त या तथा पथात्मनः क्ष्मा भ्रमतीति ते प्रथा । ४८ ।
सूर्य द्वारा आकर्षित हो बुध आदि ग्रह जिस प्रकार अपने अक्ष पर घूमने के
साथ साथ उत्तर और दक्षिण क्रान्ति अन्तर में अपनी अपनी कक्षा में अपनी गति
से जाते हैं । ठीक उसी प्रकार पृथ्‍वी भी अपने अक्ष पर घूमने के साथ अपनी
कक्षा में घूमती है - यदि ऐसा तुम्हारा मत है-
न स्याद् गतिः शक्तिमृतेऽखिलस्य साऽकर्ष विक्षेपवशाद्द्विधाचेत्
केन्द्राभि कर्षण्य भिधा तदाद्या केन्द्रापसारिण्य परोच्यतेषा । ४९ ।
तथायदि कहते हो कि शक्ति या बल द्वारा ही किसी वस्तु की गति होती है
और शक्ति दो प्रकार की है-आकर्षण शक्ति केन्द्र की तरफ तथा आकर्षण शक्ति
(विक्षेप) केन्द्र से दूर की तरफ-
पराणुबाहुल्य समुद्भवाद्या दृष्टा गुरुत्व वगमाद्धरित्र्यम् ।
तत्रापतद् गोलक पिण्डशश्वत्परिपभ्रमोस्मा भिरलाक्षि नैव । ५० ।
तो दोनों प्रकार की शक्ति पृथ्‍वी में भी होनी चाहिये क्योंकि परमाणु बाहुल्य
के कारण इसकी उत्पत्ति प्रथम हुयी होगी । किन्तु पृथ्‍वी की विक्षेप शक्ति दिखायी
नहीं देती । इसी प्रकार पृथ्‍वी पर पड़े किसी और वस्तू का अपने अक्ष पर भ्रमण

भूगोलस्थिति वर्णनम् २६७
भी नहीं दीखता ।
प्रक्षिप्त लोके क्षणतोऽपरस्यां शक्तौ च गोल भ्रमसंभवोन
समक्षितौ क्षेप वलेन गोलः किन्वीक्ष्यतेयान् परिवर्तमानः । ५१ ।
पृथ्वी से ऊपर ढेला फेंकने पर वह क्षण भर के लिये भी किसी अन्य शक्ति
द्वारा अक्ष पर घूमना हमने नहीं देखा है । पर दूसरी ओर सम धरातल पर कोई
गोल वस्तु (चक्रा) लुढ़का देने पर पर वह घूमता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है ।
स चेद्धरत्राग्रथितः करेण क्षिप्येत शंशद् भ्रमता तदग्रे
शक्ति द्वया कर्ष वशान्न केन्द्रे लग्ने न निर्याति परिभ्रमेतु । ५२ ।
किसी गोल वस्तु को चमड़े की रस्सी से बांध कर हाथ के बल से घुमादेने
वह रस्सी से अलग होकर पृथ्वी कहीं भी जाने पर पृथ्वी का केन्द्र ही आकर्षण
करता है । केवल इन दो शक्तियों द्वारा आकृष्ट और विक्षिप्त होकर आकाश में
जाना ही हम लोग देखते हैं । अपने अक्ष पर घूमना या हाथ में आकर्षण और
विक्षेपण केन्द्र का आना नहीं दीखता है ।
इत्थं स्वकेन्द्रपरिशक्ति युग्म न द्वा परिभ्राम्यति चेद्धरित्री
सूर्याभिमुख्येन विनातदास्या न स्यात्कदा चिद् गतिरन्यथैव । ५३ ।
इसी प्रकार यदि पृथ्वी के केन्द्र पर सूर्य की विक्षेप और आकर्षण शक्ति के
कारण पृथ्वी चल रही है तो पृथ्वी की गति सूर्य की दिशा में होती । इससे पृथ्वी
के एक पक्ष में प्रकाश और दूसरे तरफ अन्धकार सदा रहता ।
आस्ता तदित्यात्थ यदि त्वमस्या व्यक्तैक देशे रविसम्मुखस्थे
यत्राहरत्रापि भवेन्नरात्रिः सा यत्रतत्रेत्य महः कदाचित् । ५४ ।
पृथ्वी के सूर्य के चारों तरफ इस प्रकार घूमने से निरक्ष रेखा के जिस प्रदेश
पर दिन होता वहां रात्रि नहीं होती तथा जहाँ रात्रि होती वहां दिन नहीं होता ।
किंवा समक्ष्मा परि वर्तमान सदह पिण्डोपमया पृथिव्याः
स्वभ्रान्ति वाद स्त्वन चेदियं तत् प्राप्नोतु चक्र भ्रमिमन्तरीक्षे । ५५ ।
समधरातल पर गोल पिण्ड लुढ़कने चक्र की तरह चलने के समन यदि
पृथ्वी की गति मानी जाय तो उसकी तुम्हारे मत से खण्डित होती है । चक्र के
समान घूमने से
स्ववेष्टनं यावदियं हि तावत दिने दिने यातु पुरः प्रदेशम्
स्यात्वन्मते स्वभ्रमणं दिनेऽभ्र खाभ्राक्षिक्षू (१२०००) क्रोशपरिध्यवन्याः । ५६ ।
पृथ्वी एक दिन में अपनी परिधि के समान चलेगी तभी एक चक्र के बाद
पुनः वह प्रदेश सूर्य के समाने होगा । किन्तु पृथ्वी का परिधि १२००० कोस होने
पर तुम्हारे मत से

२६८ सिद्धान्त दर्पण
पुरो गतिश्चाष्ट विनिघ्न लक्ष (८,००,०००) क्रोश प्रमा सा कथ मंत्र युक्ता
सा वास्तु तस्याः समपूर्व देह भ्रान्तौ कथं क्रान्ति पथेगतिः स्यात् । ५७ ।
पृथ्वी की पूर्व दिशा में दैनिक गति ८,००,००० कोस है- यह कैसे ठीक हो
सकता है, वह परिधि से इतना ज्यादा कैसे होगा ? फिर यह पूर्व दिशा की अपने
अक्ष पर गति विषुव वृत्त धरातल में है, फिर पृथ्वी की गति क्रान्ति वृत्त धरातल
में कैसे हो जाती है ?
ईशानां दिङ् मुखे मार्गे गच्छतः पुरुषस्य हि
पूर्वाभिमुखतां भ्रातः कथं संगच्छते वद । ५८ ।
ईशान कोण में जाते हुए व्यक्ति की पूर्व दिशा में गति कैसे होगी (कहो
भाई) !
किं वापार्श्व गतिं भूमेः कर्कटस्येव मन्यसे
उपपन्ना न सा युक्ति र्निसर्गो पाधि भेदतः । ५९ ।
अथवा पृथ्वी की पार्श्व गति (अपने अक्ष पर गति) कर्कट ( केकड़े) की
तरह यदि मानते हैं तो यह निसर्ग (प्राकृतिक) तथा उपाधि (कृत्रिम अथवा दृष्टान्त)
के समान भिन्न भिन्न युक्ति है ।
नैसर्गिकी कुलीरस्य सार्का कर्षण जा भुवः
तदृते क्रान्ति साम्मुख्याद् गतिरन्या न सम्भवेत् । ६० ।
आपके मत से पृथ्वी की स्वाभाविक गति सूर्य के आकर्षण के कारण है यह
स्वाभाविक नहीं है । कर्कट स्वयं चलता है किसी के आकर्षण से नहीं । अतः
यह तुलना ठीक नहीं है । इस प्रकार पृथ्वी की गति क्रान्ति के तल में नहीं है
यह माना नहीं जा सकता है ।
विषुवद् वलयस्थेन्दु कलंको दक्षिणेऽयने
आग्नेयदिङ्मुखोदृष्टः सौम्येत्वैशान्य दिङ्मुखः । ६१ ।
विषुववृत्त के धरातल का चन्द्र का कलंक दक्षिण अयन में आग्नेय दिशा
में और उत्तर अयन में ईशान दिशा में दीखता है ।
तत्कक्षान्तर्गतक्ष्माया ग्रहवद् भ्रान्ति रस्तिचेत्
तदासायन सामुख्यं ध्रुवं भवतु मर्हति । ६२ ।
ग्रहों की गति की तरह पृथ्वी की गति यदि विषुव कक्षा के अन्तर्गत होती
तो चन्द्र का कलंक निश्चय अपनाभिमुख होता, यह निश्चय है ।
सायनव्यस्त विक्षेप वृद्धावपि न चेद् विधुः
जहात क्रान्ति साम्मुख्यं क्ष्मानिषुस्तत् कथंत्यजेत् । ६३ ।
याम्यायन में सौम्य शर तथा सौम्य (उत्तर) अयन में दक्षिण शर वृद्धि होने

भूगोलस्थिति वर्णनम् २६९
से चन्द्र क्रान्ति मार्ग नहीं छोड़ता, बिल्कुल शर नहीं रहने पर पृथ्वी कैसे क्रान्ति
मार्ग को छोड़ सकती है ? (अर्थात् विषुव तल में कैसे गति हो सकती है ?)
खे वाक्षितं व्रजतु कुशलै घूर्णमानं दधित्थं
चक्रं चक्राम्यतु भुविदिवि स्यन्दनस्थं करस्थम् ।
पृथ्वी पृष्ठे लुठतु कठीनीगोलकः खेलया वा-
देह भ्रान्तिर्न भवति विना स्व स्व मार्गा भिमुख्यात् । ६४ ।
घूमते हुए कैथ फल को आकाश में फेंकने से, रथ चक्र को आकाश में या
जमीन पर लुढ़काने से, या खेल में गेन्द लुढ़काने से उनका अपने अक्ष पर भ्रमण
अपनी गति की दिशा में ही होता है । किन्तु पृथ्वी विषुव कक्षा में अपने अक्ष
पर घूमती है । तो उसके बदले क्रान्ति मार्ग पर क्यों गति है ?
यदि भ्रामं भ्रामं भ्रमति धरणी क्रान्ति पथगा
तिरश्चिरा भानां पतिरि वतदा वासि पुरुषैः
स्व पूर्वाद्याशास्थ द्रुम धरणि भृत् क्रोश गमने
सुलक्ष्यो दिग् भेदः प्रतिदिन मुडुनां तदुदये । ६५ ।
चन्द्र विषुव पर तिरछे रह कर अपने अक्ष पर घूमते हुए विमण्डल में चलता
है, यदि पृथ्वी भी इसी प्रकार विषुवमार्ग पर घूमते हुए क्रान्ति मार्ग पर गति करती
है तो पृथ्वी के लोग पृथ्वी पर पूर्व आदि दिशा में स्थित वृक्ष और पर्वतों की
कोण गति देखते जिस प्रकार नक्षत्रों का उदय अलग अलग दिशा में देखते हैं ।
स्व कक्षा वृत्तत्वे भवति सवितुर्मूर भिमुखी
मयास्थीः क्रान्त्युद्भावप वलय दैर्घ्याद् गति पथः
दिशोर्याम्यो दीच्यो र्गुण वद् जुरिष्टो तियदिचेत्
इतिक्षमाया दृश्यस्त नु रयन सन्धौ दिनकरः । ६६ ।
अपनी कक्षा वृत्त (अक्ष पर विषुव वृत्त में गति) के साथ साथ पृथ्वी यदि
क्रान्ति वृत्त में सूर्याभिमुखी भी हो, तो क्रान्ति वृत्त के दैर्घ्य (दीर्घ वृत्त या वलय
के लम्बा होने) के कारण क्रान्ति गति पथ उत्तर और दक्षिणी दिशा में ज्या के
समान सरल होगा (चाप के समान गोला कार नहीं) यदि मेरे मत का तुम इस
प्रकार अर्थ लेते हो तो मेरा उत्तर है कि इस अवस्था में सायन सूर्य कर्क और
मकर आदि में दूरी के कारण (दीर्घ वलय का दूर का भाग में) छोटा और मेष,
तुला के आदि में निकटता के कारण छोटा दीखना चाहिये । (पर ऐसा नहीं
होता) ।
विदुरोऽनाथ स्येत्थं विषुवति भुवः सन्निधि वशा
न्निशानाथ स्येत्थं शरसु सरलेऽपक्रमपथे
क्वसाम्पूरूयात् लक्ष्यं रजनी लक्ष्मक्षितिगतै-
र्भिभिन्नाकारं यत्तदवनि गति र्नत्र घटते । ६७ ।

२७० सिद्धान्त दर्पण
इसी प्रकार चन्द्र का क्रान्ति मार्ग (विमण्डल) अत्यन्त सरल होने के कारण
चन्द्र का कलंक भी पृथ्वी वासियों को एक ही प्रकार दीखना चाहिये । किन्तु
यह भी नहीं होता, चन्द्र कलंक भिन्न भिन्न आकार (दिशा) में पृथ्वी से दीखता
है (अतः ग्रन्थकार के मत से पृथ्वी का भ्रमण नहीं होता)
केन्द्राभिमुख्य घटना कृष्टस्यामां तथापि भूमति
अदिन कराभिमुख्यतया स्रष्टुः सेच्छा वसात्क्रान्तो । ६८ ।
यदि तुम्हारा कहना है कि सूर्य केन्द्र द्वारा आकृष्ट होने पर भी पृथ्वी की गति
सूर्य की दिशा में न होकर क्रान्ति वृत्त में सृष्टि कर्त्ता की इच्छा के कारण है, तो
मैं कहूँगा कि उसी सृष्टि कर्त्ता की इच्छा से पृथ्वी स्थिर रहे उसमें हलचल नहीं
हो ।
इति वदसि तदिच्छा प्रामाण्यै मन्यतां महीस्थास्युः
आकर्षण गुरु भानोः स्याचेत् किं नास्ति तत् क्ष्मायां । ६९ ।
यदि बड़ा होने के कारण सूर्य में आकर्षण है (ऐसा कहते हो) तो वह पृथ्वी
में भी क्यों नहीं होगा । (आकर्षण शक्ति केवल बड़ी वस्तु में ही कैसे होगी ?
स्थिराश्मकान्तेन कृशेनयस्मादाकृष्यते तत् पृथुलोह पिण्डः
आकर्षणे कारणमेव शक्ति र्निसर्ग का नो पृथुता न तेजः । ७० ।
स्थिर छोटा लौह चुम्बक भी बड़े पिण्ड को खींचता है । इससे यह सिद्ध है
कि आकर्षण शक्ति का कारण पिण्ड का बड़ा होना नहीं, उसकी अपनी स्वाभाविक
(नैसर्गिक) शक्ति है ।
यदि क्षुद्र द्रव्यं भ्रमति वृहदाकर्षण बला-
नतु क्षुद्रं स्थूलं भ्रमण कृदियं वाक् तव तदा ।
स्वतन्त्रत्वे सा सम्भवति न पराधीन वलयो-
र्यतः सर्वाकर्षिणयुत भगवदिच्छा बलवती । ७१ ।
इतना समझाने पर भी यदि तुम्हारा कहना है कि बड़ी वस्तु छोटे को खींच
सकती है पर छोटी वस्तु बड़े को नहीं तो मेरा उत्तर है कि यह स्वतन्त्र वस्तु के
लिये ही यह बात सम्भव है । जिस द्रव्य (छोटा या बड़ा) में स्वाधीन बल नहीं
है उसके लिये यह ठीक नहीं है । प्रत्येक वस्तु को आकर्षित करने वाली शक्ति
सदा भगवान की इच्छा के अधीन है ।
तड़ागान्तर्यष्टि कृश तनु मनु क्रामति यथा
महानौः कैवर्त्ता चरण परतन्त्रा जगदिदम्
तथा पर्यत्यर्कः पृथुरपि महेशा शयवशात् -
त्रिलोको लोकानामवनविधये सग्रह गणः । ७१ ।
जिस प्रकार तालाब में स्थित छोटे यूप दण्ड को नाविक की इच्छा के कारण

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भूगोलस्थिति वर्णनम् २७१
बड़ी बड़ी नौकायें परिक्रमा करती हैं, उसी प्रकार ईश्वर की इच्छा से छोटी पृथ्वी
की परिक्रमा विशाल सूर्य अन्य ग्रहों के साथ त्रिभुवन के लोकोपकार के लिये
करता है ।
सूर्योवान्य ग्रहो वा निजतन परतो भ्रान्त माघ्नोतु तस्याः
का हानि र्भू स्थित्वे भवति वदसखे यस्य योऽस्ति स्वभावः
सोऽन्येषां दर्शनात् किं व्यभिचरति भवान् यन्त्र साहाय्य वत्वात्
सर्वेषां भ्रान्ति दर्शो न किमुडु पततोः पश्यति भ्रान्ति मारात् । ७३ ।
सूर्य और अन्य ग्रह अपने अक्ष पर घूमते है । इस कथा के साथ पृथ्वी के
स्थिर रहने में क्या विरोध है ? कौन चलता है और कौन नहीं चलता इसमें कोई
कठिनाई नहीं है- जिसकी जैसा स्वभाव है वैसा करेगा । आपने यन्त्र की सहायता
से ग्रहों की गति देख ली पर निकट के चन्द्र की (अपने अक्ष पर) गति क्यों नहीं
देख पाये ?
भ्रान्ति र्नोपग्रहाणां प्रभवति महतां खेचराणामिवे

' or 'र्न'?
Wait, could it be "र्कोनल"?
Wait, look at the translation:
"जिस प्रकार रवि और आग का गुण उष्म होता है"
रवि (अर्क) और आग (अनल).
अर्क + अनल = अर्काऽनल!
If the author adapted the Siddhanta Shiromani verse:
Original: "यथोष्णताऽर्काग्न्योश्च शीतता विधौ"
Here, instead of "अर्काग्न्योश्च", the author wrote:
"र्कोनल योश्च" or "र्कानल योश्च" or "र्काऽनल योश्च"?
Wait! Let's look at:
य थ ो ष् ण ता
Then:
र्का or र्को?
Wait, the top of the letter after space:
There is a repha! It curves to the right from the top of the vertical stem!
And to the left of the stem is a loop like 'क'!
So it is 'र्क'!
Wait, is there an aa-matra or an o-matra or an avagraha?
There is a vertical line with a repha? No, the vertical line has 'क' attached.
Then the next letter is 'न'!
Wait, is there a letter between 'क' and 'न'?
No! It is: 'र्क' then 'न' then 'ल'?
Wait, is it "र्कानल"?
Wait, look at the repha:

भूगोलस्थिति वर्णनम् २७३
यदि सभी ग्रहों की कक्षा के केन्द्र में सूर्य मण्डल है तो पृथ्वी से देखने पर
वह स्फुट सूर्य (१) बुध, शुक्र तथा ( २) मंगल गुरु शनि का क्रमशः
मध्यता शीघ्रता पातः सोऽस्तीति त्वं ब्रवीषिचेत्
तदापरिधिभिः स्वीयैर्दृक् सिद्धेः शीघ्र मन्दजः । ८२ ।
(१) मध्यम मान तथा (२) शीघ्रोच्च होगा । उस अवस्था में प्रत्यक्ष देखे गये
शीघ्र और मन्दपरिधि से
सर्व संस्कार शालिन्यां विहितायां स्फुटी कृतौ ।
कन्या मीन स्थिते भानौ केन्द्र चक्रान्तिक स्थयोः । ८३ ।
सभी संस्कार कर ग्रह स्पष्ट करने पर स्पष्ट सूर्य जब कन्या या मीन राशि में
हो तो उच्च के निकट स्थित (सूर्य के दूसरी तरफ के कक्षा के भाग में )
भौम भार्गवयो दृश्यः प्रभेदाः स्वस्थितेः क्रमात्
कलाभि र्द्विशरै (मं-५२) रब्धि सायकैः (शु-५४) पुनरेतयोः । ८४ ।
मंगल और शुक्र के दृक् सिद्ध मान से गणितागत मान में क्रमशः ५२ तथा
५४ कला की अन्तर पड़ता है ।
चक्रार्द्ध स्थितयो द्व्यंग बाहुभि (म २६२) विशिखामरैः (शु ३३४)
प्रभेदश्चेत्यमन्येषां दृश्यते परिधिक्रमात् । ८५ ।
पुनः यह दोनों चक्रार्द्ध (पृथ्वी की तरफ का कक्षा भाग ) में रहने पर क्रमशः
२६२ (मंगल) तथा ३३४ (शुक्र) कला का अन्तर दीखता है । इसी प्रकार अन्य
ग्रहों का भी भेद दीखेगा ।
तत्कथं सूर्य बिम्बस्य सम्भवेद् मध्यशीघ्रता
तमूरी कुर्वतः सर्वमुदयस्तत्वेन यत्नतः । ८६ ।
अतः स्फुट सूर्य को बुध, शुक्र का मध्यम तथा मंगल गुरु, शनि का शीघ्रोच्च
कैसे माना जा सकता है सूर्य को सभी ग्रहों का कक्षा केन्द्र जो लोग यत्नपूर्वक
स्थिर करते हैं उनका यह मत है ।
काकतालीयवत् क्वापि दृक् सिद्धावपि ते मतम् ।
नास्माभिर्मन्यते साधु कदाचित् कं प्रमातृभिः । ८७ ।
काकतालीय न्याय (कौवा ताल वृक्ष पर बैठने के बाद उसका एक फल गिर
पड़ा अत यह माना गया कि कौवा के कारण फल टूटा) के समान इस विधि से
अभी दृक् सिद्ध होता है । अतः यही मत ठीक है-यह मत युक्ति युक्त और सब
समय ठीक नहीं होगा । अतः यह मत मैं नहीं मानता ।
सर्वग्रहाणां भ्रमिकृत् केन्द्रस्थो मध्यमोरविः
स्वीकार्यश्चेत् तदेव स्यात् दृक् सिद्धः सार्वकालिकी । ८८ ।

२७४ सिद्धान्त दर्पण
मध्यम रवि को सभी ग्रहों का कक्षा केन्द्र मानने से स्पष्ट ग्रह सब समय
दृकसिद्ध होते रहे हैं ।
स्फुटार्क स्येति केन्द्रत्वा सिद्धावाकृष्य भावतः
निजोच्च देवताकृष्ट श्चन्द्रवद् भ्रान्ति मेति सः । ८९ ।
अतः स्फुट रवि ग्रह कक्षा के केन्द्र में नहीं है, इससे सिद्ध हुआ कि ग्रह
स्फुट रवि की तरफ आकर्षित नहीं है और वह अपने उच्चके देवता से आकृष्ट
होकर चन्द्र के समान स्वयं घूमते हैं । यही मानना युक्ति युक्त लगता है ।
चक्रार्द्ध योगाद् भृगु जस्य चन्द्र फलाल्प भावादय भूमिजस्य
परोच्च मन्दोच्चफलाल्प भेदात् तौदृक् समौ वा भवदुक्तितः स्वाम् । ९० ।
चक्रार्द्ध में रहने पर शुक्र का मन्दफल अत्यन्त कम है तथा मंगल के परोच्च
और मन्दोच्च में बहुत कम अन्तर होने के कारण आपके मत से भी वह दोनों दृक्
सिद्ध हो सकते हैं ।
स्थित्वा स्वमध्येऽपमण्डला नुसारात् तनु भ्रान्ति मता सवित्रा
आकृष्ट कक्षाः सुतरां प्रयान्तु बुधादयः क्रान्ति पथेन खेटाः । ९१ ।
किन्तु आकाश में क्रान्ति वृत्त के धरातल में अपने अक्ष ( धरातल पर लम्बरूप)
पर घूमते हुए सूर्य से आकर्षण के कारण बुध आदि ग्रह क्रान्ति वृत्त में ही गति
कर सकते हैं । उनका विमण्डल क्रान्ति वृत्त में होगा )
तयार्यमा कर्षत कक्षया भुवा विधुः समाकृष्ट तनु प्रयाति चेत् ।
तदा कुगोल भ्रमि सिद्ध्या दिशा प्रयातु मेवा र्हति नान्यथा क्वचित् । ९२ ।
उसी सूर्य द्वारा आकर्षित होकर पृथिवी चलती है तथा पृथिवी के आकर्षण से
चन्द्र चलता है । यदि ऐसा है तो चन्द्र भी पृथिवी की तरह अपने अक्ष पर घूमने
की दिशा में जाने को बाध्य है, अन्य दिशा में नहीं जा सकता ।
क्षितेस्तथा क्रान्ति पथाभिमुख्यतो विदिश्यपि स्याद् विषुवेध्रुवेक्षणम्
न चाप मस्तद् ध्रुव पार्श्वक भ्रमे भवेद् विधोरित्यवला चला कथम् । ९३ ।
और भी, सूर्य के आकर्षण के कारण पृथिवी की गति क्रान्ति कृत में होने से
(पृथिवी की अक्ष पर गति भी उसी तल में होगी) तथा विषुव दिन पर ध्रुव एक
कोण पर दीखेगा (विषुव क्षेत्र से) । पुनः पृथिवी की क्रान्ति वृत्त गति से आकृष्ट
चन्द्र की स्पष्ट क्रान्ति कैसे होगी । वह क्रान्ति वृत्त में ही चलेगा । इन सबसे
पृथिवी का स्थिर होना सिद्ध है ।
मन्दोच्च पाता प्रभवाधरोर्द्धव याम्योत्तरावस्थिति दृष्टि हेतो
प्रति व्यपादि भ्रममण्डलानां योगाद् यदुत्पद्यत एव वृत्तम् । ९४ ।
मन्दोच्च, शीघ्रोच्च और पात आदि के कारण ग्रह की ऊपर, नीचे उत्तर तथा
दक्षिण में अवस्थिति होती है-इस गति को मार्ग दिखाने वाले वृत्त वास्तविक

भूगोलस्थिति वर्णनम् २७५
वृत्त नहीं है । वरन्
तया तदेवो दिन मत्र वृत्त भासो ग्रहाणां सरणिर्यदेतत्
युक्तञ्च पातोच्च गतीक्षणार्तं क्षेपाभिरक्षात् मसुराः प्रदिष्टाः । ९५ ।
ये सिर्फ वृत्त का आभास (या उसकी अदृश्य दिशा या रेखा) हैं। इसी कक्षा
में ग्रह का शर (बिम्ब से कदम्ब प्रोत वृत्त कक्षा को जिस बिन्दु पर काटता है)
होता है । पाश्चात्य लोग जिस प्रकार ग्रह गति का कारण (सूर्य) का आकर्षण
और विक्षेप मानते हैं, उसी प्रकार हम उन्हें आकर्षण और विक्षेप शक्ति वाला
देवता मानते हैं ।
भवन्मते भूमिरियं ग्रहेभ्यो न भिद्यते तुल्यगुणा स्थितत्वात्
तथा सति स्थूलतराः पृथिव्या जीवाद्याः पातवशाद् विदूरम् । ९६ ।
यदि पृथ्वी भी अन्य ग्रहों के समान मानी जाय तो पृथ्वी से आकार में बहुत
बड़ा वृहस्पति पात के कारण बहुत दूर (उत्तर या दक्षिण दिशा में) क्यों चला
जाता है ?
विक्षेप मृच्छन्ति कथं क्ष्मा किं नक्षिप्यते शुक्र समात्व दुक्त्या ।
बिम्बानपेक्षा यदिष स्तदस्या गुरोरपि क्षुद्र इतीर्यते चेत् । ९७ ।
शुक्र के समान पृथ्वी भी सूर्य के निकट है, पर पृथ्वी का शुक्र की तरह
विक्षेप क्यों नहीं होता ? शर या पात गी गति बिम्ब मानकर निर्भर नहीं है अतः
गुरु से पृथ्वी कर शर कम होना सम्भव है ।
क्षित्यां तदापि त्रिकलेषु मर्त्यां क्रान्ति प्रभेदात् विषुवायनेषु
दृक् सिद्धभावात्तरणेर्न हि स्यात् ग्रह प्रभाकाल विलग्न सिद्धिः । ९८ ।
यदि तुम्हारे मत के अनुसार पृथ्वी का विक्षेप तीन कला माना जाय तो विषुव
और आयन स्थिति में भेद के कारण सूर्य दृक् सिद्ध नहीं होगा । फलतः ग्रहण,
छाया, समय और लग्न आदि नहीं सिद्ध हो पायेगा ।
अतः शराभावत एव साक्षान्निश्चीयते निश्चलता चलायाः
यद् गोलयोः सायन भाग यानो र्न क्रान्ति भेदोऽ पतनर्भुजैक्य । ९९ ।
पृथ्वी का शर नहीं मानने यह सब सिद्ध हो जायेगा । अतः पृथ्वी को स्थिर
मानना ही सिद्धान्त है । दोनों गोलों में सायन सूर्य का भुज समान होने पर जरा
भी क्रान्ति भेद नहीं होता । इससे भी पृथ्वी स्थिर मालूम होती है ।
यथा रवे नास्ति शरो मंते ते तथा भुवो सम्मत एव मात्थ
चेत् खेट कक्षादर पार्श्व केन्द्र स्थिते महत्वा दति भास्वर त्वात् । १०० ।
पृथ्वी की गति मानने से उसका शर मानना पड़ता है । जिससे यह गड़बड़ी
हो रही है । जिस प्रकार तुम्हारे मत से सूर्य का शर नहीं है । उसी प्रकार हमारे

२७६ सिद्धान्त दर्पण
मत से पृथ्वी का शर नहीं है । सूर्य बिम्ब भी मध्यम सूर्य से अलग रहता है,
इस कारण तुम सूर्य का शर क्यों नहीं मानते हो ?
भानोग्रहेभ्यो बहु भेद लाभात् प्रत्यक्षतेऽमानि मयेह भाव ।
बुधा दि साधर्म्यजषः पृथिव्याः सचेन्निसर्गादचलैव सा स्ताम् । १०१ ।
तुम्हारा मत है कि सूर्य के बाकी ग्रहों के समान पृथ्वी भी है, केवल एक
अन्तर है कि और ग्रहों की तरह पृथ्वी का शर नहीं है । इसी तर्क से मेरा मानना
है कि बाकी सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, पर पृथ्वी स्थिर है । स्वभाव
से ही पृथ्वी अचल है, इसमें आपको आपत्ति क्यों ?
भू धर्मिणो भौम मुखा यदि स्युः सर्वर्तुमन्तस्तदिमान् किमन्तः
स्ववारि वाष्पोद् भव मेघ संघा नाच्छादयन्त्यर्क मया शशीव । १०२ ।
यदि मंगल आदि ग्रहों का गुण पृथ्वी के समान ही है और इनमें भी पृथ्वी
की तरह ६ ऋतुएं हैं तो अमावस्या में जिस प्रकार चन्द्र सूर्य को ढंक लेता है और
उसी प्रकार उन ग्रहों के पिण्ड से निकले वाष्प के मेघ पृथ्वी और ग्रह के बीच
आवरण का कार्य करते । वह क्यों नहीं होता ?
मृण्मयसौ भूर्महती ग्रहास्ते तोयात्मकाः क्षुद्र निजप्रमाणाः
विरुद्ध धर्मावत एव पृथ्वी तारा ग्रहों स्तास्तु चलौ क्रमात् स्तः । १०३ ।
बुध शुक्र का बिम्ब जलीय है, पृथ्वी का बिम्ब मिट्टी का और उन से बड़ा
है । इससे स्पष्ट है कि ग्रह समान धर्मी नहीं है । अतः पृथ्वी को स्थिर और बुध
आदि को चल मानने में कोई असंगति नहीं है ।
भास्वत् करोत्तप्त मृदन्ति कस्सा दुद् गत्य वाष्पाणि जलाद् घनाः स्युः
न केवलात्तोयमय ग्रहेषु तत्सम्भवो वस्तुत एव नास्ते । १०४ ।
मिट्टी के निकट का जल सूर्य की गर्मी से वाष्प बन जाता है । जिससे मेघ
होता है । अन्य ग्रहों का केवल जलीय बिम्ब होने से उन परं वाष्प नहीं बनता
अतः मेघ नहीं दीखता । (यह सभी बातें पूर्णतः गलत हैं)
यष्ट्य ग्र युग्म प्रथिताल्प भूरि मृत्पिण्डयो र्यंत्रधृतौ तुलास्यात्
तद् भार केन्द्राख्य मदोर्यतेऽस्यां स्थान भ्रमेतद् ग्रहणात् वृत्ते । १०५ ।
एक डण्डे के दो छोरों पर क्रमशः बड़ा और छोटा पिण्ड लटकाने से जिस
स्थान पर डण्डा पकड़ने से डण्डा समतल रहता है, उस स्थान को भार केन्द्र
कहते हैं । उस भार केन्द्र को सूत्र से लटका कर घुमाने से
क्षुद्रस्य पिण्डस्य वृहत्प्रमाणं स्यान्मण्डलं भ्रान्ति भवं गुरोस्तु
अल्पायतं तद्धरणी तरण्यो रस्यां क्रियायां परिकल्पितायां । १०६ ।
छोटा पिण्ड बड़े वृत्त में तथा बड़ा पिण्ड छोटे वृत्त में भ्रमण करेगा । पृथ्वी