सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्त दशः प्रकाशः
भूगोलस्थिति वर्णनम्
सच्छास्त्र गुच्छात्कतिचित् विशेषान् सच्छास्त्र पृच्छाच्छलतः प्रदर्श्य
तत्सार भूतोत्तर मार्य वाचा यच्छामि वत्सावहितः सकृत्याः । १ ।
उत्तम शिष्य प्रश्न के छल से (बहाना से) अनेक शास्त्रों के विशिष्ट विषयों
की चर्चा कर उन सभी का सार उत्तर संस्कृत भाषा में देने के लिए मैं प्रयत्न कर
रहा हूँ । हे वत्स (शिष्य), तुम ध्यान दे कर सुनो ।
प्रत्यक्ष शब्दानुमिति प्रमाणै व्यवस्थया च स्थिरता स्थिरायाः ।
(परपक्ष निग्रह पूर्वक स्वपक्ष स्थापनेन यथोक्त कथनं नामं व्यवस्था)
अहस्कारादेश्चलता खिलाना गोलं कृतत्वं प्रति पा दनेऽ त्रं । २ ।
(टिप्पणी- प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं । (१) प्रत्यक्ष- देखकर मानना तथा
२. शब्द-वेद और आप्त वचन मानकर चलना (३) अनुमान कार्यकारण सम्बन्ध
द्वारा निष्कर्ष निकालना । व्यवस्था-विपक्ष युक्ति का खण्डन कर अपना पक्ष
स्थापित करना) ।
मैं अब पृथ्वी का अचलत्व तथा सूर्य आदि ग्रहों का गतिशील होना तथा
गोल आकार की (व्यवस्था का प्रमाण प्रत्यक्ष, शब्द और अनुमान द्वारा कर रहा
हूँ ।
भूगोलः सौम्य शुक्रावनितनय सुराचार्य सूर्यात्मजानाम्
कक्षावृत्तै वृत्तस्या स्फुट दिवसकृतः कक्षयावेष्टितोऽयम् ।
मध्ये मध्यर्कस्य दूरेऽन्ति के च स्फुट रविभगणर्क्षेश कक्षा परो तः
तिष्ठत्खण्डस्य मध्ये न भसि किल सदाधारशून्यः स्वशक्त्या । ३ ।
बुध, शुक्र, मंगल, गुरु और शनि इन पांच तारा ग्रहों की कक्षा के केन्द्र में
सूर्य है । किन्तु यह सूर्य स्फुट नहीं, मध्यम सूर्य है । इस मध्यम सूर्य की कक्षा
केन्द्र में पृथ्वी है । मध्यम सूर्य कभी पृथ्वी के निकट और कभी दूर रहता है ।
ब्रह्माण्ड के मध्य में पृथ्वी आधार शून्य होकर अपनी शक्ति से स्थित है । पृथ्वी
को स्फुट रवि, नक्षत्र समूह तथा चन्द्र की कक्षा घेरे हुए हैं ।
सिद्धान्त शिरोमणौ - सर्वतः पर्वताराम ग्राम चैत्य चयैश्चितः ।
कदम्बकुसुमग्रन्थिः केसर प्रकरैरिव । इति । ४ ।
पृथ्वी पर पर्वत, बगीचा, ग्राम, ईटा का चबूतरा या स्तूपआदि व्याप्त हैं जिस
प्रकार कदम्ब के फूल में केसर कण व्याप्त रहते हैं ।
ममायमेव सिद्धान्ते मतान्तर विधायकान्
काश्चित् प्रत्युत्तरं यच्छन्निमं कुर्वे सुनिश्चितम् । ५ ।