सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलस्थिति वर्णनम् २६७
भी नहीं दीखता ।
प्रक्षिप्त लोके क्षणतोऽपरस्यां शक्तौ च गोल भ्रमसंभवोन
समक्षितौ क्षेप वलेन गोलः किन्वीक्ष्यतेयान् परिवर्तमानः । ५१ ।
पृथ्वी से ऊपर ढेला फेंकने पर वह क्षण भर के लिये भी किसी अन्य शक्ति
द्वारा अक्ष पर घूमना हमने नहीं देखा है । पर दूसरी ओर सम धरातल पर कोई
गोल वस्तु (चक्रा) लुढ़का देने पर पर वह घूमता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है ।
स चेद्धरत्राग्रथितः करेण क्षिप्येत शंशद् भ्रमता तदग्रे
शक्ति द्वया कर्ष वशान्न केन्द्रे लग्ने न निर्याति परिभ्रमेतु । ५२ ।
किसी गोल वस्तु को चमड़े की रस्सी से बांध कर हाथ के बल से घुमादेने
वह रस्सी से अलग होकर पृथ्वी कहीं भी जाने पर पृथ्वी का केन्द्र ही आकर्षण
करता है । केवल इन दो शक्तियों द्वारा आकृष्ट और विक्षिप्त होकर आकाश में
जाना ही हम लोग देखते हैं । अपने अक्ष पर घूमना या हाथ में आकर्षण और
विक्षेपण केन्द्र का आना नहीं दीखता है ।
इत्थं स्वकेन्द्रपरिशक्ति युग्म न द्वा परिभ्राम्यति चेद्धरित्री
सूर्याभिमुख्येन विनातदास्या न स्यात्कदा चिद् गतिरन्यथैव । ५३ ।
इसी प्रकार यदि पृथ्वी के केन्द्र पर सूर्य की विक्षेप और आकर्षण शक्ति के
कारण पृथ्वी चल रही है तो पृथ्वी की गति सूर्य की दिशा में होती । इससे पृथ्वी
के एक पक्ष में प्रकाश और दूसरे तरफ अन्धकार सदा रहता ।
आस्ता तदित्यात्थ यदि त्वमस्या व्यक्तैक देशे रविसम्मुखस्थे
यत्राहरत्रापि भवेन्नरात्रिः सा यत्रतत्रेत्य महः कदाचित् । ५४ ।
पृथ्वी के सूर्य के चारों तरफ इस प्रकार घूमने से निरक्ष रेखा के जिस प्रदेश
पर दिन होता वहां रात्रि नहीं होती तथा जहाँ रात्रि होती वहां दिन नहीं होता ।
किंवा समक्ष्मा परि वर्तमान सदह पिण्डोपमया पृथिव्याः
स्वभ्रान्ति वाद स्त्वन चेदियं तत् प्राप्नोतु चक्र भ्रमिमन्तरीक्षे । ५५ ।
समधरातल पर गोल पिण्ड लुढ़कने चक्र की तरह चलने के समन यदि
पृथ्वी की गति मानी जाय तो उसकी तुम्हारे मत से खण्डित होती है । चक्र के
समान घूमने से
स्ववेष्टनं यावदियं हि तावत दिने दिने यातु पुरः प्रदेशम्
स्यात्वन्मते स्वभ्रमणं दिनेऽभ्र खाभ्राक्षिक्षू (१२०००) क्रोशपरिध्यवन्याः । ५६ ।
पृथ्वी एक दिन में अपनी परिधि के समान चलेगी तभी एक चक्र के बाद
पुनः वह प्रदेश सूर्य के समाने होगा । किन्तु पृथ्वी का परिधि १२००० कोस होने
पर तुम्हारे मत से