सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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उत्तर आकाश में एक तारा समूह मछली के आकार का है, उसे ध्रुव मत्स्य
कहते हैं । इस .ध्रुव मत्स्य के मुख में ध्रुव तथा पुच्छ में उससे कुछ छोटा एक
तारा है ।
विशाल समसूत्रे सा तिष्ठत्यंकेन्दु भाग के ।
मुख पुच्छान्तरे बह्वयस्ताराः पंक्ति द्वयो स्थिताः । ३६ ।
विशाखा और इस पुच्छ तारा से जाता हुआ समसूत्र (ध्रुवप्रोतवृत्त) पर यह
तारा विशाखा से १९ अंश दूरी पर स्थित है । इस मुख और पुच्छ से बीच दो
पंक्तियों में बहुत से तारा हैं ।
विशाखास्तोऽस्त मेत्यर्को यदा तत्पुच्छगा तदा ।
तारका पश्चिमस्थास्यान्निशार्द्धेऽधोगता ध्रुवात् । ३७ ।
यह पुच्छ तारा विशाखा नक्षत्र में रह कर सूर्य अस्त होने के समय पश्चिम
क्षितिज में लगता है । अर्ध रात्रि में यह तारा ध्रुव से नीचे अर्थात् दक्षिणोत्तर वृत्त
में लगता है ।
पातरुद्ध द्रवेः सूत्रे प्राच्यं तिष्ठति सा यतः ।
तदर्क द्वितयं कुत्र सम्भवेत् भ्रात रुच्यताम् । ३८ ।
सबेरे पुनः सूर्योदय के समय पुच्छ तारा पूर्व क्षितिज में लगता है । इससे
स्पष्ट है कि सूर्य एक ही हैं । तन भी हे भाई (बौद्धगण) तुम दो सूर्यों की कल्पना
किस प्रकार करते हो ?
अति सूक्ष्म मते यदि तेऽस्ति मतेस्थिरता तरणेश्चलता धरणेः
निज वाग्य खण्डित पण्डित तच्छृणु मद् गिरमावृण चात्मवचः । ३९ ।
यदि तुम्हारी बुद्धि सूक्ष्म है और तुम्हारे अनुसार सूर्य स्थिर और पृथ्वी गतिशील
है तो तुम अपने ही शास्त्रों द्वारा खण्डित हो अपने ही वाक्य द्वारा परास्त हुये) ।
अतः अपनी तर्कहीन बात को छिपाकर मेरी बात सुनो ।
इयं भूर्निश्चला साक्षात् लक्ष्यते निखिलैर्जनैः ।
भ्रान्तिश्च रवि बिम्बस्य किं फलं ते विपर्ययात् । ४० ।
संसार में सभी इस पृथ्वी को गति हीन देखते हैं अतः पृथ्वी की स्थिर होना
प्रत्यक्ष प्रमाणित है । इसी प्रकार सूर्य की गति भी प्रत्यक्ष है । अतः सूर्य को स्थिर
और पृथ्वी को गतिशील मानने का क्या उपयोग है ?
चलत्तरणी गो जनः सवसति स्थिरां मन्यते
तटस्थविटपि ब्रजं स विपरि ब्रजन्तं पुनः
उदस्तमपि हस्तगं गगनतः पतत्कन्दुकं
प्रपश्यति यता क्षिति गता इतीक्षास्ति चेत् । ४१ ।