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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

२६२ सिद्धान्त दर्पण
भूमौ समाया मति दूर गस्य प्राच्यं रवेः साङ्गगतिर्न दृश्या
ततोऽल्प दूरस्य विलम्बि ता सा शीघ्रा ख मध्ये जलदस्य यद्वत् । २३ ।
पृथ्वी यदि गोल नहीं होकर समतल होती तो पूर्व दिशा में अत्यन्त दूर में
स्थित मेघ के समान सूर्य गति भी अत्यन्त मन्द दिखायी होगी । मध्याह्न में निकट
होने के कारण उसकी गति मेघ के समान तेज हो जायेगी ।
असंगतेय यदहस्करा देर्गति पुरः पश्चिम भागयोः सा
पानीय यन्त्र द्रुत शाँत गत्या कुम्भ प्रमापेक्षत एव साक्षात् । २४ ।
किन्तु मेघ के समान पूर्व में और मध्याह्न में सूर्य की गति का अन्तर नहीं
होता । मध्याह्न, क्या, पूर्व और पश्चिम में भी सूर्य की गति पानी यन्त्र में स्वर्ण
कलश की गति की तरह समान होती है । (पानीयन्त्र समय नापने के लिये है ।
इससे सिद्ध हुआ कि पृथ्वी समतल नहीं गोलाकार है ।
समुद्र मध्यादतटस्तटान्तं स्थूणाग्रमादौ तटगेनदृष्टम्
नरेण पोतस्य ततस्तदद्धं सर्वक्रमादन्तिक वर्तिनः स्यात् । २५ ।
समुद्र के मध्य से तट की तरफ आता हुआ जहाज का ऊपरी भाग तट पर
पहले दिखायी देता है । बाद में स्थूण (मस्तूल) का नीचा भाग तथा सबसे अन्त
में पूरा जहाज दीखता है !
वृत्तान चेत्क्ष्मा समवारि मध्ये दृक् पोत योस्तद् व्यवधापिनस्यात्
चन्द्र ग्रहे तद् गत भू प्रभायान वृत्त तास्यात् समयेऽ खिलेऽपि । २६ ।
पृथ्वी गोलाकार नहीं होने पर समतल पानी में इस प्रकार दृष्टि का व्यवधान
नहीं होता । अर्थात् पहले अग्रभाग, तब मध्य भाग तक पूर्ण जहाज नहीं दीखता ।
चन्द्र ग्रहण के समय भी सभी प्रकार ग्रास में चन्द्र को ढंकने वाली पृथ्वी की
छाया वृत्ताकार दीखती है । पृथ्वी की सब स्थिति में वृत्ताकार छाया होने का
अर्थ है कि इसका गोल आकार है ।
न स्याञ्च देशान्तर नाड़िका द्यमयक्षयद् वीक्षणतः सुधांशोः
गोलत्वमायाति भ भानुं मुख्य गोला पुरोक्ताः श्रुति दृष्टि मद् भिः । २७ ।
पृथ्वी गोलाकार पृथ्वी नहीं होने पर पूर्व पश्चिम दिशा के सभी स्थानों पर
सूर्य का उदय आदि एक समय होता, (उसमें समय का अन्तर होने का अर्थ है
कि पृथ्वी गोलाकार है) । चन्द्र का भी वृद्धि क्षय वृत्ताकार दीखता है । जिसका
अर्थ है कि गोलाकार है । शास्त्र और दृष्टि के आधार पर प्राचीन आचार्यों ने सूर्य
नक्षत्र आदि सभी को गोलाकार कहा है (अतः पृथ्वी भी गोलाकार है ) ।
वदन्त्यनन्तेऽपि धराँ न वा ये भाषा च तेषा ममृषा मता मे ।
परार्द्ध वारान् भ्रमता नरेण यद् गोल पृष्ठस्य न लभ्यते ऽन्तः । २८ ।
पृथ्वी को कुछ लोग अनन्त भी कहते हैं, यह बात असत्य नहीं है । पृथ्वी